मारवाड़ी समाज का एक अद्भुत रविंद्र संगीत साधक जिसे मृत्यु के बाद याद किया गया
हिन्दी फिल्मों के मशहूर अमर गायक मन्ना दे ने जनवरी 1994 में पत्र लिखकर श्री दाऊलाल कोठारी से मिलने की इच्छा व्यक्त की। 82 वर्षीय मन्ना दे ने एलबम बनाया और दाऊलाल जी के हिन्दी में अनुदित विश्वकवि गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर के 13 गीतों के साथ वह गीत भी गाया जो दाऊलालजी ने रवींद्र संगीत के विषय में लिखा था। उस गीत को मन्ना दे ने स्वयं स्वरबद्ध किया और इस प्रकार दाऊलालजी के हिन्दी में रवींद्र गीतों को गाकर रवींद्र-संगीत के बराबर स्थान दिया एवं अमर बना दिया।
ऐसे दाऊलाल कोठारी का 5 फरवरी को अल्प समय बीमारी के बाद निधन हो गया। मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य होती है। लेकिन दाऊलाल कोठारी जैसे विरल व्यक्तित्व के लिए 89 वर्ष में मृत्यु भी एक उत्सव की तरह होनी चाहिए थी किन्तु जिन्हें भाषा और संस्कारित होने पर नाज है उनके लिए यह गौर करने की बात है कि कोठारी जी का चला जाना एक पारिवारिक शोक तक सीमित रह गया। 16 फरवरी को सार्वजनिक तौर पर उनके निधन की सूचना मिली। आज के समय जब सुबह से रात तक दस पन्द्रह बार ब्रेकिंग न्यूज दिखाई जाती है भाषा प्रेमियों या साहित्य जगत के दुलारे दाऊलाल जी के परलोक गमन की जानकारी 12 दिन बाद मिली। यह भी एक बिडम्बना है कि अयोध्या के राम मंदिर बाबरी मस्जिद विवाद पर देश भर में कोहराम मचाने वाले भी भूल गए कि कोठारी जी के दो भतीजे राम और शरद इसी राम मंदिर आंदोलन के लिए शहीद हुए थे। इस लिहाज से भी दाऊलाल जी को स्मरण करने की किसी ने आवश्यकता महसूस नहीं की। खैर मैने मन को हल्का करने अपनी इस पीड़ा को शब्द दिए हैं।
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राजस्थान से लाखों का संख्या में लोग रोजगार के निमित्त अपनी जन्मभूमि छोडक़र कलकत्ता आए थे। दाऊलाल कोठारी भी उनमें से एक थे। यहाँ के पाट की ब्रोकरेज (दलाली लिखना अपशब्द माना जाता है) करते थे। मेरे पिताजी यही काम करते थे। अत: जब मेरे घर आते तो पाट से बारे में उनका विचार विनिमय हो जाया करता था। मेरे साथ उनका परिचय एक झगड़े के माध्यम से हुआ। 8 मई को कवि गुरु के जन्म दिन पर मैंने उनकी एक कविता जो धर्मयुग में छपी थी, ‘छपते-छपते’ में प्रकाशित कर दी। जब उन्हें पता चला तो वे तमतमाए से मेरे कार्यालय आए। मैंने उनका गुस्सा यह कहकर शान्त किया कि उनकी वह रचना मुझे बहुत अच्छी लगी और मैं छापने का लोभ संवरण नहीं कर सका। वे शान्त हुए और फिर हमने बहुत सी बातें की। एक मारवाड़ी होकर रवींद्र संगीत में उनकी सक्रियता से मेरे मन में उनके प्रति बहुत सम्मान था और शायद उन्हें भी अच्छा लगा कि एक मारवाड़ी ने उनके साहित्य की प्रशंसा की। उसके बाद से वे मेरे पत्र में लिखने भी लगे और मैं भी उनकी रचनात्मकता और रवींद्र संगीत का मुरीद हो गया। फिर तो उनसे मुलाकातें होती रहीं। उनसे ही प्रेरित होकर मैंने वर्ष 2017 में रवींद्र संगीत का राजस्थानी भाषा में अनुवाद कराने का प्रण लिया। और इस कार्य में मुझे प्राथमिक सहायता एक बंगाली महिला श्रीमती