वोटर को जागरूक करने वाले, मताधिकार की भ्रूण हत्या पर चुप्पी साधे रहे!
राज्य में चुनाव की विधिवत घोषणा के पश्चात कई नामधारी संस्थाओं ने अपने बैनर तले लोगों को वोट के प्रति जागरूकता पैदा करने के निमित्त गोष्ठियां की। सुधि वक्ताओं ने लोगों को मतदान में भाग लेने की अपील की। मंच से कुछ लोगों ने मतदान को नागरिक कर्तव्य बताया, कुछ का कहना था कि जिनको लोकतंत्र में विश्वास है उन्हें मतदान अवश्य करना चाहिए क्योंकि ‘चैरिटी बिगिंस एट होम’ यानी नेक काम की शुरुआत पहले अपने घर से होती है। कुछ वक्ताओं ने इसे सामाजिक कर्तव्य बताया तो कुछ लोगों ने इसे देशभक्ति की संज्ञा भी दी। सबने अपने-अपने तरीके से वोट देने की महिमा का बखान किया। देश या अपने राज्य के भविष्य निर्धारण में आप अपने वोट से ही प्रतिभागी बन सकते हैं। कुछ वक्ताओं को यह शिकायत थी कि इन वोट के दिन वोटर छुट्टी मनाते हैं। वे भूल जाते हैं कि आज छुट्टी इसलिए दी गई है ताकि आप सुगमता से अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें। यह कड़वा सच है कि लोकतंत्र और राष्ट्र निर्माण की बात करने वाले वोट के दिन चादर तान कर सोते हैं। वोट देने नहीं जाते, बाद में शिकायत करते हैं कि लंबी लाइन थी। कौन अपना समय जाया करे वगैरह-वगैरह। ऐसे लोग भूल जाते हैं कि विकलांग लोग उनसे बेहतर है कि वह व्हीलचेयर के सहारे वोट देने जाते हैं। मतदान के लिए उन्हें सरकार हर तरह की सुविधा देती है। आप अगर अस्वस्थ हैं तो एंबुलेंस भी मंगा सकते हैं। कोलकाता में इस बार बड़े आवासी कॉम्प्लेक्स में मतदान केंद्र खोल दिए गए हैं ताकि मतदाता को कड़ी धूप में बाहर नहीं निकालना पड़े। इसके बावजूद कुछ लोग पूरा दिन आलस्य की भेंट चढ़ा देते हैं। कुछ मतदाताओं का मानना है कि उनके एक वोट से क्या फर्क पड़ता है। पूरे मामले को गंभीरता से नहीं लेते हैं। खैर लोकतंत्र में एक वोट की कीमत बताने की जरूरत नहीं है। कुछ लोग अपनी धुन में रहते हैं। उनके लिए मतदान एक अनावश्यक औपचारिकता है जिसे पूरी न भी करें तो कोई फर्क नहीं पड़ता।
मैंने जिन गोष्ठियों व सभाओं का उल्लेख किया है वह सभी गणमान्य नागरिकों द्वारा आयोजित की गई थी किंतु पता नहीं क्यों वक्ताओं ने वोट देने के महत्व से अधिक या उससे ऊपर उठकर कोई बात ही नहीं कही। यही कारण है कि अधिकांश गोष्ठियां फोटो सेशन बन कर रह गई। इन मंच से हम यह भी चर्चा करते कि निष्पक्ष एवं निर्भीक होकर वोट देने में क्या बधाएं आती हैं, इस पर भी चर्चा होनी चाहिये थी। वोट को किस प्रकार अधिक धनबल, बाहुबल एवं सत्ता बल के प्रभाव से मुक्त करने पर चर्चा होती तो गोष्ठियां सार्थक होती। हो सकता है ऐसा उन्होंने इसलिए नहीं किया हो कि इन चर्चाओं से कोई विवाद उत्पन्न ना हो जाए।
यह आशंका निर्मूल नहीं है लेकिन सोचें कि चुनाव के प्रति लोगों में बेरुखी का बड़ा कारण यह है कि आम आदमी सोचता है कि सभी भ्रष्ट हैं, चोर हैं इसलिए उसके दिल और दिमाग में लोकतंत्र की वह छवि नहीं पनप पाई जिसकी जरूरत थी। यही नहीं चुनाव में ‘मुफ्त की रेबड़ी’ं आम बात हो गई है। ‘नोट फॉर वोट’ का तांडव भी हम देखते हैं पर इस पर चोट करने की जोखिम कोई नहीं उठाना चाहता। यही वजह है कि वोट के प्रति जागरूकता लाने की कवायद समस्या के मर्म तक नहीं पहुंच पाई। ऐसी गोष्ठियां जनजागरण की बड़ी मुहिम बन सकती है। बशर्ते कि मुद्दे की अहमियत को समझते हुए हम उन पर चर्चा करते। हर समस्या का समाधान संभव नहीं होता पर उसकी और ईमानदारी से प्रयास किया जा सकता है।
एक और महत्वपूर्ण बात। इस बार 90 लाख से अधिक लोगों के नाम मतदाता सूची से बाद हो गए हैं। यह एक बड़ा मसला है जिसने लोकतंत्र के लिए परेशानी पैदा की। इन नाम में बड़ी संख्या में वे नाम हैं जो विगत कई चुनावों से वोट डाल रहे हैं। सभी राजनीतिक पार्टियों ने जिसमें सत्ताधारी भाजपा भी शामिल है ने माना है कि कई वास्तविक वोटर के नाम भी मतदाता सूची से गायब हैं। चुनाव आयोग भी इसका समाधान निकालने के लिए कार्य कर रहा है। न्यायपालिका को भी इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा है। ऐसे अहम् मुद्दे पर इन गोष्ठियों में गणमान्य नागरिकों की चुप्पी एवं निर्लिप्त भाव खल रहा था। इस पर किसी वक्ता का नहीं बोलना गोष्ठियों के मूल उद्देश्य पर एक बड़ा सवाल है।
हम यह मानते हैं कि एक वोट सत्ता बदल सकता है तो लाखों वोटरों के मताधिकार पर चुप्पी?
Comments
Post a Comment