राजनीतिक आतंक के साये में मनी राम नवमी


 राजनीतिक आतंक के साये में मनी राम नवमी

राम का नाम भारतवासियों के लिए आस्था ही नहीं अटूट विश्वास का पर्यायवाची है। आवाम को जब कुछ नहीं सूझता तो वह ‘राम भरोसे’ सब कुछ छोडक़र आंख मंूद लेता है। पूरी मानवता के लिए राम मार्गदर्शक बन गये हैं। बेशक राम में कुछ तो ऐसा है कि वे कालपार होने का नाम नहीं लेते। लाखों साल बाद भी श्रद्धा रूप में जीवित रहते हैं। राम की छवि आज भी एक आदर्श पुत्र, पति भाई व शासक की है और इसी से प्रेरित आम आदमी रामराज के सपने पालता है। राम का कृतित्व बहुआयामी है। वे धर्मनिरपेक्ष, जाति, पांति तथा ऊंच नीच से दूर है। विष्णु के अवतार के रूप में नहीं एक बनवासी के रूप में प्रजा के सबसे नीचे के तबके को साथ लेकर रावण का संहार उनका ऐसे रूप है जो हर वर्ग के आदमी के दिल में बसा है। रावण बध में किसी राजा, नरेश, महात्मा का साथ न लेेकर भील बानर, पक्षी, जैसी वनजातियों के समर्थन से अति पराक्रमी रावण का बध करके मानवता को आतंक से मुक्त किया। यही नहीं श्री राम दुर्बल को सताने, मारने तथा उनका शोषण करनेवालों को पहले तो सत्पथ पर लाने का प्रयास करते हैं पर जब ऐसे लोग अत्याचार की सीमा पार करने लगते हैं तब राम दुष्टहंता बन जाते हैं। सागर को सोख लेने पर उतर जाते हैं, अग्रिवाण साध लेते हैं, दुराचारी बाली जैसों को छुपकर बध करने से परहेज नहीं करते हैं।

कभी राम भक्त राम नवमी जुलूस की अगवानी करते थे। अब यह जगह पुलिस ने ले ली है।

मैंने पहले भी यह मुद्दा उठाया था कि राम जैसा कोई दूसरा आदर्श नहीं है फिर भी राम के मन्दिरों की संख्या अन्य देवों की तुलना में नगण्य ही हैं। इसका सर्वोपरि कारण है कि राम को लोगों ने दिल में बसाया है, अपनी सांसों में समाहित किया है और उनकी भक्ति में राममय हो गये हैं। राम मन्दिरों के निर्माण में राम भक्तजनों ने कभी आस्था का मूर्तरूप नहीं दिया। यही वजह है कि जहां शिव, हनुमान, राधा कृष्ण के अनगिनत मंदिर बनाये गये हैं राम के मंदिरों की संख्या बहुत ही कम है बल्कि नगण्य कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। राम के प्रति आस्था, भक्ति और राम मंदिरों के निर्माण में कोई सामंजस्य नहीं दिखाई देता।

राम स्मरण में राम नवमी देश में बड़ी गरिमा और आस्था के साथ मनाई जाती रही है। राम नवमी का जुलूस एवं झांकी निकालने का परम्परा है जिसमें राम के विभिन्न रूपों की अभिराम झांकी दिखाई जाती है। राम की कृतियों और उनके विभिन्न व्यक्तित्व को राम नवमी के जुलूस में दर्शाया जाता है। झांकियां देखकर राम के कृतित्व एवं व्यक्तत्वि को हृदयंगम करने की परिपाटी चली आ रही है। कालान्तर में राम के महान चरित्र को अपनी राजनीति में समेट कर भुनाने की कोशिश की जा रही है, जिसको आम आदमी भी समझता है। बंगाल में चुनाव अगले माह के अन्त में है तो राम नाम की चादर ओढक़र जनता के जहन में प्रवेश करने का प्रयास चल रहा है।