जलज भादुड़ी से मिली। जलज रवींद्र संगीत मर्मज्ञ थी। बंगाली होते हुए भी वह मारवाड़ी भाषा जानती थी। लखनऊ में वर्षों तक रहीं इसलिए हिन्दी तो अच्छी थी ही, उनके पति सेल टैक्स के नामी वकील थे और घर पर प्रतिदिन मारवाड़ी व्यापारी आया करते तो उन्हें मारवाड़ी भाषा की भी समझ हो गई। मेरे आग्रह पर जलज जी ने टैगोर के दस गीतों का राजस्थानी अनुवाद किया। फिर पश्चिम बंगाल प्रांतीय मारवाड़ी सम्मेलन जिसका मैं उस समय अध्यक्ष था ने मामले को आगे बढ़ाया। कई मारवाड़ी गृह वधुओं से सम्पर्क किया जो गीत संगीत में कुशल थीं। जलज जी के अनुदित राजस्थानी गीतों के शब्दों को ठेठ राजस्थानी भाषा में तराशा गया। यह काम आसान नहीं था। बंगला से हिन्दी फिर राजस्थानी और फिर उसको ठेठ राजस्थानी शब्दों में पिरोना एक बहुत ही पेचीदा काम था जिसे गुलाब बैद, मंजू कोठारी ने पूरा समय देकर और निष्ठा पूर्वक पूरा किया। सुप्रसिद्ध गायिका कल्पना जैन के सुपुत्र सत्यजीत जैन ने उसे संगीतबद्ध किया। फिर मैने कई गायक और गायिकाओं से सम्पर्क कर एक टीम बनाई। मुझे गर्व है कि एक वर्ष से अधिक की अनवरत मेहनत और दर्जनों रिहर्सल के बाद ‘टैगोर के गीतों का राजस्थानी कारवां’ नाम से एक ‘संगीत इवेन्ट’ आईसीसीआर आडिटोरियम में हमने आयोजित किया जिसका उदघान किया पश्चिम बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल केशरी नाथ त्रिपाठी जी ने जो स्वयं एक वरिष्ठ कवि व साहित्यकार थे। मुख्य अतिथि थे वरिष्ठ सांसद व सुप्राम कोर्ट में एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी। इस कार्यक्रम में दाऊलाल जी भी मेरे निवेदन पर आए एवं स्वागत भाषण में मैंने दाऊलाल जी से प्रेरणा का उल्लेख कर उन्हें खड़े होने का आह्वान किया तो पूरा हाल तालियों से गूँज उठा। इसके बाद इसी कार्यक्रम को संगीत कला मंदिर के आग्रह पर हमने कला मंदिर में भी मंचित किया। इस तरह दाऊलाल कोठारी जी की दुर्लभ एवं साहसिक परम्परा को हमने किंचित आगे बढ़ाने का प्रयास किया, यह हम बड़े फक्र के साथ कह सकते हैं।
हिन्दी और बंगला भाषाओं की जानकारी, संगीत की गहराई तक पैठ और रवींद्र साहित्य के प्रति अनन्य निष्ठा के कारण दाऊलाल जी के अनुवाद चर्चित और प्रशंसित हुए। उनके कार्य को रविन्द्र साहित्य व संगीत के मर्मज्ञों का भी स्नेह और सद्भाव प्राप्त हुआ है। कोठारी जी हिन्दी और बंगला के सेतु का काम कर बंगाल में रहने वाले कई करोड़ राजस्थानियों व हिन्दी भाषा लोगों का जो उपकार किया है उसको इतिहास कभी भूल नहीं सकता। लेकिन दाऊलाल जी को जितना सम्मान और विशिष्ट पहचान बंगाली साहित्य व संगीत प्रेमियों ने दिया, उसका एक अंश भी हिन्दी और राजस्थानी समाज नहीं दे सका। कभी आश्चर्य होता है यह सोचकर कि पन्द्रह सौ किलोमीटर का सफर कर कलकत्ता आए इस साधारण से मारवाड़ी व्यक्ति ने क्योंकर रविन्द्र संगीत जैसे एवरेस्ट चोटी की ऊँचाई नापी इस गुत्थी को हम सुलझा नहीं पाये। खैर,दाऊलाल जी ने हिन्दी को समृद्ध किया व मारवाड़ी समाज पर जिसे लोग अक्सर सिर्फ व्यापारी होने की गलतफहमी पाल बैठे हैं को इस

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