बंगाल का महाकुंभ गंगासागर - आस्था सर्वोपरि

 बंगाल का महाकुंभ गंगासागर 

आस्था सर्वोपरि

हाल तक कहा जाता था- ‘सब तीरथ बार-बार गंगासागर एक बार।’ सभी जानते हैं गंगा सागर द्वीप तक पहुंचने में अपार कष्ट का सामना करना पड़ता था। पहले कोलकाता शहर आइये, फिर सडक़ रास्ते हाड़ू पॉइंट, काकद्वीप, नामखाना से जहाज से उस पार पहुंचने के बाद फिर 20 किलोमीटर सडक़ रास्ते गंगा सागर मेला क्षेत्र में पहुंचिये। मकर संक्रांति की भोर 4 बजे तक एक करोड़ के लगभग पुण्यार्थी पहुंचते हैं। यह संख्या कभी कम हुई तो उसका कारण महाकुंभ या अद्र्ध कुंभ का उसी साल होना था। अन्यथा कडक़ सर्दी के बावजूद तीर्थ यात्री अपार कष्ट पाकर भी आस्था की डुबकी लगाने कपिल मुनि के मंदिर परिसर पहुंचते हैं। अब पहले जैसी विकेट असुविधा नहीं है, रास्ते भी ठीक हो गए हैं। सुविधाओं का लाभ मिलता है पर तीर्थाटन में सैलाब अपरवर्तित है। आने वाले दिनों में मुड़ी गंगा पर लंबा पुल बनने के पश्चात लॉट नंबर 8 (नामखान के समीप) से 5 किलोमीटर का चार लेन वाला लंबा पुल काकद्वीप से गंगासागर दीप को जोड़ देगा। फलस्वरूप कोलकाता पहुंचकर सीधा गंगासागर मेला क्षेत्र में पहुंचा जा सकेगा। इस सेतु का शिलान्यास पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कर चुकी है। सुप्रसिद्ध कॉंट्रेक्टर एल एंड टी (लार्सन ऐंड टुब्रो) को 1670 करोड़ रुपए का ठेका दिया है। उम्मीद है कि लगभग 3 वर्षों के अंदर यह पुल बनकर तैयार हो जाएगा। फिर गंगासागर पहुंचना बहुत आसान हो सकेगा। कम से कम ‘सब तीरथ बार-बार गंगासागर एक बार’ कहावत तो हमेशा के लिए खारिज हो जाएगी। तीन-चार वर्षों बाद तीर्थ यात्रियों की यात्रा सुगम हो जाएगी। फिर इच्छा शक्ति होगी तो गंगासागर पहुंचना, डुबकी लगाकर बिहार तक उसी दिन शाम तक लौटना संभव हो जाएगा।


जब पुल गंगा सागर की तीर्थ यात्रा को सुगम बना देगा आप सोचते होंगे कि ऐसे समय तीर्थ यात्रियों की संख्या में भारी वृद्धि होगी। पर आपका यह सोचना आपको सुखद अनुभूति दे सकता है पर यह सच नहीं है। तीर्थ स्थान पर चाहे वह गंगासागर हो या महाकुंभ या अर्ध कुंभ, एक बड़ी संख्या में आस्थावान जैसे भी हो पुण्यस्थल पर पहुंचने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल सकते हैं। यही कारण है कि केदारनाथ, बद्रीनाथ, वैष्णो देवी, अमरनाथ तीर्थ यात्रा कितनी भी बीहड़ क्यों ना हो हर बार तीर्थ यात्री सारी बाधाओं के बावजूद वहां पहुंचते हैं और तब तक चलते हैं जब तक सरकार यात्रा बंद नहीं करवाती।

हर वर्ष बीहड़ पहाड़ों में हजारों फीट की ऊंचाई से बस खड्ड में गिर जाती है और तीर्थ यात्रीगण काल के मुंह में समा जाते हैं। उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों में एक के बाद एक वर्ष में प्राकृतिक आपदा के कारण हजारों तीर्थ यात्री जान गंवा बैठते हैं किन्तु पवित्र स्थलों पर लोगों की संख्या में कमी नहीं आई है। 

