बोल बम!
सावन का महीना हिन्दू पंचांग के अनुसार सबसे पवित्र माना जाता है। यह भगवान शिव का महीना है जब श्रद्धालु महादेव की विविध तरीके से पूजा अर्चना करते हैं। भगवान शिव को खुश करने के बहुत सारे तरीकों में समीपस्थ गंगा का जल लेकर शिव मंदिर में जलाभिषेक सर्वोत्तम है। दूध, धी, दही, बेलपत्र के साथ गंगाजल शिवलिंग पर ढाला जाता है। कांवड़ में बांधकर जल कलश लेकर कई मील तक शिव भक्त नंगे पांव चलते हैं। 'बोल बमÓ के नारे से शिवालय गंूज उठते हैं। पूरे भारतवर्ष में विशेषकर उत्तर भारत में बैद्यनाथधाम देवघर के मशहूर मंदिर के अलावा वाराणसी और उन धार्मिक स्थलों में जहां भगवान शिव के मंदिर हैं, कांवड़ यात्रा निकलती है।
कांवड़ यात्रा को भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए अधिक फलदायी माना जाता है। इस यात्रा की शुरुआत को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें एक कथा भगवान परशुराम से जुड़ी है। भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। भगवान परशुराम भगवान के भक्त थे। पौराणिक कथा के अनुसार, पहला कांवडिय़ा भगवान परशुराम को माना जाता है। भगवान परशुराम ने महादेव को प्रसन्न करने के लिए त्रेतायुग के दौरान सावन के महीने में गढ़मुक्तेश्वर से पवित्र गंगाजल लाए थे और उत्तर प्रदेश के पुरा महादेव मंदिर में महादेव का जलाभिषेक किया था, जिससे कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब समुद्र मंथन से निकला हलाहल विष भगवान शिव ने ग्रहण किया था, तो विष के तेज से शिव जी का कंठ नीला पड़ गया। इसलिए भगवान शिव को नीलकंठ कहा जाता है। तब भगवान परशुराम ने विष की भयंकर गर्मी और जलन को शांत करने के लिए शिव जी पर गंगाजल से उनका अभिषेक किया था। वैदिक पंचांग के अनुसार, कांवड़ यात्रा का जल सावन शिवरात्रि के दिन चढ़ाया जाता है। इस खास अवसर पर भगवान शिव का विशेष जलाभिषेक किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शिव जी का जलाभिषेक करने से महादेव की कृपा प्राप्त होती है। इस बार 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि मनाई जाएगी। इसी दिन कांवड़ यात्रा का जल चढ़ाया जाएगा।
साल 2026 में भगवान शिव के भक्तों के लिए यह पावन सफर बेहद खास होने वाला है। इस साल सावन का महीना 30 जुलाई 2026 से शुरू हो गया है, और इसी के साथ पवित्र कांवड़ यात्रा का भी शंखनाद हो गया। कांवड़ यात्रा का समापन हमेशा सावन मास की शिवरात्रि के दिन होता है। 11 अगस्त 2026 को सावन शिवरात्रि मनाई जाएगी। इसी दिन देश भर से गंगाजल लेकर लौटे शिवभक्त (कांवडि़ए) भगवान शिव का जलाभिषेक करेंगे।
कांवड़ मूल रूप से बांस या लकड़ी से बनी एक विशेष संरचना होती है। श्रद्धालु इसे रंग-बिरंगे झंडों, फूलों, घुंघरुओं, घंटियों और विभिन्न धार्मिक प्रतीकों से बेहद खूबसूरत तरीके से सजाते हैं। इसके दोनों सिरों पर पवित्र नदियों (मुख्य रूप से गंगा जी) के जल से भरे कलशों को बांधा जाता है। श्रद्धालु इस कांवड़ को अपने कंधों पर उठाकर नंगे पैर, 'बम-बम भोलेÓ और 'हर-हर महादेवÓ के जयकारों के साथ अपने गंतव्य की ओर बढ़ते हैं।
