नेपाल नहीं सोएगा तो भारत को भी नींद नहीं आएगी

 नेपाल नहीं सोएगा तो भारत को भी नींद नहीं आएगी 


िब्बत से लगे नेपाल के के क्षेत्रों में 26 अगस्त को आई बाढ़ से बड़े पैमाने पर हुए जान-माल के नुकसान ने सभी को झकझोर दिया है। इस त्रासदी में कई लोगों की जान चली गई। इन पंक्तियों के लिखने तक 2500 सौ से ज्यादा लापता हैं, जिनमें सौ से अधिक भारतीय भी शामिल हैं। प्रारंभिक अध्ययन रिपोटों और उपग्रह से ली गई तस्वीरों के विश्लेषण से पता चला है कि नेपाल-तिब्बत सीमा के पास पहाड़ी से चट्टानों के खिसकने के बाद बाढ़ आई। बाढ़ की खौफनाक तस्वीरों से यह समझना मुश्किल नहीं है कि जब प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाती है, तो मानव सभ्यता उसके आगे बेबस हो जाती है। प्रकृति और मनुष्य का संबंध अत्यंत गहरा एवं परस्पर निर्भरता पर आधारित है और जब इसमें कृत्रिम असंतुलन होता है, तो यह विनाशकारी घटनाओं का कारण बनता है। खबरों के मुताबिक, सबसे पहले भोटे कोशी नदी में अचानक बाढ़ आई, जिससे तिब्बत की सीमा से लगे नेपाल के रसुवा और धादिंग जिले प्रभावित हुए। पानी और मलबे का बहाव इतना तेज था कि आसपास के धादिंग, नुवाकोट और चितवन जिले भी इसकी चपेट में आ गए। बाढ़ से लापता भारतीयों में से ज्यादातर तिब्बत में कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए जा रहे थे। नेपाल के बाढ़ पूर्वानुमान प्रभाग के मुताबिक, पहाड़ी से चट्टानों एवं मिट्टी के खिसकने से नदी अवरुद्ध हो गई और वहां बनी झील के टूटने से भीषण बाढ़ आई। यह त्रासदी इस बात का संकेत है कि हिमालयी क्षेत्र पारिस्थितिकीय रूप से कितना संवेदनशील है। विकास और आधुनिक जीवन की दौड़ में मनुष्य ने प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने के बजाय उसका अंधाधुंध दोहन शुरू कर दिया है। जंगलों की कटाई, पहाड़ों का अतिक्रमण, नदियों के मार्गों में हस्तक्षेप और अनियोजित निर्माण जैसे कार्यों का परिणाम बाढ़ जैसी विनाशकारी त्रासदियों के रूप में सामने आ रहा है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन नदियों को नेपाल की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा संभावना की जीवनरेखा माना जाता है, उन्हीं के किनारे बेतरतीब बस्तियां, सडक़ें और अन्य ढांचागत संरचनाएं तैयार कर दी गई हैं। विकास आवश्यक है, लेकिन इस क्रम में पहाड़ों की प्रकृति की अनदेखी अंतत: जोखिम का विस्तार बन जाती है। पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ बाढ़ जैसी त्रासदी को जन्म देती है। बहरहाल, विदेश मंत्रालय का कहना है कि नेपाल में बाढ़ से प्रभावित भारतीय नागरिकों के बचाव और उन्हें राहत पहुंचाने के लिए वहां की सरकार के साथ लगातार संपर्क एवं समन्वय किया जा रहा है। मगर, इस बाढ़ से नेपाल के साथ लगते बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी खतरा मंडराने लगा है। 



