हिन्दुओं को नैतिक चुनौती
पिछले एक दशक में हिंदू मुसलमान के बीच वैमनस्य की खाई और चौड़ी होती जा रही है। बात खेल की हो चाहे राजनीति की हिंदू मुसलमान में टकराव बढ़ता जा रहा है। परिणामस्वरुप ऐसी आशंका स्वाभाविक है कि यह कहीं संघर्ष का रूप नहीं ले ले। सैकड़ों वर्ष का हमारा सामाजिक ताना-बाना कमजोर हो गया है। जहां दुनिया बहुत आगे चली गई है और हम भी चांद पर जाने की योजना बना रहे हैं। हमारा धार्मिक उन्माद हमें पीछे धकेल रहा है। वसुदेव कुटुंबकम की सोच रखने वाले देश में वैचारिक सोच का पतन हमारी सभ्यता और संस्कृति के लिए एक बड़ी चुनौती है। ऐसी स्थिति में भारत के शीर्ष उद्योगपति घनश्याम दास बिरला जी का एक लेख मुझे आज भी प्रासंगिक लगता है। घनश्याम दास जी महात्मा गांधी के अनुयाई एवं सहयोगी रहे हैं। वह एक विचारक एवं चिंतक भी थे। उनका यह आलेख उस समय लिखा गया जब संविधान के निर्माता भारत रत्न डॉक्टर बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर ने हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया था। यह लेख आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था। मुझे पूरा विश्वास है इसे पढक़र हम चिंतन करेंगे एवं देश में वर्तमान तनावपूर्ण स्थिति में सुधार का प्रयास करेंगे। ‘हिंदुओं को नैतिक चुनौती बिखरे विचारों की भरोटी’ पुस्तक से उद्घृत है जिसे मैं हूबहू पाठकों के सामने प्रस्तुत कर रहा हूं।
स्व. घनश्याम दास बिड़ला
-डाक्टर आंबेडकर ने जब से हिन्दू-धर्म त्यागने का अपना निश्चय प्रकट किया है तब से चारों तरफ एक तहलका-सा मच गया है। हिन्दू-जाति पर आज सदियों से आफत आ रही है और कब इसका अन्त होगा, इसका कोई ठिकाना नहीं है। पर हिन्दू जनसमाज में जैसी सामुदायिक जागृति आज दिखाई देती है, वैसी शायद सैकड़ों वर्षों में भी न देखने में आयी होगी।
इसीलिए इस चोट से सार्वजनिक खलबलाहट-सी दिखाई देती है और हिन्दू नेता जी-जान से इस फिक्र में हैं कि आंबेडकर हिन्दू नाम को न छोड़े। किसी एक आर्यसमाजी सज्जन ने तो यहाँ तक कह डाला है कि अंबेडकर के कोई सुपुत्र हो तो वह अपनी लडक़ी उसे ब्याह देने को तैयार हैं। अन्य सज्जन हिन्दू-धर्म की महत्ता दिखाते हुए आंबेडकर से धर्म त्याग न करने की प्रार्थना करते हैं। सुना है, पूज्य मालवीय जी अम्बेडकर को समझाने जाने वाले हैं, पर इसका कोई फल होगा, ऐसी उम्मीद करना बेकार है।
डॉ. बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर
ईसाई मुसलमान आदि भी अम्बेडकर का दरवाजा जोरों से खटखटा रहे हैं और उन्हें अपने-अपने धर्म की महत्ता दिखा रहे हैं। क्या हिन्दू, क्या ईसाई और क्या मुसलमान, सभी यह समझ बैठे हैं कि जहां एक अम्बेडकर ने धर्म छोड़ा, लाखों हरिजन हिन्दू धर्म को तिलांजलि देंगे और हिन्दुओं को जिस बात का भय है, वही बात ईसाई और मुसलमानों के लिए आशा की किरण है। इसलिए हिन्दू एक तरफ और अन्य धर्मी दूसरी तरफ। इनके बीच काफी खींचातानी है। दोनों पक्ष वाले ख्वाहमख्वाह धर्म की महत्ता दिखाते हैं। धर्म तो :
