... कि बिजली कौंध जायेगी

... कि बिजली कौंध जायेगी

प. बंगाल में सत्ता बदली। भारतीय जनता पार्टी की पहली बार सरकार बनी। 9 मई को शुभेन्दु अधिकारी के नेतृत्व में कुल छह मंत्रियों ने शपथ ली। इसके 23 दिन बाद मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ और सभी वर्ग व जाति-उपजातियों के प्रतिनिधियों को मिलाकर समावेशी सरकार गठित हुई। नयी मंत्रीसभा में 7 महिला प्रतिनिधियों को स्थान दिया गया है। मंत्रिमंडल में तीन टायर हैं- पूर्ण मंत्री, राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) एवं राज्यमंत्री इनमें 12 पूर्ण मंत्री, 3 स्वतंत्र प्रभार के राज्यमंत्री एवं 19 राज्यमंत्री। इस तरह सभी का प्रतिनिधित्व इस मंत्रिमंडल में है किसी को शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। भाजपा की सरकार में मुस्लिम मंत्री नहीं होता, यह सर्वविदित है।


भाजपा की प. बंगाल सरकार के गठन में एक ऐसी महिला को भी शामिल किया गया है जिसके वर्ग को आमतौर पर अनदेखा कर दिया जाता है। इस महिला की कहानी संघर्ष, मेहनत और राजनीतिक उभार की मिसाल बन गई है। पूर्व वर्धमान जिले की आउसग्राम विधानसभा सीट से विधायक बनी 32 वर्षीया कलिता माझी को मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी की कैबिनेट में राज्यमंत्री बनाया गया है। इसकी कहानी रोमांचक है। कभी कुछ घरों में साफ-सफाई, खाना बनाने का काम करने वाली कलिता माझी प. बंगाल राज्य सरकार में मंत्री पद तक पहुंच गई है। घरों में पारिवारिक सहायिका के रूप में काम करने वाली महिलाओं को हम बोलचाल की भाषा में ‘काम वाली बाई’ कहते हैं। पता लगाने पर मालूम हुआ कि कलिता माझी हर महीने लगभग ढाई हजार रुपये कमाती थी। आर्थिक तंगी के चलते उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोडऩी पड़ी थी लेकिन उसने हालात के सामने हार नहीं मानी।

कलिता को जब निर्वाचन हेतु पार्टी ने टिकट दी तो उसे डेढ़ महीने की छुट्टी लेनी पड़ी थी। चुनाव अभियान में वह घर-घर जाकर लोगों से मिली, उनकी समस्यायें सुनी और अपने लिये वोट मांगा। लोगों से सीधा जुड़ाव और जमीनी पहचान ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बनी। कलिता पिछले दस वर्षों से भारतीय जनता पार्टी से जुड़ी हुई है। उसने राजनीतिक की शुरुआत बूथ स्तर की कार्यकर्ता के रूप में की थी। भाजपा ने पांच साल पहले 2021 में विधानसभा चुनाव में भी उम्मीदवार बनाया था। उसे 41 प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन जीत नहीं मिली।

इसके बावजूद पार्टी नेतृत्व ने उसपर भरोसा बनाए रखा और 2026 में चुनाव में दोबारा टिकट दिया। उसने आउसग्राम सीट से 12,535 मतों के अंतर से जीत दर्ज कर विधानसभ में पहुंचने का सपना पूरा किया। यही नहीं मंत्री बनकर उसने एक असाधारण उपलब्धि हासिल की। घर की परिचारिका, साफ-सफाई करनेवाली, जूठे बर्तन धोने, खाना बनाने वाली कलिता माझी अब प. बंगाल की माननीय मंत्री बन गई हंै। लोकभवन में शपथ के दौरान भी कलिता पर सबकी नजर थी।

‘माननीय मंत्री’ कलिता माझी पूर्व वर्धमान जिले के मंगलकोट के काशेमनगर गांव की रहनेवाली हंै। सात बहनों के परिवार में और कोई सदस्य राजनीति में नहीं है। इसके एक भाई है। पिता दिहाड़ी मजदूर हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। पति पेशे से प्लम्बर है और उसका बेटा पार्थ आठवीं कक्षा में पढ़ता है।

