मारवाड़ी समाज के केन्द्रीय संगठन का अन्तर्कलह
अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन का गठन वर्ष 1935 में समाज के कुछ चिंतकों एवं पुरोधाओं की दूरगामी सोच की परिणति थी। मूल कारण के लिए देश में मारवाड़ी समाज की तत्कालीन स्थिति को समझना जरूरी है। भारत में ब्रिटिश हुकूमत की राजधानी कलकत्ता था। यह शहर सिर्फ ब्रिटिश प्रशासन मुख्यालय ही नहीं था अपितु व्यावसायिक केंद्र भी था। राजस्थान की मरुभूमि से निकलकर मारवाड़ी कोलकाता में आकर बसे। यहां का बंगाली समाज अपनी बौद्धिक एवं सांस्कृतिक पहचान के बावजूद अंदर से असहज महसूस इसलिए कर रहा था कि वह उद्यमी नहीं था। इस स्थिति में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लोहा लेने में जोखिम को समझता था। परिणामस्वरुप सामूहिक रूप से उच्च मनोबल के बावजूद कहीं ना कहीं वह संकोच में था कि इतनी बड़ी ताकत से पंगा कैसे लें। रवींद्रनाथ टैगोर ने भी अपना व्यवसाय किसी मारवाड़ी को सौंप कर साहित्य सेवा में जुट गए ऐसे और भी कई उदाहरण है।
मारवाड़ी समाज को भी इस बात का एहसास था कि यहां स्थानीय बंगाली समाज को साथ लेकर चले बिना वह व्यवसाय में भी स्वच्छंद रूप से काम नहीं कर सकता इस सूझबूझ से मारवाड़ी का व्यापारी के रूप में आधार मजबूत हुआ। एक संगठन भी होना चाहिए जिससे समाज अपने को संयत रख सके एवं अपने को उन बुराइयों एवं विकारों से दूर रख सके जिससे उस वक्त बंगाली समाज ग्रसित हो चुका था। समाज में सुधार की प्रक्रिया को अक्षुण्ण बनाए रखने की दूर दृष्टि ने अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन की नींव रखी। उस समय दो मुख्य उद्देश्य थे समाज में सुधार एवं समाज का चौमुखी विकास। इसी पृष्ठभूमि में सम्मेलन में प्रवासी मारवाड़ी समाज के केंद्रीय संगठन की संरचना की। वैवाहिक आयोजनों में अपव्यय, पर्दा प्रथा, दहेज व अन्य सामाजिक कुरीतियों विधवा विवाह आदि के मुद्दों पर सम्मेलन के मंच पर मारवाड़ी समाज ने अपनी आंतरिक पारिवारिक व्यवस्था में संशोधन का मार्ग प्रशस्त किया।
स्वतंत्रता के पश्चात भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने एवं विकास के पट खोलना में सम्मेलन की सकारात्मक भूमिका रही। संक्षेप में मारवाड़ी सम्मेलन का यह अखिल भारतीय मंच समाज की कुरीतियों एवं पिछड़ेपन से संघर्ष का एक सामूहिक मंच साबित हुआ। लेकिन समय के साथ-साथ समाज का एक प्रभावशाली एवं साधन संपन्न वर्ग स्वयं उन विकारों का शिकार हो गया जिसके विरुद्ध मारवाड़ी सम्मेलन की स्थापना की गई थी। आज सम्मेलन की 400 शाखाएं एवं 5 हजार से अधिक सदस्य है। सभी प्रांत में तो नहीं किंतु जहां-जहां मारवाड़ी समाज के लोग बसे हैं उनमें इस संस्था की शाखा काम कर रही है।
