टा! टा!
टाटा नाम भारत में घरेलू है। नौकरीपेशा हो या बेरोजगार, पढ़ा लिखा हो या अनपढ़ सबके लिए टाटा का नाम सम्मानजनक है। टाटा भी बाटा की तरह ब्रांड बन चुका है। इसलिए टाटा उद्योग में कुछ भी घटता हो तो लोगों की दिलचस्पी बन जाती है। भारत सरकार ने जब इस समूह के संस्थापक जेआरडी साहब को सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा तो भारत के आम लोगों को बड़ा स्वाभाविक लगा। हालांकि जेआरडी टाटा का जन्म पेरिस में हुआ था पर वह भारतीय नागरिक थे। उन्हें भारत का आयरन मैन भी कहा जाता है।
जब टाटा समूह में अंदरूनी विवाद छिड़ा तो अखबारों की सुर्खियां बनी और लोगों में चर्चा का विषय भी। आम आदमी को नहीं मालूम कि यह विवाद क्या है पर टाटा घराने में विवाद से भारत का हर कामकाजी आदमी असहज महसूस करता है। कुछ वर्ष पहले टाटा के उत्तराधिकारी के रूप में चयनित साइरस मिस्त्री को जब हटाया गया तो औद्योगिक जगत में बेचैनी सी थी। इसके बाद अभी चल रहे विवाद को भी लोग गले नहीं उतार पा रहे हैं।
मेरे मित्र एवं सुपरिचित सीए गिरधर ढ़ेलिया जी ने मेरा काम आसान कर दिया और मुझे सारे मामले को छपते छपते के पाठकों के लिए सरल भाषा में परोस दिया।
टाटा ग्रुप, जिसे भारत में 'नमक से सॉफ्टवेयर तक बनाने वाला समूह कहा जाता है, आजकल एक बड़े आंतरिक विवाद से गुजर रहा है। यह विवाद इतना गंभीर है कि इसमें सरकार तक को दखल देना पड़ा है। आइए इसे बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं। टाटा संस और टाटा ट्रस्ट में फर्क क्या है यह आम आदमी के लिए यह सबसे जरूरी बात है, क्योंकि बिना इसे समझे पूरा विवाद समझ में नहीं आएगा।
टाटा संस टाटा ग्रुप की 'होल्डिंग कंपनीÓ है। मतलब यह वह कंपनी है जो टाटा मोटर्स, टीसीएस, टाटा स्टील, एयर इंडिया, जैसी सैकड़ों कंपनियों में हिस्सेदारी रखती है। अभी इसके चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन हैं।
टाटा ट्रस्ट टाटा संस की सबसे बड़ी शेयरधारक है। टाटा ट्रस्ट के पास टाटा संस की करीब 66' हिस्सेदारी है। यानी अगर टाटा संस एक कंपनी है, तो टाटा ट्रस्ट उसका सबसे बड़ा मालिक है। टाटा ट्रस्ट असल में कई चैरिटेबल ट्रस्ट्स का समूह है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कार्यों में पैसा लगाते हैं। इसके अभी चेयरमैन नोएल टाटा हैं।
सीधी भाषा में समझें तो — टाटा ट्रस्ट 'मालिकÓ है और टाटा संस का बोर्ड 'मैनेजमेंटÓ है। आम तौर पर मालिक और मैनेजमेंट साथ मिलकर काम करते हैं, लेकिन अभी दोनों के बीच खुली जंग छिड़ गई है।
