होली है भारत का अघोषित राष्ट्रीय त्योहार

 होली है भारत का अघोषित राष्ट्रीय त्योहार

प्रकृति के नियमानुसार होली के आने तक पेड़ों के पत्ते झड़ जाते हैं। पेड़ नंगे हो जाते हैं और इसके बाद नये पत्ते आना शुरू हो जाते हैं। यानी प्रकृति अपने मूल स्वरूप में आ जाती है। प्रकृति में यह पतझड़ गुजरने के बाद बसंत के अंगड़ाई लेने का भी प्रतीक है होली। समय के साथ होली पर रंगोत्सव भी बदला है। किसी जमाने में होली पर गांव व कुछ शहरों में महिलाओं का घर से निकलना बंद हो जाता था। अब महिलाएं सजग है, आत्मरक्षा करना जानती है। इसलिए महिलाओं के साथ होली में वह हरकतें नहीं होती। आज की होली भारतीय समाज में शिक्षा के हस्तक्षेप की कहानी है। प्रेम के रंग में रंग जाना और सबको इस रंग में रंग लेना। यह हर तरह के गिले शिकवे भूलकर उत्सव में डूब जाने का अवसर होता है। पूर्वोत्तर से पश्चिमी राज्यों तक होली के रूप बदलते चलते हैं, किंतु न ऊर्जा में कमी आती है और ना ही प्रेम में। पूर्वोत्तर में मणिपुर में प्रभु के मंदिर में दर्शनों के लिए पूरा प्रदेश उमड़ पड़ता है। मणिपुर के लोग वर्षों पुराने घाव को भूलकर प्रभु के मंदिर में दर्शनों के लिए पूरा प्रदेश उम्र पड़ता है और इसके बाद हर गली मोहल्ले में, हर गांव शहर में बड़े-बड़े आयोजन होते हैं और पूरा देश खेल के मैदान में बदला हुआ नजर आने लगता है। हमारे पश्चिम बंगाल में इस अवसर पर दोल यात्रा का आयोजन किया जाता है वहीं उत्तर प्रदेश में बरसाना की लट्ठमार होली, राजस्थान की गैर और हरियाणा की कोड़ामार होली की अपनी अलग पहचान है। मध्य भारत और दक्षिण भारत के राज्यों में भी रंगोत्सव के भिन्न रूप हैं मथुरा में श्री कृष्ण जी के मंदिर में रंगोत्सव देखने लायक होता है।

विडम्बना यह भी है कि कुछ लोग नशे जैसे व्यसन से इतनी प्रेम भरे पर्व का स्वरूप ही बिगाड़ देते हैं। संदेह मध्य वर्ग में नशाखोरी की लत पहले से बढ़ी है। होली तो मध्य वर्ग का ही त्यौहार है। रईस लोग आधुनिकता के परिवेश में होली का आनंद नहीं ले पाते हैं। गरीब तो जीने की आपाधापी में होली कहां बना पाते हैं? इसलिए मध्यम आय वाले समूह ही होली का भरपूर आनंद ले पता है। भारत में 75' से अधिक जनसंख्या मध्य वित्त की है।

