बेबस चूल्हे और लाचार गृहणियां
करें तो करें क्या?
पश्चिम एशिया में सुलग रही ईरान और इजरायल के बीच युद्ध की चिंगारी अब भारत की उन रसोइयों तक पहुंच चुकी है जहां अन्नपूर्णा गृहणियां अपने परिवार का पेट भरती है। यह एक अजब और दुखद संयोग है कि 8 मार्च को यानी एक सप्ताह पहले ही नारी दिवस पर महिलाओं के सशक्तिकरण और उनके कल्याण की गूंज हुई थी। गैस की किल्लत ने नारी को साबला से अबला बना दिया।
स्ट्रेट ऑफ होर्मूज से होने वाली कैसा पूर्ति बाधित होने के कारण भारत में कमर्शियल गैस की कीमत भी बढक़र 115 रुपये कर दी गई और एलपीजी का दाम एक साथ 60 रुपये बढ़ा दिया गया है। दाम बढ़े सो बढ़े भारत में कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर का भारी अकाल पड़ गया है। अयोध्या में भगवान राम के बहुचर्चित राम मंदिर की रसोई में भी जंग की आंच पहुंच गई है जिसके फलस्वरूप प्रतिदिन लगभग 20 हजार श्रद्धालुओं को मुफ्त में भरपेट भोजन कराया जाता था, बंद करना पड़ा है। मिड डे मील भी संकट में पड़ गया है अभी तक कब इसमें ग्रहण लग जाएगा कहना मुश्किल है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने लेकिन स्पष्ट किया है कि बेवजह आतंक पैदा किया जा रहा है उन्होंने आश्वासन दिया है कि मिड डे मील, मां कैंटीन और अस्पतालों में गैस की आपूर्ति सुचारू रूप से जारी रहेगी।
कोलकाता और 24 परगना की मां कैंटीन से चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही हैं। संबंधित विभाग को डर है कि यदि स्थिति ऐसी रही तो अगले कुछ दिनों में खाना बंद करना पड़ सकता है। अस्पतालों में भी मंा कैंटीन चलती है। कर्मचारियों का मानना है कि आने वाले समय में समस्या विकराल रूप धारण कर सकती है। अस्पतालों में मरीजों के परिजनों का निवाला खतरे में है। कई स्कूलों में जलने लगी है लड़कियां की भट्टी। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने ‘एक्स’ पर कहा, सरकार सस्ती ऊर्जा की आपूर्ति सुनिश्चित करने को प्रतिबद्ध है। लोग घबराए नहीं, लेकिन वास्तविक हालात पर गौर करें तो ईरान ने यह साफ कर दिया है कि एक बूंद तेल बाहर नहीं जाने देंगे। चिंता की बात यह है की जंग के जल्द खत्म होने की कोई सूरत नजर नहीं आ रही उल्टे ईरानी फौज ने होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाज के गुजरने को लेकर जैसी शर्तें रखी है वह हालत को और गंभीर बन सकती है। हालात सामान्य होने की बजाय कालाबाजारी के जटिल दलदल में फंसकर और भयावह हो गई है देश में आवश्यक वस्तु अधिनियम को भी लागू किया है ताकि गैस सिलेंडर या पेट्रोल डीजल की कालाबाजारी पर अंकुश लगे।
प. बंगाल को ही ले लें जहां स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि आरामबाग की प्रसिद्ध ‘मां कैंटीन’ में अब मजबूरन लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाया जा रहा है। गैस सिलेंडर की किल्लत का असर स्कूलों के मिड डे मील और होम डिलीवरी व्यवसाय पर भी पड़ा है। आरामबाग नगर पालिका द्वारा संचालित दो मां कैंटीन में से मेडिकल कॉलेज परिसर वाली कैंटीन अभी भी बंद है। कैंटीन बंद होने के कारण उन गरीबों और असहायों को भारी परेशानी हुई जिन्हें मात्र 5 रुपये में भोजन मिलता था।
