हिन्दी का अखबार

हिन्दी का अखबार

हिन्दी अखबार ने प्रकाशन इतिहास ने दो सौ वर्ष पूरे कर लिये। सन् 1826 में जब पहला अखबार निकला था तब पंडित जुगल किशोर शुक्ल के मन में क्या रहा होगा कि उन्होंने हिन्दी का अखबार निकालने की सोची। वे कानपुर के रहनेवाले थे जिसे आज हम मसाला नगरी के नाम से जानते हैं। तम्बाकू मसाले के जितने नामी ग्रामी ब्रान्ड हैं सबका उद्भव कानपुर में हुआ। यह विडम्बना है कि कानपुर कभी भारत का मैनचेस्टर कहा जाता था। इंग्लैंड में मैनचेस्टर कपड़ा मिलों का ‘हब’ है। वैसे ही भारत में कपड़ा कल की औद्योगिक नगरी कानपुर रही है। दुर्भाग्य है कि एक के बाद एक मिलें बंद हो गयी। अब हमारा यह ‘मैनचेस्टर’ मुख रूचि तम्बाकू व मसालों का मैन-टेस्टर बन गया है। कानपुर में खुशनुमा मिजाज के लोग रहते रहे हैं। संभव है ‘लखनऊ’ की सरजमीं से नजदीकी होने का असर हो। खैर, उसी मस्त और व्यस्त शहर को छोडक़र कलकत्ता पधारे शुक्ल जी ने हिन्दी का पहला खबरची दुनिया को दिया। इस महानगर का चयन दो कारणों से हुआ होगा। एक तो उस वक्त यह ब्रिटिश भारत की राजधानी थी। जाहिर है राजधानी होने के नाते राजनीतिक एवं प्रशासनिक गतिविधियों की धूरी कलकत्ता ही थी। दूसरा यह है कि कलकत्ता शहर उस वक्त भारत का सबसे प्रमुख व्यवसायिक केन्द्र भी था। इस शहर के बड़ाबाजार में मारवाड़ी व्यवसायियों की गद्दियां थी। शुक्लजी के दिमाग में यह बात रही होगी कि विज्ञापन के माध्यम से कुछ पैसे मिल जायेंगे ताकि अखबार का नियमित प्रकाशन हो सके।


आज जब हम पत्रकारिता के आंगन में व्यवसायिकता की चर्चा करते हुए उसे कोसते हैं, इसलिये मैंने उल्लेख किया कि व्यवसायिकता के बिना समाचार का अस्तित्व एवं उसका विकास संभव नहीं है। दरअसल व्यवसायिकता समाचारपत्र के अस्तित्व, विकास और उसके अधोपतन तीनों से जुड़ी हुई है।

अखबार का अधोपतन तब शुरू होता है जब प्रकाशक उसे विशुद्ध व्यवसायिक रूप देने का सोचते हैं। नैतिक मूल्यों और व्यवसायिकता के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। अखबारों के अवसान की प्रक्रिया का अगर उद्येश्यपूर्ण अध्ययन किया जाये तो आपको चौंकाने वाले तथ्यों से रूबरू होना पड़ेगा। भारत में बड़े औद्योगिक घरानों के कई समाचारपत्र बन्द हुए हैं। जितनी बड़ी पत्रिकायें जो काल का ग्रास हो चुकी हैं जिनमें धर्मयुग, सारिका, दिनमान, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, फिल्मफेयर, स्क्रीन, स्पोट्र्स एवं पास्ट टाइम, आदि आदि अपने समय की दिग्गज पत्रिकायें वर्षों पहले बंद हो चुकी हैं। रिलायन्स जैसे भारत के बड़े उद्योग की ओर से भी एक दैनिक पत्र जिसका नाम भी अब हमें याद नहीं है, दो वर्ष प्रकाशन के बाद ही उसकी शैशव-मृत्यु हो गई।

भारत के प्रमुख पत्र हिन्दुस्तान टाइम्स पत्र का कलकत्ता संस्करण बंद कर दिया गया जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया अंग्रेजी पत्र के हिन्दी संस्करण नवभारत टाइम्स का भी कलकत्ता में प्रकाशन बंद करना पड़ा। ऐसे और भी कई उदाहरण हैं। स्टेट्समैन के पीछे देश के अमीर पारसी थे एवं इस पत्र का बेजोड़ रुतबा था हालांकि यह बंद नहीं हुआ है पर अधिकांश लोगों की धारणा है कि इसका प्रकाशन बंद हो गया है। हां, ‘स्टेट्समैन’ बिल्डिंग किसी प्रमोटर ने खरीद ली है। इसलिये यह धारणा निर्मूल है कि अर्थाभाव में पत्र-पत्रिकायें बंद होते हैं। ऊपर मैंने जितने पत्र-पत्रिकाओं के नाम दिये हैं वे सब कुबेर के खजाने थे एवं अपनी विज्ञापन दरों में दरमुलाई नहीं करते थे। इनके बंद होने के बहुत से कारण हैं जिनका जिक्र करना संभव नहंी है। दूारी तरफ लघु एवं मध्यम समाचारपत्र इस तुलना में कम बंद हुए हैं जबकि इनके प्रकाशक अधिकांश निरे फक्कड़ थे। हां, ऐसा हुआ है कि इन फक्कड़ों के पास जब कहीं से पैसा आया तो वे अखबार बन्द कर किसी दूसरे धंधे में लग गये।

आपको लधु पत्र-पत्रिकाओं का जलवा देखना है तो कोलकाता के पुस्तक मेले में जाइये जहां लघु-पत्रिकाओं के अलग मंडप होते हैं जिसमें तीन सौ से अधिक पत्रिकाओं की प्रदर्शनी लगती है।

