एक कर्मयोगी का
महाप्रयाण
सरदारमल कांकरिया का हावड़ा स्थित जैन हॉस्पिटल में निधन हो गया। वे 98 वर्ष के थे। दो वर्ष मृत्यु से और समझौता कर लेते तो हम उनकी जन्म शताब्दी मनाते। केवड़ातला में सरदारमल जी की अंत्येष्ठि में उनके परिजन एवं प्रशंसक बड़ी संख्या में उपस्थित थे। मैंने ललित जी (उनके सुपुत्र) का हाथ पकड़ा और कहा कि दो वर्ष और रुक जाते तो हम सबकी इच्छा पूरी हो जाती। ललित जी ने एक मंद मुस्कान के साथ कहा हमारे सोचने से क्या होता है? बात भी सही है हमारे या आपके सोचने से उम्र नहीं रुकती। वह तो अपना वक्त पूरा करके जाती है। वैसे जीने के बारे में मैं वैदिक काल के ऋषि चारवाक की बात को अधिक व्यवहारिक मानता हूं। चारवाक ने जीवेम शत: वाली बात नहीं की। जीवन को उम्र के खूंटे से बंाधा नहीं। उनका कहना था- यथो जीवते सुखम जीवते। इनकी दूसरी पंक्ति ‘ऋणम् कृपा घमृतम् पीवेत’ विवादास्पद है। जब तक जीयें सुख से जीयें। उम्र से कोई फर्क नहीं पड़ता। अंतिम सांस तक सरदार मल जी ने कर्म योगी का जीवन जिया और फिर चैन से प्रस्थान कर गए। न स्वयं कष्ट भोगा और ना किसी को जरा सी तकलीफ दी। अंतिम एक सप्ताह के अलावा सरदारमलजी बिना कष्ट पाये चले गए। उनका महाप्रयान आकस्मिक था। यह भी मार्के की बात है कि सरदार मल जी ने अपने ही बनाए हुए श्री जैन हॉस्पिटल, हावड़ा में अंतिम सांस ली। इतिहास साक्षी है, जिन दानदाताओं ने अस्पताल बनवाये, उन्होंने अंतिम सांस किसी नामधारी अस्पताल में जाकर ली। सरदार मल जी ने साधारण लोगों के लिए अस्पताल खोला। उसको आधुनिक अस्पताल बनाने में अपना जीवन खर्च किया और फिर वहीं अंतिम सांस ली। ऐसे कर्मयोगी की मृत्यु पर आंखें नम नहीं की जाती मृत्यु महोत्सव मनाया जाता है। मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है। यह अवस्यम्भावी है लेकिन जीवन को लोगों की भलाई में उत्सर्र्ग करने वाला जाने के बाद अपनी कार्य वृत्ति के अनुपात में याद किया जाता है।
कांकरिया जी ने स्कूल, कॉलेज, अस्पताल खुलवाने एवं उसके संचालन में अपनी आहुति दी। जीवन के हर क्षण का सदुपयोग किया। समाज के सामने झोली फैलाई और ऐसे निष्ठावान व्यक्ति की लोगों ने भी झोली भर दी। आज जैन अस्पताल (हावड़ा), जैन विद्यालय, कोलकाता श्री श्वेतांबर स्थानकवासी जैन सभा, श्री जैन विद्यालय फॉर बॉयज एंड गल्र्स, हावड़ा, हराकचंद कांकरिया जैन विद्यालय, जगदल, टीएचकेजैन कॉलेज, काशीपुर, केएसएस जैन कॉलेज, काशीपुर, केएसडी जैन डेंटल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, काशीपुर, एस पीके जैन फ्यूचरिस्टिक एकेडमी, राजारहाट, विचार मंच, कुसुम सुंदर दुग्गड़ हायर एज्युकेशन फंड, बुक बैंक प्रोजेक्ट, आदि आदि संस्थाओं की स्थापना या संचालन या दोनों सरदार मल जी के जीवन की कृतियां हंै जो इस कर्म योगी की स्मृति को अक्षुण्ण रखेंगी। उन्होंने