तस्लीमा की घर वापसी!

 तस्लीमा की घर वापसी!

बांग्लादेश की विद्रोही लेखिका कोलकाता आने वाली है। इस खबर को कोलकाता के अंग्रेजी व बांग्ला के अखबारों ने बड़ी सुर्खियों में जगह दी। बांग्लादेश की बहुचर्चित लेखिका तस्लीमा नसरीन को जब देश निकाला मिला पूरी दुनिया में विशेष रूप से पश्चिम बंगाल और भारत में विस्फोटक खबर बनी। विवादास्पद लेखिका को अपने मुल्क से इसलिए रुखसत होना पड़ा क्योंकि उन्होंने अपनी ही मजहब इस्लाम के विरुद्ध कुछ ऐसा लिखा कि बांग्लादेश में समान धर्मी मजहब परस्त आवाम को बड़ा नागवार गुजरा। बांग्लादेश की कट्टर लॉबी ने इस युवा लेखिका के विरुद्ध जेहाद छेड़ दिया। वर्ष 1994 के अंत में आखिर उनको अपने ही मुल्क से बेदखल होना पड़ा था। वह स्वीडन जाकर बस गई। उनका दिल और दिमाग तो बंगालियों के बीच रचा बसा था और कोलकाता में उन्हें सुकून मिला। 

लगभग 20 साल बाद उनका कोलकाता आना किसी लापता व्यक्ति की घर वापसी से कम नहीं है। विवादित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा दो दशक बाद बंगाल की धरती पर कदम रखने जा रही हैं। आगामी 1 अगस्त को रवींद्र सदन में आयोजित होने वाले एक विशेष सांस्कृतिक व विमर्श कार्यक्रम में वह शिरकत करेंगी। सेकुलर मिशन और ह्यूमन राइट्स एंड बांग्लादेश फ्रीडम फाइटर्स फाउंडेशन द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी मौजूद रहेंगे। 

आयोजकों का कहना है कि राज्य में सत्ता परिवर्तन और भयमुक्त राजनीतिक माहौल बना है ऐसे में उनका आना उन सभी ताकतों को बल प्रदान करेगा जो स्वच्छंदता से जनहित में काम करना चाहते हैं। पिछले दिनों सरकार कट्टरपंथियों के आगे नतमस्तक थी। दूसरी तरफ तस्लीमा के दौरे को लेकर राज्य में सियासी पारा भी चढ़ गया है। इंडियन सेकुलर फ्रंट के विधायक नौशाद सिद्दीकी ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि बिजली और राशन के वादे पूरे करने में नाकाम रही भाजपा सरकार अल्पसंख्यक विरोधी एजेंडा चमका रही है। ज्ञात रहे कि वर्ष 2007 में वामपंथी शासन के दौरान जब बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री थे तसलीमा की लिखी किताब द्विखंडित को लेकर कोलकाता में हिंसक प्रदर्शन हुए थे। जिसके बाद सरकार को सेना तक बुलानी पड़ी। ऐसे में राज्य सरकार ने उन पर प्रतिबंध लगा दिया था ममता सरकार ने भी यह अघोषित प्रतिबंध जारी रखा।

नसरीन दशकों से अपने लेखन को लेकर विवादों में घिरी रही हैं। उनका लेखन मुख्य रूप से महिलाओं के अधिकारों, लैंगिक समानता, पितृसत्तात्मक मानदंडों और महिलाओं द्वारा झेली जाने वाली घरेलू हिंसा पर केंद्रित है। उनका सबसे प्रसिद्ध उपन्यास, 'लज्जाÓ 1993 में प्रकाशित हुआ था। इस पुस्तक में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में हिंदू परिवारों पर हुए अत्याचारों का वर्णन है।

तसलीमा के इस उपन्यास से नाराज बांग्लादेश के कट्टरपंथी संगठनों ने उन्हें जान से मारने की धमकियाँ दीं। तसलीमा के खिलाफ उग्र विरोध-प्रदर्शन आयोजित किए गए। तसलीमा के खिलाफ मजहबी फतवे जारी किए गए। मजबूरन तसलीमा को 1994 में बांग्लादेश छोड़कर यूरोप जाना पड़ा। निर्वासन के दौरान तसलीमा जर्मनी और अमेरिका में भी रहीं। आखिरकार दौरान स्वीडन ने उन्हें नागरिकता दी।

तसलीमा नसरीन ने 1998 में अपनी आत्मकथा का पहला भाग 'मेयेबेलाÓ (माई बंगाली गर्लहुड) प्रकाशित किया। हालांकि उनकी मुश्किलें 2003 में तब शुरू हुईं जब उनकी आत्मकथा का दूसरा भाग 'द्विखंडितÓ प्रकाशित हुआ। इस किताब में कुछ ऐसे अंश थे जिन्हें कट्टरपंथियों ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला बताया। 18 नवंबर 2003 को सैयद हशमत जलाल द्वारा नसरीन के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करने के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट ने किताब के प्रकाशन पर रोक लगाने का आदेश दिया।

दस दिन बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वामपंथी सरकार ने साम्प्रदायिक तनाव फैलने की आशंका जताकर किताब पर प्रतिबंध लगा दिया। हालांकि, प्रकाशक ने इस प्रतिबंध को चुनौती दी। सितंबर 2005 में, हाईकोर्ट ने यह कहते हुए प्रतिबंध हटा दिया कि किताब का मकसद धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था और सरकार के कदम को अनुचित करार दिया।

