इज ऑफ डुइंग बिजनेस भय मुक्त व्यापार करने दें

 इज ऑफ डुइंग बिजनेस भय मुक्त व्यापार करने दें

कुछ दिन पूर्व फैन एंड इलेक्टिक्ल डीलर्स एसोसियेशन की वार्षिक साधारण सभा में बतौर विशेष अतिथि बुलाया गया था। दक्षिण कलकत्ता की एक होटल के शानदार बैनक्वेट में एसोसियेशन के लगभग एक सौ सदस्य उपस्थित थे। चाय के दौरान बातचीत में व्यापारियों ने सरकार द्वारा 'भय आउट भरोसा इन का स्वागत किया लेकिन उनका यह मानना था कि नयी सरकार के अधिकारी परेशानियों एवं भयाक्रान्त का वातावरण समेट कर व्यापारियों को परेशान करना बंद कर दें और भय मुक्त वातावरण पैदा किया जाये तो छोटा हो या बड़ा व्यापारी पूरे भरोसे से काम कर सकता है। परेशानियों के बारे में तहकीकात की तो कई उद्यमियों ने बताया जीएसटी, दुनिया भर के कानून, बात बात पर थाना-पुलिस, इनकम टैक्स के इंस्पेक्टरों का भय के साथ सिंडिकेट और कट मनी की तलवार गले के पास लटकी रहती है। सरकार की औपचारिकाएं एवं छोटे मोटे मामलों में पुलिस एवं अधिकारियों का हस्तक्षेप से व्यापारी परेशान हो जाता है। सरकार के जहन में व्यापारियों की तस्वीर आज भी धन उगाही की मशीन वाली बनी हुई है। पुलिस समझती है हर व्यापारी चोर है और चोरी की कमाई से ही व्यापारी फलता फूलता है। इसीलिए जब किसी झमेले में उलझता है तो पुलिस समझती है जाल में मछली फंसी है। मुझे याद है एक दिवाली की रात कुछ व्यापारी रस्मी तौर पर जुआ खेल रहे थे। यह बिल्कुल सही है कि जुआ खेलना गैर कानूनी है किन्तु परम्परागत रूप से दिवाली के दिन लोग जुआ खेलते हैं। कोई लम्बी चौड़ी हार जीत नहीं होती किन्तु दिवाली की रात ताश के पत्ते के साथ पैसे का वारा-न्यारा होता है। पुलिस इस बात को जानती है कि ताश खेलने वाले पेशे से जुआरी नहीं है। पुलिस छापा मारती है और तथाकथित जुआरियों की धर पकड़ करती है। उनसे मोटी रकम भी वसूली जाती है। स्वभाव से भीरू व्यापारी जेल जाने या पुलिस कस्टडी से बचने की कीमत चुकाता है। ऐसे ही व्यापार करने की सौ पेचीदियों एवं औपचारिकाताओं के जाल में फंसकर व्यापारी को मामला रफ दफा करने के लिए कीमत चुकानी पड़ती है।



व्यापारी वर्ग पूरा सरकारी नुमाइन्दों के पावर को समझता है और उन्हें एसी करेंट समझकर उनसे दूरी बनाकर रखता है। उनके विरुद्ध आपस की अड्डेबाजी में खरी खोटी बोलता है किन्तु सामने पडऩे पर वह आंख बंद कर लेता है। कई साल पहले मैं किसी छोटे टाउन में एक परिजन व्यापारी की गद्दी में बैठी था। उस जमाने में मोबाइल नहीं था। सेल्स टैक्स, और टेलीफोन ऑपरेटरों के गोरखधन्धे की बात कर रहे थे कि किसी ने आकर कहा कि सर आ गये हैं। बस मरघट की सी शान्ति छा गई। वह टेलीफोन ऑपरेटर था जो दूरगामी ट्रंक कॉल का प्रभारी था। ट्रंक कॉल के आधे पैसे वसूलने आया था। कुछ समय पहले तक सरकारी मुलाजिम के भ्रष्टाचार का गला फाड़कर उपहास करने वाले व्यापारी में उस 'सर' की खातिर तवज्जो करने लगे और मुनीमजी ने उसके हाथ में एक लिफाफा थमा दिया। कहनेे का अर्थ है कि कारोबार में भ्रष्टाचार के अंकुर भी व्यापारी भई ही जाने अनजाने पैदा करते हैं और जब वह अंकुर कंटीला पौधा बनकर काटने लगता है तो व्यापारी कराहने लगता है। भ्रष्टाचार के सृजन में लालची सरकारी कर्मचारी और बनिये दोनों का योगदान है। लेकिन बाद में खामियाजा सिर्फ व्यापारी को ही भुगतना पड़ता है।