शिवभक्त अपनी श्रद्धा, संकल्प और शारीरिक क्षमता के अनुसार अलग-अलग प्रकार की कांवड़ यात्रा चुनते हैं। सामान्य कांवड़ को श्रद्धालु अपनी सुविधा के अनुसार चलते हैं। वे रास्ते में बने सेवा शिविरों में आराम कर सकते हैं, भोजन कर सकते हैं और फिर यात्रा आगे बढ़ाते हैं। डाक कांवड़: यह यात्रा अत्यधिक तेज गति और कड़े अनुशासन के साथ की जाती है। इसमें श्रद्धालु बिना रुके लगातार दौड़ते या चलते हुए गंतव्य तक पहुंचते हैं और जल चढ़ाते हैं। खड़ी कांवड़: इस यात्रा का नियम है कि कांवड़ को कभी जमीन पर नहीं रखा जाता। जब एक श्रद्धालु आराम करता है, तो दूसरा साथी कांवड़ को अपने कंधे पर थामे रखता है। यह आपसी सहयोग और समर्पण का प्रतीक है। दांडी कांवड़: इसे सबसे कठिन तपस्या माना जाता है। इसमें भक्त नदी तट से शिव मंदिर तक की पूरी दूरी दंडवत प्रणाम (लेटकर) करते हुए पूरी करते हैं। इस यात्रा को पूरा होने में कई सप्ताह या महीने भी लग सकते हैं।
कांवड़ यात्रा में मीलों तक पैदल चलने पर भगवान शिव की कृपा तो प्राप्त होती है किन्तु शरीर जवाब देने लगता है। अपार कष्ट एवं बदन पर अत्याचार करके शिवभक्त भक्ति के ज्वार में इतना अविभूत हो जाता है कि उसे अपनी सुध नहीं रहती। यही सिलसिला सालों से चला आ रहा है। कांवडिय़ों को ऊर्जा मिलती है पर इस ऊर्जा का रास्ता शरीर की धमनियों को नोचकर ही मिलता है। मैं स्वयं बैद्यनाथधाम देवघर की माटी में सना हंू। यहां सावन के एक महीने में शराब की जितनी खपत होती है वह शेष ग्यारह महीने को मिलाकर भी कम पड़ती है। भगवान शिव का जयकारा 'बोल बमÓ में समाहित है। बोल बम के उच्चारण से कांवडिय़ा को स्फूर्ति मिलती है और थकावट से राहत। इसलिए सावन के महीने में आपको 'बोल बमÓ का नारा चहु ओर सुनाई देता है।
भगवान शिव का यह ऊर्जावान नारा और भक्ति का सशक्त हस्ताक्षर किन्तु आज उच्छृंखलता व प्रतिरोध की मशाल बन गया है। कांवडिय़ों की भीड़ से आम नागरिक को डर लगता है क्योंकि ये लोग अपने को भगवान शंकर का अनुयायी मानते हैं। और जगह-जगह तांडव नर्तन कर शिव अनुराग का ऐसा बेहूदा प्रदर्शन करते हैं कि वास्तविक सनातनियों को गहरी चोट लग रही है जिसका विरोध तब से ही हो रहा है जब से कथित सनातन भाजपा सरकार ने इसको सहयोग करना शुरू किया है। शिव-पार्वती के लिए ऐसे गंदे गीत गाते हैं जो अक्षम्य अपराध है। ये आमतौर पर नशेबाज और अशिक्षित लोग होते हैं। अब तो भारतीय सनातनी नारी भी इस जलसे में शामिल हो रही है। धर्म के नाम पर सब चलता है।
बाबा नागार्जुन की ये दो पंक्तियां बहुत याद आ रही है-
पुलिस मोहकमे के वे जालिम सुन ले मेरी बात,
जनता ने हिटलर, मुसोलिनी तक को मारी लात।
देशभर के कॉकरोच कथित प्रायोजित कांवडिय़ों पर निश्चित बहुत भारी पड़ेंगे।

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