वंदे मातरम् पर विवाद

 वंदे मातरम्  पर विवाद

राष्ट्रगीत, राष्ट्रीय पताका, राष्ट्रीय पशु, राष्ट्रीय पक्षी, राष्ट्रभाषा, राष्ट्रकवि इन सबका चयन हमारे राष्ट्रीय सम्मान के लिए किया जाता है। इनको संवैधानिक मान्यता मिलती है। देश की स्वतंत्रता मिलने के पहले के कालखंड में हमारे राष्ट्रीय मनीषियों ने इन सब मुद्दों पर आपसी विमर्श के जरिये निर्णय लिया था। इस प्रक्रिया में परस्पर विरोधी विचारधारा के लोग थे। राष्ट्रीय मुक्ति के योद्धाओं ने राष्ट्र के भावी रूप स्वरूप की जब कल्पना की थी तो वे एकमत नहीं थे। स्वाभाविक है विचारों में भिन्नता हो सकती है। किन्तु राष्ट्रीय धरोहर एवं सम्मान की विषयवस्तु पर उस समय के राष्ट्रवादी चिन्तनशील लोगों ने मन्थन किया। राष्ट्रीय गीत के बारे में भी यही हुआ। सबकी राय थी कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा लिखित जन-मण-मन को ही राष्ट्र गीत माना जाए। उस वक्त वंदे मातरम् का भी उल्लेख हुआ था। लेकिन भारतीय समाज के एक वर्ग का धार्मिक कारणों से एतराज था। परिणामस्वरूप उसे दरकिनार कर जन गण मन पर ही सबकी राय बनी। यह कटु सत्य है कि रवि बाबू ने इस गीत की रचना ब्रिटिश शासक जार्ज पंचम के सम्मान में की थी। फिर भी इसको राष्ट्रीय गीत की मान्यता देने में सब राजी हुए। कालान्तर में समाजवादी प्रखर नेता डा. राम मनोहर लेाहिया ने अपने एक लेख में इस गीत का विरोध किया पर जन गण मन राष्ट्र गीत के रूप में बना रहा। सार्वजनिक कार्यक्रमों में राष्ट्रभक्ति के कई गीत गाये जाते थे, किन्तु प्रशासन एवं सरकारी स्तर पर मान्यता प्राप्त राष्ट्रगीत जन गण मन ही माना गया। साथ ही इस राष्ट्रगीत के कुछ शब्दों पर आपत्ति भी थी किन्तु यही सोचा गया कि राष्ट्रगीत का जो मौलिक स्वरूप है को जस का तस रखा जाये। इसी गीत में शब्द ‘अधिनायक’ का अर्थ होता है डिक्टेटर यानि निरंकुश। यही नहीं गीत में ‘सिंध प्रांत’ का भी जिक्र है जबकि स्वतंत्र भारत में सिंध प्रांत अलग कर दिया गया था। राष्ट्रगीत का स्वरूप नहीं बदला जाता भले ही उसके एक दो शब्दों का आज सरोकर न हो।


स्वतंत्रता के पहले और बाद कांग्रेस के अधिवेशनों में वंदे मातरम्् के नारे लगाये जाते थे एवं वंदे मातरम् राष्ट्रभक्ति के रूप में अपने लय के साथ गाया भी जाता था। इस गीत में राष्ट्रप्रेम की भावना ओतप्रोत है। वहां भी समाज के एक वर्ग को वंदे मातरम् गीत की तीसरे चौथे अंतरा में कुछ शब्दों पर हिचक थी। इसलिए रवीन्द्रनाथ टैगोर के सुझाव एवं सुभाष चन्द्र बोस, सरदार पटेल, जवाहरलाल नेहरू जैसे राष्ट्रीय नेताअेां के परामर्श पर वंदे मातरम् के पहले दो पैरा को ही राष्ट्रीय गीत के रूप में गायने की स्वीकृति मिली। तबसे लेकर आज तक जन गण मन के साथ बंदे मातरम् को भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में विशिष्ट स्थान मिला। हालांकि राष्ट्रगीत की मर्यादा सिर्फ जन गण मन को ही थी- यानि सरकारी कार्यक्रमों में उसका गाया जाना अनिर्वाय था। जहां तक वंदे मातरम् का सवाल है उसका गाना अनिर्वाय नहीं था- स्वेच्छा से लोग गाते थे। 