चुनाव के मद्देनहर राम नाम को भुनाने में कई लोग जुटे हुए हैं। इस वर्ष रामनवमी के जुलूस भी बड़ी संख्या में निकाले गये हैं। राम की भक्ति को दिल से निकालकर उसे प्रचार तंत्र की भेंट चढ़ाने का उपक्रम चल रहा है। राम नाम के प्रति अचानक उड़म घुमड़ कर भक्तिभाव को देश की राजनीति जनोन्मुखी की बजाय प्रचारमुखी बनाने की घृष्टता कर रहा है। राम के आदर्श की बजाये राम नाम के नारों एवं धर्मान्धता पैदा करने का एक प्रायोजित प्रयास है। इस कर्मकांड में कमोंबेश सभी पार्टियां हैं। उनका ख्याल है कि जन सेवा और आदर्श के कांटों भरे रास्ते की बजाय गर्जन तर्जन करके काम निकालना ही अधिक लाभप्रद है।

बंगाल भक्तों और साधकों की भूमि है। यहां एक से एक चूड़ामणि हुए हैं। सभी ने राम के आचरण को जीवन में पिरोया है। पर अब राजनीति  में राम नाम की माला जपकर मन लुभावन और अपने स्वार्थ साधन का हथियार बना लिया है। बंगाल में चुनाव 29 अप्रैल को है। इसके लगभग एक माह पहले राम नवमी को वे एक सुखद संयोग का वरदान समझते हैं। इसीलिये भगवा मानसिकता के कथित योगियों ने चार हजार जुलूस या शोभायात्रा निकाल कर जनता को लुभाया। पिछले साल की तुलना में यह संख्या में एक हजार अधिक है। 

चुनाव को ध्यान में रखते हुए राम नवमी को बड़े रूप में उद्घेषित किया है। सभी प्रार्थियों को हिदायत है कि वे यह मौका नहीं चूकें। एक राजनीतिक खिलाड़ी ने कहा कि है कि दो करोड़ हिन्दुओं के राम नवमी जुलूस में शामिल होने का अनुमान है। इसका आयोजन किसी राजनीतिक दल की ओर से नहीं पर चुनाव जिनका एजेन्डा है उनको अधिक से अधिक इन झांकियों एवं जुलूसों में फोकस किये जाने की सुनियोजित योजना है। रामनवमी उत्सव मनाने के लिये राजनीतिक मुखौटा उतार कर भक्ति भाव में ओतप्रेात चेहरा दिखाई दिया है। रामनवमी उद्यापन समिति के एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि पिछले साल 3,200 जुलूस झांकियां एवं पूजा आयोजित की गई थी। उत्तर बगाल में 925 स्थानों पर रामनवमी जिसमें कोई 23 लाख लोगों की भागीदारी थी। मध्य बंगाल में 1,150 स्थानों पर 9.5 लाख लोगों ने भाग लिया। दक्षिण बंगाल में 1575 रामनवमी आयोजन हुए और 14 लाख लोगों ने इसमें भाग लिया। इस बार 4 हजार से अधिक आयोजन किये जाने गये है।

राम नवमी को चुनाव के साथ प्रत्यक्ष रूप में नहीं जोड़ा गया है पर दुर्गापूजा की तर्ज पर रामनवमी को सामाजिक-धार्मिक त्यौहार या उत्सवों की तरह मनाया गया है। राम नवमी के दिन कोई फसाद न हो इसके लिये बड़े पैमाने पर पुलिस तैनाती की गई। राम भक्ति पर आस्था से अधिक आतंक हावी हो गया है। किसी बुरी घटना की आहट है। कुला मिलाकर भले ही सीधे नहीं रामनवमी एक राजनीतिक आयोजन की तर्ज पर मनायी जा रही है। हिन्दुू वोटों को रिझाने के लिए राम नवमी का पवित्र दिन राजनीतिक एजेन्डा के नाम करवाने का प्रयास कहां तक सफल हुआ है, चुनाव के नतीजे ही बता पायेंगे पर धर्म के नाम पर राजनीतिक स्वास्थ्य साधने मेें कोई कसर नहीं छोड़ी जायेगी। 


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