हमारा देश धर्म एवं कृषि प्रधान देश है। वैसे धर्म और खेती एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। खेतिहर किसान भगवान भरोसे ही रहते हैं। कुछ खेतों में नहर का पानी मुहैया होता है बाकी सब जगह किसान आसमान की ओर देखता है। बारिश देर से हुई तो किसान की आंखों से बरसात होती है। बारिश नहीं हुई या ज्यादा हुई तो किसान को प्राकृतिक अराजकता का खामियाजा भोगना पड़ता है। स्थिति में कुछ परिवर्तन हुआ है पर किसान की मुसीबत में कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ा है। समय पर बीज नहीं मिलते हैं, खाद नहीं मिलती तो खेतों में पानी की जगह आंसू बरसते हैं। प्राकृतिक प्रकोप का सबसे अधिक खामियाजा भी किसान को ही भुगतना पड़ता है। आप किसी भी तीर्थाटन में जाएं वहां आस्था का सैलाब किसानों से भरा रहता है। एक दूसरे का साथ पडक़र किसान डुबकी भी लगता है और मिलों तक पैदल चलकर मंदिर की चौखट तक पहुंचता है। ईश्वर को नमन करने के अलावा उसके पास कोई दूसरा भरोसेमंद साधन नहीं होता। किसान आंदोलन एक साल से अधिक चला और लगभग 700 किसान शहीद हो गए तब जाकर सरकार को तीन ‘काले कानून’ वापस लेने पड़े। सीमा पर तैनात जवान जो देश की रक्षा करता है, शहीद होता है वह भी किसी किसान का बेटा ही होता है। खेतिहर किसान या मजदूर की अटूट श्रद्धा धर्म और परमात्मा पर होती है। वह ईश्वरीय शक्ति के सामने नतमस्तक होता है। तीर्थ यात्री हो या दर्शन में वह झंडा उठाकर सबसे आगे रहता है। ऊपर वाले की कृपा कितनी बरसती है यह तो नहीं मालूम लेकिन अपनी तरफ से हर कष्ट उठाने में आगे रहता है। मेरा यह मानना है की सुविधा चाहे कम मिले अथवा ना मिले आस्था अटूट रहती है। 

गंगासागर में या कुंभ में सरकारी और धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं द्वारा सेवा दी जाती है ताकि उनकी तीर्थ यात्रा सुगम हो। दरअसल यह सामाजिक कर्तव्य है जिसका पालन किया जाना चाहिए। इस कटु सत्य के बावजूद कि सुविधाओं एवं सुगमता से तीर्थ यात्रियों का तीर्थाटन संख्या में कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता, संस्थाओं को अपने कर्तव्य पालन में नहीं चूकना चाहिए। गंगासागर मेला क्षेत्र में एवं कोलकाता के बाबूघाट की लंबी पट्टी में 100 से अधिक सेवा संस्थाएं गंगा सागर यात्रियों के लिए प्रति वर्ष हर संभव सेवा देती है। साधु-संतों की सेवा में भी कोई कसर नहीं की जाती। यह मानवीय कर्तव्य है जिसका निर्वाह होना चाहिए लेकिन यह गलतफहमी नहीं हो कि लाखों तीर्थ यात्री इन सेवा संस्थाओं के भरोसे अपने घर से निकलते हैं। कोलकाता की कई संस्थाओं का अस्तित्व ही गंगा सागर यात्रियों की सेवा सुश्रुषा पर निर्भर करता है। मैं ऐसी कई संस्थाओं को जानता हूं जिनका साल में गंगासागर सेवा शिविर ही लगता है दूसरी कोई उल्लेखनीय गतिविधि नहीं है।

लोगों की अटूट आस्था पर टिकी हुई है सम्पूर्ण धार्मिक व्यवस्था। इसी अटूट आस्था का शोषण हमारे राजनेता करते रहे हैं। यह अकाट्य सत्य है कि आम जनता अपनी आस्था को तुष्ट करने के लिऐ शारीरिक कष्ट को झेलते हैं। राजनेताओं को जनता की इस दुर्बलता का भरपूर दोहन किया जाता है। इसी के चलते हमारा लोकतंत्र धर्मापेक्षी बनता जा रहा है। आज धर्म के नाम पर जो हो रहा है उसकी सजा हमारी आनेवाली पीढ़ी को भोगना पड़ेगा। 

      लम्हो ने खता की है- सदियों ने सजा पाई।  

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