हमने कोरोना महामारी के समय देखा था कि जहां कुछ लोग अपनी जान की परवाह करते हुए संक्रमित लोगों की तीमारदारी और मृतकों की गरिमापूर्ण अंतिम विदाई में जुटे थे ठीक उसी समय हमारे समाज में कई लोग ऑक्सीजन सिलेंडरों और कुछ खास दवाओं, इंजेक्शन की कालाबाजारी कर रहे थे कई वाहन चालक तो लाश ढोने के बदले मजबूर परिजनों से मनमाना भाड़ा वसूल रहे थे। मौजूदा संकट एक बार फिर नागरिकों की परीक्षा ले सकता है।
प्रधानमंत्री ने तेल व गैस आपूर्ति सुचारू रखने के निर्देश दिए हैं ताकि आम आदमी को कोई परेशानी ना हो। हम जिन्हें आम आदमी कहते हैं उनमें अधिकांश ऑटो रिक्शा या अन्य सस्ती सवारी का उपयोग करते हैं। सीएनजी से चलने वाले ऑटो रिक्शा को गैस नहीं मिल पा रहा है और इसकी कालाबाजारी हो रही है। बिहार से बंगाल तक सीएनजी गैस जहां पहले 70 रुपये प्रति लीटर उपलब्ध था वहीं अब इसके लिए ऑटो ड्राइवर को कालाबाजारी में 130 रुपए खर्च करने पड़ते हैं। इसे रोकने में केंद्र विफल है। दावे करने में कुछ भी किया जा सकता है पर वास्तव में स्थिति को नियंत्रित करने में प्रशासन फिसड्डी साबित हो रहा है। पेट्रोलियम मंत्रालय का दावा है कि देश में एलपीजी की मांग 31. 3 मिलियन टन है जबकि उत्पादन 12. 8 मिलियन टन अभी भारत 40 देश से कच्चा तेल गैस खरीद रहा है।
यहां यह उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा कि देश की आजादी के पश्चात भारत में तेल व गैस की खोज के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पहल की थी। उस वक्त विरोधी दल जिनमें आज का सत्ताधारी दल के पूर्वज शामिल थे ने नेहरू का घोर विरोध किया था। यही नहीं जब तेल की खोज के लिए रूस के विशेषज्ञ बुलाए गए तो कुछ राजनीतिक विरोधियों ने नेहरू पर रूस के हाथ भारत को बेचने तक का आरोप लगाया था किंतु नेहरू जी ने प्रयास जारी रखा। तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग (ओएनजीसी) की विरोध के बावजूद स्थापना की एवं उसीका नतीजा है कि आज अपनी आवश्यकता का लगभग 17 - 18' तेल हम निकल पा रहे हैं। नेहरू के बाद भी सरकारों ने इस और कोई विशेष प्रयास नहीं किया।
पहले घोषणा कि गैस को लेकर कोई संकट नहीं, उसके बाद कड़ा नियंत्रण लगा। केंद्र का पहले दवा कि पर्याप्त गैस भंडार मौजूद है, दूसरी और 30 दिन से पहले बुकिंग नहीं ली जा रही। वाणिज्यिक सिलेंडरों की बिक्री बंद! नतीजा आम जनता भारी परेशानियों के भंवर में। जिम्मेदारी किसकी? संकट की जानकारी होते हुए भी पहले से योजना क्यों नहीं बनाई गई? फिर अचानक आवश्यक वस्तु अधिनियम के जरिए कड़ा नियंत्रण लागू। आम आदमी का जीवन दूभर तो होगा ही। माननीय प्रधानमंत्री जी ब्रिगेड की जबरदस्त रैली को संबोधित कर गए लगता है उनके एजेंडा में गैस संकट से अधिक बंगाल में सत्ता परिवर्तन है देखना है बंगाल में ऊँट किस करवट बैठेगा?
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