कलिता को रविवार यानि एक दिन पहले शाम तक यह जानकारी नहीं थी कि उसे मंत्री बनाया जा रहा है। सबसे पहले उसकी ननद रूपा बाग को यह पता चला कि उसकी भाभी मंत्री बन रही है। सोमवार सुबह से टीवी न्यूज खोल कर सभी बैठ गये। घोषणा होते ही आउसग्राम में मिठाई बांटी गई। कालिता ने फोन पर ग्रामवासियों को बताया कि वह गरीबों की भलाई के लिये काम करेगी।

यह अकाट्य सत्य है कि सिर्फ कलिता माझी के मंत्री बन जाने से गरीब कामकाजी महिलाओं का कोई उद्धार होने वाला नहीं है किन्तु फिर भी भाजपा की राज्य सरकार का एक घर की परिचारिका को मंत्री बनाना साहसिक काम है। भारतीय जनता पार्टी के बारे में अब तक की सोच इस तरह के क्रान्तिकारी कदम उठाने का गंवारा नहीं करती। हिन्दू धर्म, मन्दिर-मस्जिद, उच्च जाति के वर्चस्व जैसे एजेन्डा को दिल में बसाकर कदम ताल रखने वाली पार्टी में भले ही इस प्रकार की सोच अभी तक अकल्पनीय रही है पर इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता है कि भजपा का राजनीतिक प्रोफाइल जो भी रहा हो, एक घरेलू परिचारिका को टिकट देना, जीताना और फिर उसे मंत्री बनाना उन पार्टियों के लिए सबक है जो समाजवाद एवं वर्ग संघर्ष की बात करते हैं।

एक बार समाजवादी विचारक एवं महान नेता डाक्टर राम मनोहर लोहिया ने ग्वालियर से राजशाही परिवार की महिला के विरुद्ध एक मेहतरानी (शौचालय साफ करनेवाली मजदूर) को टिकट दी थी। उनका यह निर्णय अखबारों में सुर्खियां बना, चर्चा भी हुई पर उसे मुकाम तक नहीं पहुंचा सके। डाक्टर लोहिया जैसा एक समर्पित समाजवादी भी किसी घरेलू परिचारिका का सपना पूरा नहीं कर सका। डाक्टर लोहिया ने अपने चुनावी भाषण में मेहतरानी को जिताने का पक्ष रखते हुए उस वक्त लोकप्रिय हुए फिल्मी गाने का हवाला दिया था। 1964 में मुबारक बेगम द्वारा हमारी याद आयेगी फिल्म में केदारनाथ शर्मा द्वारा रचित गीत ‘कभी तनहाइयों में भी हमारी याद आयेगी- अंधेरे छा रहे होंगे कि बिजली कौंध जायेगी।’ इस गाने की मेहतरानी के चुनाव लडऩे के संदर्भ में चर्चा खूब हुई कि किन्तु बिजली नहीं कौंधी। लेकिन इस घटना के 62 वर्ष बाद बिजली कौंधी और बंगाल में एक घरेलू परिचारिका न सिर्फ चुनाव जीती बल्कि मंत्री भी बनी। जैसा मैंने ऊपर लिखा कि कलिता का मंत्री बनना एक ऐतिहासिक घटना है किन्तु एक ‘काम वाली बाई’ को मंत्री बनाये जाने से कोई गरीब का भाग्य बदलने वाला नहीं है। यह तो पूरी व्यवस्था बदलने से ही संभव है। किन्तु भाजपा जैसी परम्परावादी एवं दक्षिणपंथी सोच वाली पार्टी से इस समाजवादी चरित्र के कदम का हमने कभी सोचा नहीं था। खैर, इस असाधारण कार्य के लिये शुभेन्दु बाबू एवं उनके केन्द्रीय नेतृत्व को बधाई। 

समाजवादी सोच रखने वाली कांग्रेस एवं बामपंथी दलों के लिए यह एक सबक है जो उन्हें गंभीरता से सीखना चाहिये। ठ्

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