भारतीय सिनेमा का अग्रिपुरुष

भारतीय सिनेमा का अग्रिपुरुष

नाना पाटेकर दुनिया से चले गये, लेकिन उनका चेहरा शायद ही कभी हमारी स्मृतियों से विदा होगा। फिल्मों में वे जितनी बार दिखेंगे, उतनी ही बार उनकी आवाज कानों में गूंजेगी और उनके जानदार किरदार सामने आकर खड़े होंगे। मगर नाना को सिर्फ अभिनेता के रूप में याद करना उनके व्यक्तित्व से न्याय नहीं होगा। उन्होंने पर्दे पर जितना अभिनय किया, उससे कहीं ज्यादा गहरी भूमिका उन्होंने अपनी निजी जिन्दगी में निभाई। पर्दे पर वे कठोर थे, आक्रामक थे, व्यवस्था को चुनौती देते थे, कभी अपराधी बने, कभी सैनिक कभी विद्रोही नायक। लेकिन कैमरा बंद होने के बाद वही आदमी उनलोगों के बीच खड़ा दिखाई देता, जिनकी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं था।


बेहद गरीबी से उठकर आए अभिनय की बदौलत ही एक सामान्य परिवार का शरारती लड़का अभिनय की दुनिया में समुद्र जैसी भव्यता हासिल कर सका। बचपन में बहुत शरारती थे। अपनी इसी ऊर्जा को उन्होंने नाटक और अभिनय में इस्तेमाल किया। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था, 'मैं मूल रूप से गरीब था रे, मैं फुटपाथ पर सोया हूं। महीने में 35 रुपये तनख्वाह और एक वक्त का खाना।' 13 साल की उम्र में मैं नौकरी करने लगा था। मैं हमेशा कहता हूं कि उस समय मेरा कोई रिश्तेदार नहीं था। फिर जब थोड़ा नाम और पैसा आया तो बहुत सारे रिश्तेदार हो गए। परिवार का खर्च उठाने के लिए उन्होंने नौकरी की। उस दौरान वह फिल्मों के पोस्टर भी बनाया करते थे। दोपहर की धूप में आठ किलोमीटर पेदल चलकर जाते और फिर रात में आठ किलोमीटर पैदल चलकर वापस आते। 16 किलोमीटर चलना उनका रोज का रूटीन था। ऐसे मुश्किल हालात में उनका बचपन बीता। नाना नौकरी से नाटक की दुनिया में आए। नौकरी और नाटक की दुविधा के बीच असमंजस में रहे। नाटक के हर शो में 50 रुपये मिलते थ। अशोक सराफ को 200 रुपये। अशोक सराफ उनके साथ ताश खेलते थे और जनबूझकर हारकर नाना को जिताते। नाना का सराफ के साथ रिश्ता कितना बेबाक था और जिंदाजिल था इसका पता इससे लगता है कि पाटेकर ने बताया था 'जब मैं अशोक को पैसे लौटाने जाता, तो कहते क्या पाटेकर पैसे वाले हो गए?'  अशोक सराफ लिखते हैं, 'हम दोनों सड़क पर पहुंचे जहां साइकिल रिक्शा रोकी। बुजुर्ग रिक्शावाला से चढ़ाई वाली सड़क पर चलना मुश्किल हो रहा था तो नाना ने खुद उतरकर रिक्शा चलाया।' अशोक सराफ लिखते हैं नाना नहीं होते तो नाटक नहीं होता और पब्लिक हम पर गुस्सा निकालकर मार ही देती। आज भी घटना को याद करते हैं तो रौंगटे खड़े हो जाते हैं।


महाराष्ट्र में भीषण सूखे और किसानों की तकलीफ के प्रति बरती जा रही उदासीनता के खिलाफ सक्रिय रूप से काम किया और 'नाम' फाउंडेशन की शुरुआत की।

वह हर दल के नेता के करीब रहे। बाबा आमटे भी करीबी और बाला साहेब व ठाकरे भी करीबी, ऐसा कैसे?

