सोना -चांंदी, तेल, रुपैया सन् 25 का ताता थैया

सोना -चांंदी, तेल, रुपैया

सन् 25 का ताता थैया

ओलंपिक खेलों में भारत द्वारा सोने की चाह हमारे खिलाडिय़ों को बेचैन कर देती है। एक गोल्ड मिल जाये तो उस अहसास से हमारा सीना चौड़ा हो जाता है। सोने की चाह में हम रजत पाकर भी संतोष करने के लिए प्रस्तुत रहते हैं। अंत में कांस्य से ही हमारे देश को संतोष करना पड़ता है। हम उसी की खुशी मनाते हैं और अगले ओलंपिक में कुछ कर गुजरने का प्रण लेकर अपने खिलाडिय़ों को ऊर्जावान करने में प्रयास में जुट जाते हैं। सोने की चाहत से माता सीता भी अपवाद नहीं रही। राजपाट का वैभव छोडक़र स्वेच्छा से वन गामिनी द्वारा सोने के हिरण की चाहत लंका दहन का कारण बनी। यह ‘सुखद’ संयोग है कि वर्ष 2025 में सोना-चांदी में उछाल का रेकार्ड टूट गया। सोना चांदी की जुगलबन्दी ने बिखरी चमक से हमारी आंखें चौंधिया गई किन्तु ‘हाई जम्प’ में लिक्विड गोल्ड कहा जाने वाला खनिज ‘तेल’ ने भी करामात दिखाई। दुनिया के इस मेले में गोल्ड, सिल्वर और पेट्रोल की हरकत देखकर हमारा रुपया भी कब चुप बैठता। रुपया ने भी डालर के सामने तांडव नृत्य कर अपनी ऊंचाई को सोना-चांदी-तेल के खेल में सुपर परफारमेंस दिखाया। दुनिया देखती रही और हमने पूरा कायनात को दिखा दिया कि भारत के रुपये की क्या औकात है।


हाई जम्प और लॉंग जम्प के इस खेल में हमारी इकोनोमी ने भी उछाल के इस ओलंपियाड में तालियां बटोरी। हम विश्व की चौथी सबसे बड़ी इकोनोमी बनने का फक्र महसूम कर रहे हैं। हमारी इकोनोमी ने जापान के हिरोशिमा-नागाशाकी के विस्फोट को ओवरटेक कर दिया। हिरोशिमा-नागाशाकी में मानवीय तबाही के लिए जापान आज भी अमेरिका का ऋणी है और उसका आभार मानता है। यहां तक कि अपनी सुरक्षा के लिये सेना का खर्च बचाकर अमेरिका को ही अपनी सुरक्षा कवच का दायित्व दे दिया ताकि नागासाकी-हिरोशिमा में नयी तबाही से उऋण हो सके। जापान अमेरिका की कृपा से और कुछ अपने पौरुष से आर्थिक ताकत बन गया। भारत  के जांबाजों ने उसके कान काट दिये और ईस्ट या वेस्ट इंडिया इज बेस्ट को सही करने में चरितार्थ किया।


हमारे ‘हांडी फोड़’ तमाशा को देखकर सारी दुनिया चकित है। कैसे पिरामिड बनाकर दूध-दही-मक्खन की हांडी फोडक़र उसके व्यंजन को भीड़ बटोरती है यह हमारे साधनों का समान रूप से वितरण का एक देशी फॉर्मूला है।

आप सोचते हैं किमैं व्यंग्यात्मक लहजे में इकोनोमी की मजाक उड़ा रहा हंू किन्तु रोने से तो बेहतर है कि हम झूठ ही सही कुछ गुदगुदी पैदा करें ताकि गम गलत हो जाये। हमारी चौथी विश्व इकोनोमी के पराक्रम को मैं और क्या नाम दंू। इसलिये मैंने इस शैली का प्रयोग किया है।


सोना-चांदी में उछाल से भले ही आपके होश उड़ गये हों पर हम एक जमीनी सच्चाई को भूल जाते हैं कि आम आदमी के लिये सोना-चांदी सपने से कम नहीं है। यह सपना आवाम भरी दोपहर भी देखती हैं। गाड़ी का पेट्रोल सौ के पार होकर भी अगर गाड़ी की गति में ब्रेक नहीं लगाता है तो हमारी फास्ट ग्रोइंग इकोनोमी का हमें कायल होना चाहिये।

