पूजा स्थलों में चोरी का इतिहास पुराना है
भारत में मंदिरों में चोरी का इतिहास पुराना है। प्राचीन काल में इसे सबसे बड़ा पाप माना जाता था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार, ऐसा करने वालों को राजा द्वारा मृत्युदंड तक दिया जाता था। मध्यकाल में विदेशी आक्रमणकारियों ने मंदिरों की अकूत संपादा को लूटा, जब कि आधुनिक समय में संगठित गिरोह, पुजारियों और कर्मचारियों द्वारा दान और आभूषणों के गबन के मामले सामने आए हैं।
मंदिरों में चोरी और गबन के इतिहास पर नजर डालें तो हमें समरण होता है सोमनाथ मंदिर जो गुजरात में समुद्रतल पर स्थित है। 11 वीं शताब्दी (1025 ईस्वी) में महमूद गजनी ने इस प्राचीन मंदिर पर आक्रमण करके भारी मात्रा में सोना, चांदी आभूषण लूटे। एक मुस्लिम इतिहासकार ने लिखा है कि एक हजार साल पहले इस लूट-कांड की शर्मिन्दगी यह थी कि जब जब सोमनाथ मंदिर पर लुटेरों ने आक्रमण किया कभी लेशमात्र भी प्रतिरोध नहीं हुआ। लूटपाट करने छोटी छोटी नौका में लुटेरे आये होंगे। अगर दो चार सौ गुजराती एक एक पत्थर भी हाथ में उठा लेते तो लूटेरों की हिम्मत नहीं होती। लेकिन कई आक्रमणों में बिना किसी प्रतिरोध या मुठभेड़ के सोमनाथ मंदिर को निर्विघ्र लूटा गया।
मदुरै और तंजावुर (तमिलनाडु) में 1310-1311 ईस्वी के दौरान मलिक काफूर के आक्रमणों में दक्षिण भारत के कई समृद्ध मंदिरों को लूटा गया।
पिछले 75 वर्षों में ममिलनाडु आइडल विंग के आंकड़ों के अनुसार राज्य के 387 मंदिरों से 1224 से अधिक प्राचीन और बहुमूल्य मूतियां (विशेषकर चोल काल की) चोरी हुई जिन्हें विदेशों में तस्करी कर बेचा गया।
हालिया दशकों में बड़े स्वर्ण घोटाले हुए हैं। उत्तर प्रदेश की देवनगरी काशी (वाराणसी) में प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर है। जनवरी 1983 में मंदिर के गर्भगृह में स्थित ज्योतिर्लिंग के 'अर्धाÓ से 2.6 किलोग्राम सोना चोरी हो गया था। इस घटना के बाद यूपी सरकार ने पारंपरिक महंत परिवार से मंदिर का प्रबंधन छीनकर एक ट्रस्ट को सौंप दिया था।
केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में भी चोरी की घटना हुई। केरल उच्च न्यायालय द्वारा सबूत मिलने के बाद सबरीमाला मंदिर में मूर्तियों से सोने की परतें हटाने और आभूषण गायब होने का एक बड़ा घोटाला उजागर हुआ जिसके बाद पुलिस और एकआईटी (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम) ने जांच की।
धर्म का कार्य धार्मिक लोग ही कर सकते हैं। राजनेताओं को धर्म के क्षेत्र में हस्तक्षेप करने का मौका देना धर्म का नाश करना है। धर्म का कार्य शांति से होता है। करोड़ों का चंदा इकट्ठा करके वैभव और विलास के साथ शक्ति-प्रदर्शन करते हुए धर्म का विस्तार कभी नहीं होता। भारतीय ज्ञान-परंपरा में संतों ने कहा है कि जब भी ऐसा माहौल बनेगा, जहां शक्ति-प्रदर्शन होगा, वहां वासना होगी, गैर-जिम्मेदारी बढ़ेगी और अनैतिकता का बोलबाला होगा।
भारत में हजारों वर्ष से मंदिरों की व्यवस्था चली आ रही है। परंपरा-बोध बताता है कि मंदिर में सादगी, शोभा और मर्यादा का मूल्य बोध-होता है। सादगी की अपनी गरिमा और गौरव-होता है। शक्ति प्रदर्शन करते हुए हजारों करोड़ का मंदिर बनाना एक तरह से मलिन मन से निर्मल कार्य नहीं होसकता। मंदिर बनाने के लिए पंूजी से अधिक आस्था और श्रद्धा की आवश्यकता होती है।