शिक्षा, सेवा, साधना और सहयोग को अपने जीवन का मूल मंत्र बनाया। इसी लक्ष्य के लिए काम करते रहे। स्वयं आठवीं कक्षा तक ही पढ़ सके किंतु उच्च शिक्षा और तकनीकी पढ़ाई के लिए जीवन का हर पल व्यतीत किया। जब जैन स्कूल की स्वर्ण जयंती मनी तो किसी अतिथि ने कहा कि यह तो बुजुर्गों की देन है, स्वयं ने क्या किया? यह बात मन को लगी तो समाज से 100 करोड़ से भी ज्यादा एकत्र कर शिक्षा के लिए संस्थाओं की स्थापना की। विचार मंच बनाकर समाज के विभिन्न क्षेत्र के कर्मशील लोगों को सम्मानित करने का सिलसिला शुरू किया जिससे सैकड़ों साहित्यकार, लेखक, पत्रकार, चिंतक उपकृत हुए। उदयपुर में गणेश जैन छात्रावास, नागौर में उच्च माध्यमिक विद्यालय, पेय जलापूर्ति हेतु कुएं एवं तालाब का निर्माण, कोलकाता (बिराटी) में मातृ सेवा सदन, काकरिया चैरिटेबल ट्रस्ट, नेत्र शल्य चिकित्सा एवं विकलांग शिविर, बुक बैंक, काशीपुर में जैन कॉलेज जैसे दर्जनों जनोपयोगी शिक्षक एवं चिकित्सा के केंद्र की एक ऐसी श्रृंखला सरदार मलजी के व्यक्तिगत पहल एवं हौसले की देन है। सरदारमल जी ने शिक्षा को ही तीर्थ माना और लोगों की नजरों में तीर्थंकर बन गये।
सरदारमलजी का 98 वर्ष तक सक्रिय जीवन एक सुखद आश्चर्य है। कुछ वर्ष पूर्व तक नियमित तैराकी से अपने शरीर को अक्षय बनाकर सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय में व्यतीत कर सरदारमल कांकरिया का 11 अप्रैल ’26 को अवसान सार्वजनिक जीवन जीने वाले लोगों के लिए बहुत ही यादें एवं आदर्श छोड़ गया है।
कई बार उनके हितेषियों ने भारत सरकार से उन्हें पद्म पुरस्कार दिलाने का प्रयास भी किया। वैसे सरदारमल जी की कृति उन बहुत से लोगों से कहीं अधिक थी जिन्हें पद्मश्री से नवाजा गया। खैर कांकरिया जी ने एक आधुनिक और विकासशील भारत की जड़ों को सिंचित कर संसार से विदा ली।
सरदार मल कांकरिया उस पीढ़ी के अंतिम स्तंभ के थे जिन्होंने एक ऐसे समाज गढऩे का भगीरथ प्रयास किया जो शिक्षा, आपसी सहयोग एवं दूसरों के लिए जीना सीखाता हो। वे न तो शिक्षाविद् थे, कोई पूंजीपति लेकिन एक आधुनिक विचारशील चिंतक थे जिनके केंद्र बिंदु में मनुष्य था जिसके लिए कभी राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त ने लिखा था- मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे। आज रत्नगर्भा भारत भूमि में हमारे समाज में ऐसा व्यक्ति प्रतीत नहीं हो रहा जिन्हें उनका उत्तराधिकारी समझा जाए। आने वाले वर्षों में स्कूल, कॉलेज, अस्पताल तो बहुत खुलेंगे क्योंकि आज के युग में यह सभी चीज चरित्र निर्माण से कहीं अधिक पूंजी निर्माण का साधन बन गया है। खैर जो भी हो, सरदारमल कांकरिया ने अपना जीवन, उद्देश्य पूर्ण जीवन के लिए जीया। ऐसे लोग मरते नहीं लेकिन उनका अनुसरण करने वाला कोई विरला ही हो पता है।
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