दिल्ली में गृह मंत्रालय के हस्तक्षेप से रेजिडेंस परिषद रिन्यू होने के बाद अब तसलीमा की कोलकाता यात्रा ने संस्कृति और राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।

राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने तसलीमा को पूर्ण सुरक्षा का भरोसा दिया है। इस कार्यक्रम में खुद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, लेखक शिवचंद्र मुखर्जी और वित्त मंत्री स्वप्न दास गुप्ता उपस्थित रहेंगे। दूसरी तरफ तृणमूल विधायक अखरूजमां और एएसआई विधायक नौशाद सिद्दीकी ने इसे भाजपा के डबल इंजन सरकार का राजनीतिक स्टंट बताया है। उनका आरोप है कि सरकार अपनी विफलताओं से ध्यान भटकाने के लिए तसलीमा का इस्तेमाल कर रही है जिससे मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा सके। बहरहाल 1 अगस्त को होने वाला आयोजन केवल एक साहित्यिक मंच नहीं बल्कि बंगाल की बदलती राजनीतिक और सामाजिक दशा का लिटमस टेस्ट बनने जा रहा है।

कोलकाता वापसी को लेकर बेहद भावुक है तस्लीमा। उन्होंने कहा कि 18 साल 8 महीने और 10 दिन बाद कोलकाता लौट रही हूं। इस एहसास को शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। कोलकाता मेरे लिए सिर्फ एक शहर नहीं बल्कि मेरा खोया हुआ घर है। भले ही मुझे जबरन यह शहर छोडऩा पड़ा लेकिन कोलकाता हमेशा मेरे दिल में रहा। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मेरा निर्वासन अब खत्म हो रहा है। सुरक्षा व्यवस्था के लिए मैं राज्य सरकार और आयोजकों की आभारी हूं। 

तस्लीमा ने कहा कि कोलकाता में बसना उसका सपना रहा है, बेहाला में उसने मकान खरीद भी लिया था जो बाद में उसे बेचना पड़ा। कोलकाता के कार्यक्रम में वह अपनी पुस्तक 'बन्दिनीÓ से कविताओं का पाठ करेंगी। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य का कहना है कि वे राज्य सरकार से आग्रह करेंगे कि तस्लीमा को वापस लाया जाए। आखिर उसकी आवाज को क्यों दबाया जा रहा है?

तसलीमा जैसी लेखिका कोलकाता में बसने का मन बना रही है तो सरकार कि दुविधा होगी कि उसकी घोषित नीति पड़ोसी देश से हिंदुओं का स्वागत और दूसरे धर्म विशेष कर किसी मुसलमान की नो एंट्री परमिट की है। हां, तस्लीमा एक अपवाद हो सकती है! ठ्ठ

Comments

  1. रविवारीय चिंतन
    तस्लीमा की घर वापसी!
    on July 18, 2026
     तस्लीमा की घर वापसी!
    यह एक सुखद और सकारात्मक सोच है। बंगाल में सुभेंदु सरकार ने यह निर्णय लेकर बंगाल की संस्कृति और संस्कारों का फिर से उद्धार किया गया है। धर्म, भाषा, जाति, लिंग, नस्ल और स्त्री पुरुष लेखन आदि का बंटवारा, अभिव्यक्ति का बंटवारा, स्वाधीनता का बंटवारा आदि ने हर बार किसी न किसी व्यक्ति को देश निकाला की सजा मिलती रही है। तस्लीमा का यह लेखकीय वनवास सीता का वनवास ही है जिसको बांग्लादेश के लोक समाज की धार्मिक कट्टरपंथियों का शिकार होना पड़ा। विश्व ने एक ओर उत्तराधुनिकता का जामा पहना दिया है और दूसरी ओर धर्म कट्टरता को निशाना बनाया जा रहा है।
    यह भारत (बंगाल) के लिए एक सराहनीय कदम है कि लेखिका तस्लीमा को एक अपना देश मिलेगा। अपना देश अपना होता है। यहां उनकी आत्मा बसती है। विश्व को भी एक सकारात्मक विचार जा रहा है।
    बांग्लादेश की विद्रोही लेखिका तस्लीमा कोलकाता आने वाली है। यह बांग्लादेश में समान धर्मी मजहब परस्त आवाम की कट्टर लॉबी की क्रूरता का परिणाम है कि वर्ष 1994 के अंत में आखिर उनको अपने ही मुल्क से बेदखल होना पड़ा था। वह स्वीडन जाकर बस गई। उनका दिल और दिमाग तो बंगालियों के बीच रचा बसा था और कोलकाता में उन्हें सुकून मिला। 
    लगभग 20 साल बाद उनका कोलकाता आना किसी लापता व्यक्ति की घर वापसी से कम नहीं है। विवादित बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा दो दशक बाद बंगाल की धरती पर कदम रखने जा रही हैं। आगामी 1 अगस्त को रवींद्र सदन में आयोजित होने वाले एक विशेष सांस्कृतिक व विमर्श कार्यक्रम में वह शिरकत करेंगी।
    वरिष्ठ पत्रकार और ताज़ा टीवी के डायरेक्टर विशवभंर नेवर जी ने सदैव स्वस्थ विचारों का समर्थन दिया है।। हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई। - डॉ वसुंधरा मिश्र, भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज, कोलकाता

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