आस्था प्रदर्शन और शक्ति प्रदर्शन में अंतर होता है। जब भी धर्म का उपयोग शक्ति प्रदर्शन के लिए किया जाता है, तब वह समाज को हिंसा, निराशा और दंड देता है। धर्म तब राजनीति के लिए प्रयुक्त होता है, तब उसमें वासना और अहंकार का बोध होता है जिससे आध्यात्म की चेतना नष्ट होती है। राजनीतिक आग्रह सात्विक मूल्य-बोध को समाप्त कर देता है।
एक बार की बात है। महारानी अहिल्याबाई ने अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए उस समय के पुराने मंदिरों की शोभा बढ़ाने का कार्य प्रारंभ किया। उन्होंने बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर पर सोने की परत चढ़वाने की इच्छा जाहिर की। तब संत समाज ने उनसे कहा, 'देवीजी,Ó आप जो कर रही हैं इसका कोई लाभ नहीं है। मंदिर में सोने का क्या काम? संतों ने अहिल्याबाई से कहा कि यदि आप मंदिर को सेवा, ज्ञान, संस्कार, आस्था और श्रद्धा का केंद्र बनाएंगी, तो वह अधिक महत्व का होगा। तब महारानी अहिल्याबाई रुक गई और उन्होंगे सेवा तथा शिक्षा के अनेक कार्य किए, घाट बनावायें, धर्मशालाएं बनवाई, लेकिन उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर पर सोना नहीं चढ़वाया।
इसी प्रकार, जब अकबर पुत्र-प्राप्ति की मनोकामना लेकर, अजमेर की दरगाह गया और पुत्र होने के बाद धन्यवाद देने के लिए पुन: वहां पहुंच तो उसने दरगाह की देखरेख करनेवाले लोगों से पूछा, 'मैं दरगाह के लिए क्या करुं?Ó उन्होंने कहा, 'आप क्या करना चाहते हैं?Óअकबर ने उत्तर दिया, 'मैं दरगाह की शोभा बढ़ाना चाहता हंू।Ó तब मौलवियों ने कहा, 'ऐसा मत कीजिए। यहां बहुत सोरे लोग आते हैं। उनके लिए प्रसाद (लंगर) वितरण हेतु एक बड़ा सा कड़ाहा बनवा दीजिए, ताकि सबका भोजन एक साथ बन सके और सभी को प्रसाद प्राप्त हो।Ó तब अकबर ने एक बड़ा कड़ाहा बनवाया, जो आज भी अजमेर की दरगाह में मौजूद है।
इसी प्रकार, जब चर्च में अत्याधिक धन और पंूजी लाई गई, तो बड़े बड़े चर्च बने। उनके माध्यम से शक्ति प्रदर्शन होने लगा और उसके साथ ही अनैतिक कार्य भी। बाद में पादरियों और राजाओं के बीच संघर्ष भी प्रारंभ हो गया।
जब प्रार्ट स्टेंट सुधार आंदोन हुआ, तब यह विचार सामने आया कि कितने दिखाने की आवश्यकता है। चर्च सादगी से भी बनाए जा सकते हैं। इसलिए प्रोर्ट स्टेंट चर्च सादगी के आधार पर निर्मित किए गए। इसी प्रकार जब गुरुद्वारे बने तो उन्हें लोगों की राहत और सेवा का केन्द्र बनाया गया। हिंदू और मुसलमानों के धार्मिक स्थलों में जहां कहीं-कहीं निर्माण के माध्यम से दिखावे की प्रवृत्ति बढ़ी, उससे अलग गुरुद्वारों की आधारशिला सादगी और सेवा पर रखी गई। गुरुद्वारों ने कभी इस बात पर बल नहीं दिया कि उसमें कितना हीरा-जवाहारात हो। इस बात पर बल दिया कि लोगों का दारिद्र कैसे कम हो। इस प्रकार सामाजिक परिवर्तन की आधारशिला रखी।
इसलिए हमें बुद्ध के विवेक, कबीर के तर्क, इस्लाम का म्रातृत्व, शंकराचार्य की श्रद्धा और गुरुनानक की सेवा से प्रेरणा लेते हुए धर्म को लोक कल्याण के मार्क के रूप में समझने की आवश्यकता है।
राजकपूर ने अपनी एक फिल्म में पंजाबी गाना गाकर लोगों में धर्म के नाम पर चंदा बटोरने और हड़प जाने पर कुठााराघात किया था। लगभग 6 वर्ष पहले बनी इस फिल्म 'जागते रहो' का गाना- 'रामनाम जप दे और खान्दे गौशाला दे चन्दे मैं की ट्ठ बोलयां....' यानि धर्म स्थलों पर चंदा चोरी की मनोवृत्ति पुरानी है।
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