चंद्रशेखरन फरवरी 2017 से टाटा संस के चेयरमैन हैं। उनका दूसरा कार्यकाल फरवरी 2027 में खत्म होने वाला है। जुलाई 2025 में टाटा ट्रस्ट ने एक प्रस्ताव पास किया था जिसमें चंद्रशेखरन को दूसरा पांच साल का कार्यकाल देने का समर्थन किया गया था। सितंबर में टाटा संस के बोर्ड ने भी सैद्धांतिक तौर पर इसे मंजूरी दी। लेकिन फरवरी 2026 में यह सहमति टूट गई और फैसला टाल दिया गया। 12 अगस्त 2026 को चंद्रशेखरन ने खुद दूसरा कार्यकाल न लेने का फैसला किया, क्योंकि बोर्ड में सहमति नहीं बन पा रही थी। टाटा संस से उनका उत्तराधिकारी ढूंढने की प्रक्रिया शुरू करने को कहा। यहां तक बात साफ लग रही थी-चंद्रशेखरन जा रहे थे, नया चेयरमैन आने वाला था।
17 सितंबर 2026 को टाटा संस के बोर्ड ने पलटी मार दी। बोर्ड ने 4-1 के बहुमत से चंद्रशेखरन को दोबारा पांच साल के लिए एग्जीक्यूटिव चेयरमैन नियुक्त करने का फैसला लिया। इस फैसले पर टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा भड़क गए। उन्होंने इस फैसले को गैरकानूनी बता दिया।
नोएल टाटा का कहना है कि यह फैसला कंपनी के संविधान का उल्लंघन है। टाटा ट्रस्ट के मुताबिक, चेयरमैन की नियुक्ति के लिए ट्रस्ट के नॉमिनी डायरेक्टरों के बहुमत का समर्थन जरूरी है। चूंकि टाटा ट्रस्ट के दो नॉमिनी डायरेक्टरों में खुद नोएल टाटा ने इस फैसले के खिलाफ वोट दिया, इसलिए उनका तर्क है कि यह नियुक्ति कानूनी तौर पर अमान्य है।
इसके अलावा ट्रस्ट का यह भी कहना है कि चंद्रशेखरन का 12 अगस्त वाला फैसला — कि वे दोबारा कार्यकाल नहीं लेंगे — पहले ही सार्वजनिक हो चुका था और उस पर कर्मचारियों, कर्जदाताओं, बाजार और बहुसंख्यक शेयरधारक (यानी टाटा ट्रस्ट खुद) ने भरोसा करके काम शुरू कर दिया था, इसलिए अब उस फैसले को पलटना बहुत देर हो चुकी बात है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि टाटा ट्रस्ट के दो नॉमिनी डायरेक्टर खुद बंटे हुए हैं। नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन के कार्यकाल बढ़ाने का विरोध किया, जबकि दूसरे ट्रस्ट-नॉमिनी वेणु श्रीनिवासन ने इसका समर्थन। यह विभाजन इसलिए बहुत मायने रखता है क्योंकि टाटा ट्रस्ट के पास टाटा संस की करीब 66' हिस्सेदारी है, जिससे कंपनी के भविष्य और गवर्नेंस से जुड़े हर बड़े फैसले में उसकी राय केंद्रीय भूमिका निभाती है।
दूसरा बड़ा मुद्दा है टाटा सन्स की लिस्टिंग यानि शेयर बाजार में उतरना। अगर टाटा संस शेयर बाजार में लिस्ट होती है, तो उसे अपने बहुत से फैसले और वित्तीय जानकारी सार्वजनिक करनी पड़ेगी, और आम निवेशक भी उसके शेयर खरीद सकेंगे। इससे कंपनी पर पारदर्शिता का दबाव तो बढ़ेगा, लेकिन मौजूदा मालिकाना ढांचा (खासकर टाटा ट्रस्ट का नियंत्रण) कमजोर पड़ सकता है।
नोएल टाटा चाहते हैं कि कंपनी की मौजूदा मालिकाना संरचना सुरक्षित रहने के लिए टाटा संस निजी (प्राइवेट) ही बनी रहे, जबकि चंद्रशेखरन बड़े और साहसी कारोबारी दांव लगाकर कंपनी को आगे बढ़ाना चाहते हैं, जिसके लिए भारी पूंजी की जरूरत पड़ेगी — और वह पूंजी लिस्टिंग से आसानी से जुटाई जा सकती है।