राजनीतिक और प्रशासनिक दावों के उलट, कई राज्यों में व्यापारी वर्ग अपनी सुरक्षा और निष्पक्ष माहौल को लेकर आवाज उठाता रहा है। राजस्थान के सीकार और झुँझुनूं में खाद-बीज व्यापारियों ने अवैध वसूली और उतपीडऩ के खिलाफ महासम्मेलन आयोजित किया था, जिसमें पूरे प्रदेश से व्यापारियों ने भयमुक्त व्यापार के माहौल की मांग की थी। मैं उन व्यावसाइयों की प्रशंश करता हूं जिन्होंने आवाज उठाई। राजस्थान से आकर बंगाल में पीढिय़ों से बसे हमारी भाइयों की भी विचार करना चाहिये।

प. बंगाल में किसी समय उद्योगों का जाल बिछा था। किन्तु कई कारणों से स्थिति बिगड़ती गई और आज हमारा राज्य औद्योगिक दृष्टि से गिरकर 16 वें स्थान पर पहुंच गया है। 8 हजार छोटे बड़े उद्योग बन्द हो चुके हैं। नयी सरकार के सामने यह बड़ी चुनौती है कि इन उद्योगों को पुनर्जीवित करें। सरकार ने वादा किया है कि बंगाल का तेजी से औद्योगिककरण होगा। टाटा जो बंगाल से बेआबरू होकर चले गये थे फिर से लौटने के लिये नई सरकार कटिबद्ध है। भविष्य में क्या होगा पता नहीं आज बंगाल की आबरू छोटे और मझोले उद्योगों यानि एमएसएमई ने बचा रखा है। कृषि क्षेत्र में भी बंगाल ने उल्लेखनीय विकास किया है। बंगाल अब एक बाजार बन गया है और इसी बाजार ने आर्थिक रूप से इस राज्य को बचा रखा है। व्यापार में जुटे लोगों को संरक्षण प्रदान करना सरकार का दायित्व है। ताकी स्थिति और खराब न हो।

तीन दिन पहले आलू पोस्ता मर्चेन्ट्स एसोसियेशन में जो घटनायें हुई वह दुर्भाग्यजनक ही नहीं चिन्ताजनक भी है। पोस्ता मर्चेन्ट्स एसोसियेशन के कार्यालय में घुसकर एसोसियेशन के सचिव के साथ मारपीट, गाली गलौच की घटना का वीडियो वायरल हुआ। ताजा टीवी समेत अन्य चैनलों ने घटना को प्रमुखता से दिखाया। इस मामले को राज्य सरकार गंभीरता से ले। किसी बदले की भावना से व्यापारियों पर हमला एनं उनके साथ मारपीट से सरकार के प्रति व्यापारियों से अविश्वास बढ़ेगा। पिछले अप्रैल-मई में हुये चुनाव में सभी व्यापारियों ने, भाजपा को वोट देकर जिताया। क्या पार्टी भूल गई अपने संरक्षकों को।

सिर्फ घोषणाओं से विश्वास नहीं जमता। पिछली तृणमूल की सरकार के खिलाफ कट-मनी, भय पैदा करने की कोशिश और तोलाबाजी का गंभीर  आरोप है। अब जब वह सरकार विदा हो चुकी है और सबसे ज्यादा खुशी व्यापारी वर्ग में है। ऐसी स्थिति में व्यापारियों को अब तक के दु:स्वप्र ये निकाल कर सुरक्षा का वातारण पैदा करना सबसे अधिक जरूरी है। राज्य उन छोटे व्यापारियों को जगह दे जिनके दुकान या घर उजाड़े जा चुके हैं। यह सही है कि रेलवे स्टेशनों और प्लेटफार्म पर अवैध कब्जा से यात्रियों को परेशानी होती है लेकिन बिना नोटिस दिये रात के अंधेरे में उनके प्रतिष्ठानों को उजाडऩा सामाजिक प्याय की अनदेखी है।

मैं पुन: अपने मूल बिन्दु पर आना 

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