इस सवाल पर उनके जवाब से शायद नाना पाटेकर को अस्थिर स्वभाव को समझा जा सकता है। नाना ने कहा था मुझे जो पसंद है, वो पसंद है। मैं एक पक्षी हूं, मुझे किस डाल पर बैठना है, ये मुझे तय करना है। मुझे कुरान की आयतें बोलनी आती है। मेरे गले में ताबीज भी है, कृष्ण भी हैं, ये मैं खुद से नहीं पहनता, किसी ने दिया है, इसलिए पहनता हूं। मैं मंदिर नहीं जाता, शिर्डी वगैरह भी नहीं जाता। अगर मुझे साईं बाबा का दर्शन करने हों तो मैं वहीं हाथ जोड़ सकता हूं और अगर वो भगवान हैं तो वहां भी आ सकते हैं, इतना सीधा लॉजिक है।

उनकी खासियत थी कि वे किसी एक खांचे में फिट होने वाले अभिनेता नहीं थे। उनके भीतर गुस्सा भी था, करुणा भी, कठोरता भी थी और हास्य भी। नाना पाटेकर का फिल्मी सफर 1978 की 'गमन' से शुरू हुआ। 'अंकुश' ने उन्हें पहचान दी और 'परिंदा' ने उनके अभिनय को नई ऊंचाई तक पहुंचाया। इसके बाद 'प्रहार', 'तिरंगा', 'क्रांतिवीर', 'खामोशी', 'अग्निसाक्षी', 'अब तक छप्पन', 'नटसम्राट' और 'वेलकम' जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय के विविध रंग सामने रखे। उन्होंने तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से लेकर 2013 में पद्मश्री सम्मान तक हासिल किया। लेकिन पुरस्कारों की लंबी सूची उस नाना को पूरी तरह परिभाषित नहीं कर सकती, जिसे उनके चाहने वाले एक बेहद सादा और संवेदनशील इंसान के रूप में याद करते हैं।

यहीं नाना पाटेकर अपने फिल्मी किरदारों से कहीं बड़े दिखाई देते हैं। पर्दे पर उन्होंने ऐसे किरदार निभाए, जो अपने गुस्से और तेवर से व्यवस्था को चुनौती देते थे। असल जिंदगी में उन्होंने उन लोगों का साथ देने की कोशिश की, जो व्यवस्था की सबसे कमजोर सीढ़ी पर खड़े थे। शायद इसलिए उनकी सामाजिक भूमिका उनके अभिनय से अलग नहीं थी। दोनों के पीछे एक ही चीज काम करती थी—अन्याय और पीड़ा को देखकर भीतर से बेचैन हो जाना। नाना को दिखावे से हमेशा दूरी रही। उनका रहन-सहन सादा रहा। बातचीत में भी बनावटीपन नहीं था। यही वजह थी कि उन्हें देखकर लगता था कि यह व्यक्ति पर्दे पर जितना बड़ा अभिनेता है, निजी जिंदगी में उतना ही सहज इंसान है।

नाना पाटेकर का जाना सिनेमा के लिए निश्चित रूप से एक बड़ा नुकसान है, लेकिन शायद उससे भी बड़ी क्षति उस दुनिया की हुई है, जहां नेकी को प्रचार की जरूरत नहीं होती। वे अपनी फिल्मों में जीवित रहेंगे, उनके संवाद फिर सुनाई देंगे, 'वेलकम' का उदय शेट्टी देखकर लोग फिर हंसेंगे और 'क्रांतिवीर' या 'परिंदा' में वही पुराना गुस्सा फिर दिखाई देगा। मगर अब इन दृश्यों के पीछे खड़ा असली नाना दिखाई नहीं देगा। वह आदमी, जो पर्दे पर खूंखार हो सकता था, लेकिन जिंदगी में किसी किसान के आंसू देखकर पिघल जाता था। वह अभिनेता, जिसने लाखों दर्शकों को डराया भी, हंसाया भी व रुलाया भी, लेकिन असल जिंदगी में दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करता रहा। शायद यही नाना पाटेकर की सबसे बड़ी विरासत है। सिनेमा का पर्दा उनके बिना जरूर सूना होगा, लेकिन नेकी की दुनिया में जो जगह उन्होंने बनाई, उसे भर पाना आसान नहीं होगा।





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