एक मध्यवित्त परिवार की त्रास्दी - खेल खेल में तीन मासूम बहनों ने अपनी ही जान ले ली

एक मध्यवित्त परिवार की त्रास्दी

खेल खेल में तीन मासूम बहनों ने अपनी ही जान ले ली

जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते थे, स्कूल में पढऩे जाते थे उस नाजुक उम्र में जब कोई बच्चा आत्महत्या कर लेता है तो हम उसकी मानसिक स्थिति का अदंाजा लगा सकते हैं कि वह किस तनाव से, किस भ्रम की स्थिति से गुजर रहा होगा। गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) की एक सोसाइटी में तीन नाबालिग बच्चियों के घर की नवीं मंजिल से कूदकर सामूहिक आत्महत्या करने की खबर वास्तव में दिल दहला देनेवाली है। इस आत्महत्या की घटना के एकमात्र चश्मदीद गवाह ने जो देखा और बयान किया वह और भी चिंताजनक है कि किस प्रकार छोटी लडक़ी ने अपनी पीठ पर चढ़ाया और दूसरी बच्ची का हाथ पकडक़र रात दो बजे 9 तल्ले के बरामदे से कूद गई।

अभी तक जांच पड़ताल में जो खबर सामने आई है कि तीनों बच्चियों सगी बहनें थीं। पिता ने दो शादी की थी एक बच्ची पहली पत्नी एवं दो बच्चियां दूसरी पत्नी से थी। तीनों एक साथ रहती थी और एक दूसरे से बहुत लगाव रखती थी। निशिका की उम्र 16, प्राची की 14 और पाखी की उम्र 12 साल थी। आत्महत्या करने से पहले उन्होंने अपने मम्मी-पापा के नाम एक नोट लिखा था कि सॉरी। देश में पहला मामला संभवत: ‘पबजी’ और उसके बाद ‘ब्लू व्हेल’ को लेकर आया था जिसमें बच्चे ने आत्महत्या कर ली थी। उसके बाद तो न जाने कितने गेम बन गए जिसके शिकार छोटे बच्चे से लेकर किशोर युवा तक हो रहे हैं। बच्चों और किशोरों के बीच गेमिंग की लत भारत में एक बढ़ती हुई चिन्ता बन रही है। यह समस्या इतनी गंभीर है कि दुनिया के कुछ देशों ने किशोर द्वारा मोबाइल का इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध लगा दिया है।

आत्महत्या करने वाली इन बच्चियों ने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि हमें कोरियन बहुत पसंद है। प्यार, प्यार, प्यार। इसे ही अपनी असली जिंदगी की कहानी बताते हुए लिखा है कि ‘जो कुछ इन पन्नों में दर्ज है, उस पर भरोसा किया जाए।’ डायरी में यह आरोप भी लगाया गया है कि माता-पिता उनकी पसंद और भविष्य के फैसलों यहां तक कि शादी से लेकर भी उनके खिलाफ थे। डायरी के एक पन्ने पर लिखा है आपने (माता-पिता) हमें कोरियन छोडऩे के लिए मजबूर करने की कोशिश की। कोरियन ही हमारी जिंदगी थी। आप हमारी शादी किसी भारतीय से करवाना चाहते थे लेकिन ऐसा कभी नहीं हो सकता।

इस डायरी में सजा दिये जाने का जिक्र भी किया गया है और अंत बेहद दर्दनाक और मार्मिक शब्दों से होता है। बहनों ने अपने पिता से माफी मांगते हुए लिखा ‘आपकी मार से हमारे लिए मौत बेहतर है। इसी वजही से हम आत्महत्या कर रहे हैं। सॉरी पापा।’