खतरा अभी टला नहीं है बल्कि अभी चीन ने अलर्ट जारी किया है कि नेपाल सीमांत पर एक झील और फट सकती है। अगर ऐसा हुआ तो तबाही ओर घातक हो सकती है। बताते चलें कि 26 अगस्त की सुबह, तिब्बत में 4.4 तीव्रता के भूकंप के बाद एक वर्फ चट्टानी हिमस्खलन हुआ, जिसने ल्हैंडे खोला (नेपाल में भोटे कोशी) नदी में एक प्राकृतिक बांध बना दिया। इस बांध के टूटने से पानी की एक दीवार नेपाल की ओर बह निकली, जिसने भारी तबाही मचाई।
लापता लोगों में 44 सेना कर्मी, 133 से अधिक भारतीय भी शामिल हैं, जिनमें से कई कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जा रहे थे। अगर भारत में ऐसी प्राकृतिक आपदाओं का विश्लेषण करें तो यह, आपदा भारत के लिए सीधे तौर पर चिंता का विषय बन गई, क्योंकि भाटे कोशी नदी नेपाल में त्रिशूली नदी में मिलती है, जो आगे चलकर भारत में गंडक नदी के रूप में प्रवेश करती है। 
बिहार सरकार ने संभावित बाढ़ की स्थिति से निपटने के लिए ठोस कदम उताए। पश्चिम चंपारण में अकेले 5,000 से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया 1,150 से अधिक लोगों को भोजन उपलब्ध कराया गया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से बात करके पूरी सतर्कता बरतने का आग्रह किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नेपाली प्रधानमंत्री बलेन्द्र शाह से बातचीत करके हर संभव सहायता का आश्वासन दिया। भारतीय वायु सेना ने राहत सामग्री, दवाएं और बचाव उपकरण लेकर नेपाल के लिए सी-130 जे विमान भेजे। हालांकि तात्कालिक बाढ़ कम हो गई है, लेकिन खतरा अभी टला नहीं है।
बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिससे नई झीलें बन रही है और पुरानी झीलों का जल स्तर बढ़ रहा है, जिससे उनके अचानक टूटने को खतरा बढ़ जाता है। अब अगर भारत में ऐसी आपदा आती तो यहां क्या तैयारियां है? तो बताते चलें कि भारत के हिमालयी क्षेत्रों में, जैसे कि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश या सिक्किम में होती, तो इसका प्रभाव और भी विनाशकारी हो सकता था। भारत के इन राज्यों में घनी आबादी, बड़ी संख्या में जलविद्युत परियोजनाएं और बनियादी ढांचा होने के कारण क्षति अधिक व्यापक होती। भारत ने इन आपदाओं से सीख लेते हुए अपनी चेतावनी प्रणाली को मजबूत किया है। 
भारत को अपनी चेतावनी प्रणाली को और मजबूत करने, क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने और जोखिम वाले क्षेत्रों में नेपाल को बाढ़ की जानकारी मिल सकती थी, लेकिन समय पर सूचना साझा नहीं होने से जान-माल का भारी नुकसान हुआ। इससे चीन के प्रति नेपाल में रोष के भाव उभरे हैं, क्योंकि तकनीकी रूप से सक्षम होने के बावजूद चीन ने समय रहते सूचना नहीं दी।
हमें यह समझना होगा कि प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता, लेकिन उनके प्रभाव को कम किया जा सकता है। मजबूत चेतावनी प्रणाली, त्वरित सूचना साझाकरण, क्षेत्रीय सहयोग और दीर्घकालिक योजना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इस आपदा ने स्पष्ट कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्र के देशों को एक साथ आना होगा और आम सहमति बनानी होगी कि इस तरह की त्रासदियों से निपटने के लिए प्रकृति की सीमाओं से परे एक संयुक्त रणनीति को आवश्यकता है।
और अंत में 
भारत में बिना देरी किये एक पड़ोसी का धर्म निभाया। नेपाल भारत के लिए कभी भी विदेशी नहीं रहा। हम धर्म एवं सांस्कृतिक परंपराओं से बंधे हुए हैं। एक दशक पूर्व मैं नेपाल के 1400 फीट ऊंचे मुक्तिनाथ धाम मंदिर गया था। नेपाल सरकार के मेहमान के रूप में कुछ पत्रकार साथियों के साथ 

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