संस्था एवं प्रशासन कमजोर तब होता है जब उसकी जमीन कमजोर होने लगती है। आज अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन 90 वर्ष पार कर चुका है और समाज के मुद्दों की अनदेखी के परिणामस्वरुप संकटग्रस्त है। संकट धन या साधनों का नहीं बल्कि उसके अपने कुछ लोग हैं जिनको सम्मेलन के मूल एजेंडा में न तो विश्वास है और ना ही उनकी आधुनिक सोच है। मारवाड़ी समाज के युवकों की समस्या हो, चाहे मारवाड़ी युवतियों की के समक्ष आज के समय की चुनौतियां, समाज के अंदर पनप रही बुराइयां बेलगाम हंै जिसकी वे गाहे बगाहे चर्चा कर लेते हैं किंतु उसको छेडऩे की हिमाकत नहीं करते। इन सब के चलते सम्मेलन मात्र पुराना साइन बोर्ड बन गया है। इसकी पश्चिम बंगाल शाखा जो सभी इकाइयों में सबसे महत्वपूर्ण है ने सम्मेलन के ताने-बाने को नष्ट करने की सुपारी ले रखी है। सम्मेलन का राष्ट्रीय संगठन इस नटखट और उच्श्रृंखल शाखा के चलते शिथिल हो गया है। सम्मेलन को यह भ्रम है कि समाज उसके एजेंडे से संचालित होता है। सम्मेलन के सुधारवादी एजेन्डा एवं समाज के सर्वांगीण प्रगति को दरकिनार कुछ मध्यवर्गीय उद्यमियों की आशा, आकांक्षा एवं उनके अपने एजेंडा को आगे बढ़ाने का केंद्र बनता जा रहा है।
इधर मारवाड़ी समाज की कुछ जातीय इकाइयों ने अपने व्यावसायिक एजेंडा को आगे बढ़ाने के बड़े ताकतवर मंच तैयार कर लिए हैं। जैन समाज ने 'जीतोÓ (जैन इंटरनेशनल ट्रेड आर्गेनाईजेशन) के नाम से एवं माहेश्वरी समाज ने 'एमआईबीएफÓ (माहेश्वरी इंटरनेशनल बिजनेस फाउंडेशन) नाम से मंच बन चुके हैं जहां समाज के उद्यमी लोगों को इक_ा करने का प्रयास किया जा रहा है। ब्राह्मण समाज भी ऐसे ही व्यापारियों को एक मंच देने का सोच रहा है। अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन चूंकि अपने सुधारवादी एजेंडा को लगभग तिलांजलि दे चुका है अत: सबसे अधिक चोट उसके संगठन को पहुंच रही है। जैन समाज के जीतो एवं माहेश्वरी समाज के नए संगठन की बड़ी शानदार महफिलें दिल्ली, मुंबई, कोलकाता में सजी है जहां समाज के प्रबुद्ध उद्यमी अपनी आवाज को ताकत देने का प्रयास कर रहे हैं। अब इनके अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का भी प्रकल्प को भी अंजाम दिए जाने की बात चल रही है। अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के पास साधन इन वर्षों में इतने बढ़े हैं जिसकी दो दशक पहले कल्पना भी नहीं थी। मकान जो 25 वर्ष पहले खरीदा था सुनसान पड़ा है। दक्षिण कोलकाता के रुपहले इलाके में शानदार कार्यालय है। पश्चिम बंगाल शाखा का भी अपना एक अलग कार्यालय है जो सारी फसाद की जड़ है। लेकिन गतिविधियों के नाम पर कुछ नाम लेवा बैठकों के बाद एक दो अखबारों में बड़ा चित्र एवं इन बैठकों में एक ही तरह के कई वर्षों से पारित प्रस्ताव को प्रकाशित करा दिया जाता है। सम्मेलन का मुखपत्र 'समाज विकासÓ प्रकाशित हो रहा है यही उसकी उपलब्धि है जो मैंने कई बार इधर-उधर देखा है, में एक भी ऐसी सामग्री नहीं है जिसे पढ़कर सामाजिक चिंतन किया जा सके।
मैं यह सब किसी आलोचना की मंशा से नहीं लिख रहा हूं। पिछले 50 वर्ष से अधिक मैं इस संस्था से किसी न किसी रूप से जुड़ा रहा हूं। मेरी अपनी शिकायतें हो सकती हैं पर इस संगठन को इतना उद्देश्यहीन, लक्ष्यहीन, दिशाहीन मैंने पहले कभी नहीं देखा। मेरा अपना भी नैतिक दायित्व है इसी को मद्देनजर बिना किसी भी भावना को ठेस पहुंचाए एवं किसी को जिम्मेदार ठहराए कुछ लिखने की कोशिश की है। ठ्ठ
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