इन सारे मामले कों सिर्फ बच्चों के मोबाइल गेम की लत न होने का बताकर किसी नतीजे पर पहुंचना मेरे ख्याल से जल्दबाजी होगी। उन बच्चियों को आत्महत्या के आगोश तक लाने के सारे पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिये। कोविड यानि तीन वर्ष पूर्व लड़कियों को अपनी स्कूल जाना बंद करा दिया गया था। लड़कियों के पिता विदेशी मुद्रा का व्यवसाय करने वाले पिता चेतन कुमार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि वे बच्चियों की स्कूल फीस भी नहीं दे पाये थे। इसी के परिणामस्वरूप लड़कियों को स्कूल जाना छुड़ा दिया गया था। बाप पर दो करोड़ रुपये का कर्ज हो गया था। पन्द्रह दिन पूर्व पिता ने लड़कियों के मोबाइल फोन बेचकर बिजली का बिल भरा था। ऐसी नौबत आ गई थी। इसके बाद बच्चियों ने मां का मोबाइल इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। लेकिन हाल ही में पिता ने वह भी ले लिया। अब मोबाइल के बिना बच्चियां बिन पानी मछली की तरह तड़पने लगी थी। कोरियन गेम ही नहीं कोरियन कल्चर के प्रति उनका आकर्षण इतना हद से गुजर गया था कि उनमें कोरिया जाने की आकांक्षा फलीभूत हो गई। कोरियन संगीत और वेब सीरीज उनका दैनंदिन शौक व कमजोरी बन गया था। कुल मिलाकर कोरियन संस्कार व संस्कृति के प्रति उनमें समर्पण भाव उमड़ गया। उनका व्यवहार, बातचीत करने का तौर तरीका सब में आमूल-चूल परिवर्तन आ गया। वे एक खाल (शेल) में रहने लगी थी। उन्होंने अपनी एक दूसरी दुनिया तैयार कर ली। वे एक ऐसी स्थिति में पहुंच गई जहां से वापस आना उनके लिये मुश्किल ही नहीं असंभव था।

कुछ पहलुओं को भी इस घटना के मद्देनजर देखा जाना चाहिये। लड़कियां  जब तक पढ़ रही थी, मोबाइल उनकी हमदम नहीं बना था, यह यात्रा शुरू होती है जब पिता की आर्थिक बदहाली से परिवार अंधकार में डूब गया। ऐसे में ‘जेन-जी’ उम्र वाली बच्चियों का मोबाइल जीने का सहारा और समय गुजारने का एकमात्र विकल्प रह गया। उनके सूने जीवन में मोबाइल और उसके अंदर कोरियन गेम ‘काला जार’ की तरह घुस गया। जाहिर है लड़कियों से माता-पिता का संवाद छूट गया। पिता अपने आर्थिक आधार को खोजने में इतना व्यस्त और डूब गया हो कि लड़कियां उनकी प्राथमिकता नहीं रही। इस संघर्ष में उसने यह सोचा नहीं कि मेरी बच्चियों का भविष्य क्या होगा। पिता इधर अपने दिवालियेपन की स्याह मिटाने में अपने को खपा दिया तो दूसरी तरफ लड़कियों ने अपनी एक आभासी दुनिया बना ली। तीनों बहनों ने एक दूसरे को सहारा दिया और वे घर में रहकर भी घर से दूर हो गई जहां उनके लिये माता-पिता नाम की कोई चीज नहीं थी। पिता ने मोबाइल छीनकर बिजली का बिल भरा तो इस करेंट को बच्चियां भावनात्मक रूप से बर्दाश्त नहीं कर सकी। उनकी आभासी दुनिया उजड़ गई। ऐसी स्थिति में पिता आत्महत्या कर लेता जैसा कई मामलों में घटनाएं सामने आती हैं कि कर्ज में डूबा पिता अपने परिवार के साथ जीवन लीला समाप्त कर देता है। लेकिन पिता ऐसा न कर सका या उसने ऐसा नहीं किया। इसलिए मोबाइल को सभी अवसादों की जड़ में खोजना उचित नहीं होगा। मोबाइल की लत बच्चों एवं युवकों में लग रही है और उस पर अंकुश भी जरूरी है किन्तु दूसरी स्थितियों पर भी गौर करना आवश्यक है। 

निश्चित रूप से आत्मघात की ये घटनायें हमारी नीति-नियंताओं और अभिभावकों को आसन्न संकट के प्रति सचेत करती है। समाज विज्ञानी इस बात पर भी बल देते हैं कि केवल गेमिंग या ऑनलाईन मित्रता ही आत्महत्या का कारण नहीं बन सकती है। नि:संदेह आत्महत्या एक जटिल और बहुआयामी घटना है। डिजिटल युग में किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। इन त्रासदियों को टालने हेतु तत्कालिक प्रतिक्रियाओं की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इसके लिऐ जरूरी है कि माता-पिता को भी डिजिटल जागरुकता प्रदान की जाए। स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने तथा किशोरों के लिए मनोवैज्ञानिक परामर्श उपलब्ध करना सुनिश्चित करने की भी जरूरत है। 

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