 ‘वंदे मातरम््’ के गायन को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच विवाद बढ़ गया है। कांग्रेस कार्य समिति ने अपने कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत के केवल पहले दो अंतरे गाने का फैसला किया है। कांग्रेस ने इसके लिए 1937 के अपने फैसले का हवाला दिया है। भाजपा ने इसे तुष्टिकरण की राजनीति बताते हुए कांग्रेस पर हमला बोला, जबकि कांग्रेस ने भाजपा पर मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने आरोप लगाया कि 1937 में कांग्रेस के इसी तरह के फैसले ने देश के विभाजन की परिस्थितियों की नींव रखी थी। शाह ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ के 150वें वर्ष में मोदी सरकार ने सरकारी कार्यक्रमों में पूरा गीत गाने का फैसला कर इस ऐतिहासिक गलती को सुधारा है। उन्होंने कांग्रेस के फैसले को बैंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान भी बताया।

कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने पार्टी के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा है और कांग्रेस के लिए भावनात्मक मुद्दा है, जबकि भाजपा इसे राजनीतिक मुद्दा बना रही है। वेणुगोपाल ने कहा कि पेपर लीक, चंदा चोरी और अरुणाचल प्रदेश में चीनी घुसपैठ जैसे अहम् मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए भाजपा सरकार ने वंदे मातरम् में अनावश्यक विवाद छेड़ा हे।

विवाद 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में ‘वंदे मातरम््’ के गायन के दौरान मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गांधी के बातचीत करने के वीडियो से शुरू हुआ था। भाजपा ने इसे राष्ट्रीय गीत का अपमान बताते हुए माफी भी मांग की थी। 1937 में कांग्रेस कार्य समिति ने रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह के बाद ‘वंदे मातरम््’ के पहले दो अंतरे अपनाने का फैसला किया था। बाद के अंतरों में धार्मिक संदर्भों को लेकर विवाद था। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में राजेंद्र प्रसाद ने ‘वंदे मातरम्’ को ‘जन गण मन’ के समान सम्मान देने की बात कही थी। हालांकि ‘वंदे मातरम््’ राष्ट्रीय गीत और ‘जन गण मन’ राष्ट्रीय गान है।

दरअसल हम भारतवासी राष्ट्रीय भावना की बात करते हैं, उसका बड़े जोश के साथ भाषणों में भी जिक्र करते हैं लेकिन सच्चाई है कि हम आज भी धार्मिक या साम्प्रदायिक संकीर्णता से ऊपर नहीं उठ पाये हैं। यह बात हिन्दू और मुसलमान दोनों पर समान रूप से लागू है। बंदे मातरम् के दो अंतरा राष्ट्रगान के लिए काफी है किन्तु शेष पैरा में दुर्गा, काली और अपनी देवियों की स्तुति को निजी धार्मिक तुष्टी हेतु रखना चाहते हैं। इस पर मुसलमानों की आपत्ति को खारिज कर देते हैं। उधर मुसलमान अपनी साम्प्रदायिक भावनाओं के चलते राष्ट्रीय गीत में इसके समावेश को स्वीकार नहीं करते। दोनों तरफ राष्ट्रवादी भावनाओं पर धार्मिक मुलम्मा चढ़ा हुआ है। हमारे प्रधानमंत्री कई बार सबका साथ सबका विश्वास की बात करते हैं पर सबके साथ को जब धार्मिक मान्यताओं के तराजू पर तोला जाता है तो धर्म राष्ट्रीय भावनाओं  पर भारी पड़ता हें। वर्तमान में हमारी राजनीतिक हस्तियां राष्ट्रीय भावना को द्वयम दर्जा की बाध्यता मानती है। क्या विडम्बना है कि एक राष्ट्र, एक संविधान एक विधान और अब एक चुनाव की बात करने वाले, दो राष्ट्रीय गीतों को तो स्वीकार करते हैं पर वंदे मातरम् के दो और छह अन्तरा पर एकमत नहीं हो पाते।

जन गण मन में भी दो छन्द को राष्ट्र गीत के रूप में स्वीकार किया गया। वंदे मातरम् को तो इसलिये भी दो अंतरा तक ही सीमित रखना चाहिये क्योंकि उसे पूरा याद करना बेहद मुश्किल है। इसे कुछ लोग ही गा पा रहे हैं और इसका अर्थ जानना तो और भी दुर्गम है। मेरा यह मानना है कि जब हम सम्पूर्ण रूप से राष्ट्रवादी दृष्टि से सोचेंगे वंदे मातरम् का सहज समाधान हो सकता है। लेकिन धार्मिक दृष्टि से इस समस्या का हल नहीं निकल सकता। ठ्

Comments