खैर, मैं विषयान्तर होना नहीं चाहता। हम हिन्दी के अखबारों के कार्यक्षेत्र में अ जायें। मुझे स्मरण है जब मैंने ‘छपते छपते’ का प्रकाशन सन् 1973 में प्रारंभ किया था, कोलकाता से हिन्दी के दो दैनिक पत्र थे। मैंनें सांध्य दैनिक छपतेछपते से शुरूआत की थी जो सायं 4 बजे प्रकाशित होता था। सांध्य दैनिक हिन्दी में शायद पहला अखबार ‘छपते छपते’ ही था। उस वक्त मुझे व्यवसायी बंधुओं की इस आशंका का शिकार होना पड़ा कि समाज में एक और ब्लैकमेलर पैदा हो गया है। कम से कम दो वर्ष इसी संघर्ष में गुजर गये। इसी बीच एक नीलम जैन की हत्या या आत्महत्या का कांड हो गया। मैंने इस बच्ची के साथ हुए जघन्य अपराध को खूब उछाला। उसके ससुराल वालों के दबाव और बड़ी रकम के प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया। इस झूठ की भी अग्रिपरीक्षा देनी पड़ी कि मुझे ससुराल वालों की साड़ी की दुकान का विज्ञापन नहीं मिला इसी गरज से मैं उनके खिलाफ गरज रहा हंू। खैर, नीलम जैन हत्याकांड में ‘छपते छपते’ का सुनाम भी हुआ और कुछ लोगों की ब्लैकमेल वाली आशंका से भी मुक्ति मिली। कुछ समय बाद मेरे ही परिवार में कुछ इससे मिलते जुलते कांड की आग की आंच मेरे घरवालों तक पहुंची पर इसमें भी कुन्दन बनके निकल गया। और भी कई लोगों ने संकट में साथ भी दिया। दो चार खराब लोग मिले तो कई भले लोगों का साथ भी मिला। इसको विस्तार से मैंने अपनी आत्मकथा ‘यादों के उजाले’ में वर्णित किया है।

हिन्दी के समाचारों का प्रारंभ राष्ट्रीय चेतना से हुआ है पर इसको पुष्पित पल्लवित करने में सामाजिक सेवाओं ने बड़ेी भूमिका अदा की है। इस संदर्भ में मैं अपने मारवाड़ी समाज का बहुत आभारी हंू जिनके कई पुरोधाओं ने मेरे सिर पर हाथ रखा। कई राजनीतिक नेताओं का भी सकारात्मक सहयोग मिला।

आज हिन्दी के अखबारों की स्थिति बड़ी पीड़ादायक हो गई है। अंग्रेजी अखबारों के सामने वे द्वय श्रेणी के पत्र माने जाते जाते हैं। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ प्रसार एवं पाठक संख्या में भारत के दस बड़े अखबरों में सांतवें नम्बर पर है किन्तु उसका राजनीतिक व्यवसायिक एवं सामाजिक प्रभाव उसके अपने हिन्दी प्रकाशक नवभरत टाइम्स से कई गुना है। उसका मुख्य कारण केन्द्र और राज्य सरकार की नीतियां हैं। अंगे्रजी के अखबार की चार लाइनें उसके लिये हिन्दी या भाषायी पत्रों के कई कॉलम से बड़े समाचारों से अधिक ज्वलनशील है। इस स्थिति में हमारे हिन्दी पत्रों की बेतुका संपादकीय नीतियां भी कम जिम्मेवार नहीं है। हिन्दी पत्रों में धार्मिक कट्टरवाद एवं साम्प्रदायिक विद्वेष को फैलाने की ज्यादा गुंजाइश रहती है। कभी हिन्दी पत्र राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रप्रेम की खुशबू से महकते थे अब धार्मिक विभाजन, जातिगत संघर्ष को प्रमुखता मिलती है। भाषाई दृष्टि से भी हिन्दी पत्र अक्षम्य अपराध के भागीदार हैं। हिन्दी समाचारों के शीर्षक यानि हेडलाइन में भी अंग्रेजी लिपि का प्रयोग ऐसा गुनाह है जो हमारे कुछ हिन्दी पत्र बेशर्मी से कर रहे है। अंग्रेजी समाचारपत्र हेडलाइन में हिन्दी शब्दों का खूब प्रयोग करते हैं जैसे नेता, सरकार, लूट, गुन्डा, आंदोलन शब्द को अंग्रेजी लिपि में लिखा जाता है किन्तु हिन्दी के कुछ पत्र जो स्वयं को भाषा व संस्कृति का वाहक मानते हैं द्वारा हेडलाइन में अंग्रेजी शब्द एवं उसकी अंग्रेजी लिपि का उपयोग किसी भी हालत में क्षम्य नहीं है। संपादक का पद साहसिक एवं सात्विक माना गया है। देश में हिन्दी पत्रों के संपादक महात्मा गांधी, उनके पुत्र देवदास गांधी, बनारसी दास चतुर्वेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी, वेद प्रकाश वैदिक, प्रभास जोशी जैसे कई दिग्गज लोग रहे हैं जबकि हिन्दी पत्रों के अब संपादक पत्रों ेक वे मासिक हैं जिनका पत्रकारिता से दूर कर भी संबंध नहीं है या फिर वे सिर्फ पीआर एक्ट में दंडित होने के लिये सम्पादक का नाम छापते हैं जिसके एवज में उन्हें एक निर्धारित रकम दी जाती है। हिन्दी के पत्रों में इस तरह की उच्छृंखलता का सीधा नुकसान देश और भारतीय समाज को होता है जो अब हमारे सामने आर रहा है और आने वाले दिनों में और भी विकृत रूप में हमारे सामने आ सकता है। 


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