अगर यह विवाद छह महीने से ज्यादा खिंचता है — जैसा दस साल पहले भी हुआ था — तो इससे टाटा संस की संभावित लिस्टिंग में देरी हो सकती है, जो चंद्रशेखरन की रणनीति का एक अहम हिस्सा है।
यह मामला इतना बड़ा हो गया कि केंद्र सरकार को भी बीच में आना पड़ा। टाटा संस और टाटा ट्रस्ट के शीर्ष प्रतिनिधियों की गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ दिल्ली में बैठक हुई थी, ताकि इस टकराव को सुलझाया जा सके और ग्रुप में किसी भी तरह की अस्थिरता को रोका जा सके।
कानूनी रास्ता: टाटा ट्रस्ट ने अपनी बात मजबूती से रखने के लिए जाने-माने वकील अभिषेक मनु सिंघवी को अपना वकील नियुक्त किया है।
यह पहली बार नहीं है जब टाटा संस के अंदर सत्ता की लड़ाई हुई हो। 2016 में जब साइरस मिस्त्री को अचानक टाटा संस के चेयरमैन पद से हटाया गया था, तब भी मामला अदालतों और ट्रिब्यूनल तक पहुंचा था, और सालों तक चला था। इससे पता चलता है कि टाटा जैसे बड़े और पुराने कॉर्पोरेट घराने में गवर्नेंस से जुड़े विवाद जल्दी नहीं सुलझते — इनमें अक्सर महीनों, कभी-कभी सालों का वक्त लग जाता है।
टाटा ग्रुप की कंपनियां (टीसीएस, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील आदि) फिलहाल सीधे प्रभावित नहीं हैं — यह लड़ाई होल्डिंग कंपनी और उसके मालिकों के बीच है, न कि रोजमर्रा के कारोबार में। लेकिन अगर विवाद लंबा खिंचा, तो असर दिख सकता है — जैसे पिछली बार साइरस मिस्त्री विवाद में हुआ था, बड़े फैसले (नई पूंजी जुटाना, अधिग्रहण, विस्तार योजनाएं) अटक सकते हैं। निवेशकों के लिए संकेत — अगर टाटा संस की लिस्टिंग पर सस्पेंस बना रहता है, तो इससे यह भी साफ नहीं होता कि आम निवेशक भविष्य में टाटा संस में सीधे निवेश कर पाएंगे या नहीं।भरोसे और गवर्नेंस का सवाल — भारत के सबसे भरोसेमंद कॉर्पोरेट ब्रांड में इस तरह की खींचतान से यह भी दिखता है कि बड़ी से बड़ी कंपनियों में भी मालिक और मैनेजमेंट के बीच सत्ता संतुलन कितना नाजुक हो सकता है।
टाटा समूह के भीतर छिड़ा अंजरूनी विवाद अब देश के दो सबसे दिग्गज वकीलों, हरीश साल्वे और अभिषेक मनु सिंघवी, के बीच सीधी कानूनी लड़ाई में बदल गया है। दिलचस्प बात यह है कि साइरस मिस्त्री विवाद के दौरान टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स का एक साथ पक्ष रखने वाले ये दोनों दिग्गज अब अलग-अलग पक्षों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
इस मामले में अभिषेक मनु सिंघवी, टाटा संस के फैसलों को चुनौती दे रहे टाटा ट्रस्ट्स का प्रमुख चेहरा बन गए हैं। वहीं दूसरी ओर, हरीश साल्वे मजबूती से टाटा संस और उसके चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के बचाव में खड़े हैं। यह स्थिति टाटा-मिस्त्री विवाद के बिल्कुल उलट है, जब दोनों ने एक सुर में टाटा संसद और उसमें ट्रस्ट्स की सर्वोच्च स्थिति का बचाव किया था।
Comments
Post a Comment