हमारा पड़ोसी देश चीन-1 जनवरी से सिल्वर एक्सपोर्ट लाइसेंस नियम लागू करने जा रहा है जिसका मतलब है कि बड़े और सरकारी मान्यता प्राप्त एक्सपोर्टर्स ही चांदी बाहर भेज पायेंगे। इससे ग्लोबल सप्लाई पर असर होगा और डिमांड बढ़ेगी। इस भावोत्तेजना के कारण चांदी के दाम में तेजी है। आपको बता दंू कि 60 से 70 फीसदी ग्लोबल चांदी उपलब्धता का चाीन से डायरेक्ट और इनडायरेक्ट कनेक्शन है। बताया जाता है कि चीन बड़े स्तर पर चांदी की खरीददारी कर रहा है जिसकें कारण दाम कर होने का नाम नहीं ले रहा है। हमारे एक सर्वज्ञानी पड़ोसी ने तो हमें यह कहकर चौंका दिया कि चीन जो अब दुनिया का सर्वशक्तिमान देश है, एक कृत्रिम सूर्य बना रहा है जिसके लिये उसे कई हजार टन चांदी चाहिये। इसलिऐ चांदी में तेजी बेरोक टोक है।

तेल का खेल भी अच्छे अच्छों की समझ से बाहर है। विश्व बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय से स्थिर ही नहीं कम हुई है। लेकिन उस अनुपात में भारत के बाजार में डीजल-पेट्रोल के दाम नहीं घटे हैं। बताया गया ह कि विश्व में कच्चे तेल की कीमतों और भरत में पेट्रोल डीजल के खुदरा दामों के बीच कोई सीधा रिश्ता नहीं है। तेल के बाजार में बड़े नाम धारियों की गुफ्तगू से पता चला है कि 2026 में डीजर पेट्रोल के दाम में कभी होने की कोई संभावना नहीं है।

कुल मिलकर चांदी उछल रही है, सोना दौड़ रहा है, तेल का खेल भी अपने पूरे शबाब पर है, ऐसे में भारत की इकोनामी अपने पूरे पराक्रम पर है। ऐसे में महंगाई का रोना नक्कार खाने में तूती की अवाज से कम नहीं है। फिर इसमें किसी को अफसोस नहीं करना चाहिये क्योंकि भारत सरकार 80 करोड़ लोगों को फ्री राशन दे रही है। यह संख्या बढ़ाई भी जा सकती है। खाना फ्री मिले फिर सोना-चांदी तेल जहन्नुम में जाये और फिर इस बात पर तो हर भारतीय को फक्र होना चाहिये कि हमारी इकोनोमी बुलेट ट्रेन की स्पीड़ से चलकर दुनिया की चौथी विराट इकोनोमी बन गई है। दु:ख करेगा तो जापानी करेगा, हम क्यों मलीन हो रहे हैंं।

भारत कृषि और धर्म प्रधान देश है। सुख आर दु:ख दोनों में हम परमात्मा को याद करते हैं। हां, तकलीफ में कुछ ज्यादा याद आती है। अयोध्या में भगवान राम के मंदिर के वैशिष्ट को देखने हजारों लोग प्रतिदिन जा रहे हैं। बंगाल में हमारी नेत्री भी एक के बाद एक मंदिर बनावा रही है। कहीं कोई कसर रह गई हो तो बताइये। एक मुस्लिम विधायक ने बाबरी मस्जिद बनाने की भी ठाल ली है। फिर शिकायत किस बात की?

इसे व्यंग्य मत समझिये हमने कुछ सच्चाई से रूबरू कराया है। अब आप अपनी कुर्सी की पेटी बांध लीजिये। मौसम खराब है जहाज डगमगा सकता है। गंतव्य स्थल तक सुरक्षित पहुंचा देगा। इस बीच अपको हुई तकलीफ या खतरा झेलने के लिये हमें अफसोस है। ठ्ठ

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