कोविड कल में याद कीजिए। 2 वर्षों तक लोग अपने घर में कैद रहे। इन 2 वर्ष के कारावास के बाद रंगों के त्यौहार ने लोगों को खुली हवा में सांस लेने का मौका दिया। ठीक 2020 वर्ष की होली के समय कोविड ने हमारे दरवाजों पर दस्तक दी। पहली बार लोगों ने दरवाजा के साथ खिड़कियां भी बंद कर ली थी। खुली हवा में जैसे जहर घुल गया हो। वह समय गुजर गया। होली फिर खुशियां लेकर आई हैं। अपनी विविधता के सौंदर्य से होली मनाने का समय आ गया है। हमारा देश विविधता को जीने वाला देश है। अलग-अलग है वेश और भूषा, अलग-अलग है बोली, किंतु भावना एक हमारी एक हमारी टोली- भले देखने में अनेक हैं किंतु देश के लिए एक है। होली नहीं खेलने वाले भी रंगों के साधन होते हैं। रंगो के साथ अपनी विविधता समेटे यह त्यौहार भारतीय संस्कृति और सौहार्दता का रंग बिखेरती होली का दूसरा स्वरूप है होलिका दहन जिसमें हम घर के जमा जंजाल को स्वाहा करते हैं। होली के बाद मौसम भी बदल जाता है। उष्णता का आगमन होता है शरद विदाई लेते हुए हमें भी जीने के तरीके बदलने का संदेश देता है। गर्म कपड़ों को हम ठिकाने लगाते हैं एवं खुले वह हल्के कपड़ों को ढूंढ निकालते हैं। राजस्थान, पंजाब, हरियाणा में जहां भीषण गर्मी आदमी को झुलसा देती है इस बीहड़ता को सहने की प्राकृतिक शक्ति देती है।


होली को धार्मिक त्योहार समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। हालांकि इसके परिपेक्ष में कई धार्मिक मान्यताएं हैं। होली एक विशुद्ध सांस्कृतिक पर्व है जिसका प्रकृति से सीधा संबंध है। सीमाओं पर हमारे जवान उस पार लोगों के साथ होली खेलते हैं और गोली को भूलकर एक दूसरे को रंग लगाकर होली खेलते हैं। अनेक मुस्लिम कवियों एवं गीतकारों ने इस त्यौहार में एक से एक गीत लिखे हैं। होली के संदर्भ में कृष्ण भक्ति से उनको परहेज नहीं है। अमीर खुसरो ने 13वीं सदी में लिखा - मोहे अपने ही रंग में रंग देख ख्वाजा जी,  ‘मोहे सुहागन, रंग बसंती रंग दे’ तो 17वीं सदी में बाबा बुल्ले शाह ने लिखा -  ‘होरी खेलूंगी कह बिस्मिल।’ जहांगीर मोहम्मद शाह रंगीला, बहादुर शाह जफर और ऐसे कई बादशाहों ने धर्म की बंदिश से ऊपर उठकर होली को अपनाया।

होलिका और हिरणकश्यप की बहु प्रचलित कहानी के अलावा एक और कहानी जुड़ी है। शिव का काम पर क्रोध करना और फिर उसे भस्म कर देना और अंत में काम की पत्नी रति के आग्रह पर उसे केवल भाव के रूप में वापस जीवित करना। यह कहानी बहुत प्रचलित नहीं है पर काफी रोचक है। इसके मनोविश्लेषण की जरूरत है। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह समाज के काम संबंधी विकार के शोध का ही एकमात्र महापर्व है। शायद यही कारण है की होली का नाम आते ही हम रोमांचित हो जाते हैं। रोमांस का भाव जागृत हो जाता है। एक गुदगुदी सी होती है। यह याद दिलाती है कि प्रेम वासना नहीं है, बल्कि एक भाव है, शरीर से ऊपर उठ आत्मा तक पहुंचाने का एक रास्ता है। इसी रास्ते की खोज करने वाले चैतन्य महाप्रभु का यह जन्मदिन भी है। इसलिए बंगाल में यह धार्मिक उत्सव भी है। चैतन्य महाप्रभु ने बंगाल में होली उत्सव का रूपांतरण कर श्री कृष्ण की दो यात्रा का प्रचलन किया। खास बात यह भी है कि चैतन्य महाप्रभु के समय जिनके साथ रंग खेलने होता था, उसे अनुमति लेनी पड़ती थी।  

होली विभिन्न रंगों, विभिन्न मान्यताओं, भिन्न-भिन्न रंग रूपों और प्रवृत्तियों की सम्मोहक होली है। भारत जैसे देश का यह घोषित राष्ट्रीय खेल है। दो शब्दों की ‘ हो ली’ भारत के इतिहास की सत् कथा है। 

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