धृति: क्षमा दमोअस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या, सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम।।
यह है और कहना चाहिए कि जिसमें ये दस लक्षण पाए जाएं, वही भागवत, आर्य या हिन्दू है। इसी तरह मुसल्लम-बा-ईमान (पूर्ण धार्मिक) ही मुसलमान कहलाना चाहिए। पर आज तो ये सब बातें पोथी-पत्रों तक ही सीमित हैं। न तो इन दस लक्षणों की कसौटी पर कसे जाने के कारण ही कोई हिन्दू कहला सकता है और न मुसलमान कहलाने के लिए मुसल्लम-बा-ईमान होने की जरूरत है। हिन्दू, मुसलमान आदि शब्दों की परिभाषा तो अब समाज-विशेष तक ही परिमित है। अंबेडकर को भी कोई आध्यात्मिक उधेड़-बुन नहीं है, जो अन्वेषण करने में लगे हों कि इन दस लक्षणोंवाला धर्म श्रेष्ठ है या इस्लाम। उन्हें तो ‘हिन्दू’ नाम अखरता है और वह उसे छोडऩे की फिक्र में हैं। हमें भी इसी बात की फिक्र है कि वह बराय नाम ही सही, हिन्दू बने रहें, चाहे उसमें सत्य धर्म रहे, चाहे चला जाए। संख्या बनी रहे, यही चिन्ता है, और यह तृष्णा स्वच्छ हो तो कोई अनुचित भी नहीं है। ‘घण जीतेरे राजिया।’ ‘कलौ संघशक्ति:।’ पर क्या इस कूद-फांद या बेतुकी बौखलाहट से हमारी संख्या बढ़ सकती है, अथवा जितनी है उतनी भी कायम रह सकती है?
दुख के साथ कहना पड़ता है कि अम्बेडकर की इस चुनौती से जहाँ काफी उत्तेजना है, वहाँ शान्त और सुस्पष्ट सूझ-बूझ-समझ का दिवाला-सा दिखाई पड़ता है। एक रोगी की जान बचाने के लिए पचासों उपचारक भिन्न-भिन्न दवाइयाँ लेकर उसे पिलाने का हठ करे तो रोगी के रहे-सहे दिनों का खातमा ही समझना चाहिए। एक बहुत बड़े बाँध में जो चलनी की तरह छिद्रों वाला हो गया हो और जिसमें से फुहारे बड़े जोर से फूट रहे हों, निकलते हुए पानी को लोटों-लोटों भरकर रोकने का प्रयास करना हास्यास्पद ही होगा।
इस संबंध की हमारी कार्रवाई भी कुछ वैसी ही है। अम्बेडकर को भीतर रखने की जितनी चिन्ता हो रही है, उसका शतांश भी हिन्दू-शरीर को स्वस्थ करने की नहीं। बेमरम्मत हिन्दू-समाज-रूपी घर चाहे अम्बेडकर को रख ले, तो भी वह और लाखों अम्बेडकर खो बैठेगा। हमारी संख्या का आधार हिन्दू जमात के सुधार पर ही अवलम्बित है।
आश्चर्य तो यह है कि ऐसे विकट समय में भी हम वस्तु-स्थिति को देखने से इन्कार कर रहे हैं। आजतक हजारों विधवाएँ, अनाथ और हरिजन विधर्मी बन गए हैं और बनते जा रहे हैं। मैं एक भी ऐसे नव-विधर्मी को नहीं जानता, जिसने कुरान या बाइबिल पर आंशिक होकर चुटिया कटायी हो। किसी ऐसे समाज-परित्यक्त से पूछिए, वह बताएगा कि हिन्दू समाज को उसने नहीं किन्तु समाज ने उसे त्याग दिया है।
फिर अम्बेडकर के इस निश्चय पर इतनी घबराहट क्यों? और यदि रोग मुक्त होना अभीष्ट है तो हम यह क्यों नहीं देखते कि अम्बेडकर भी उसी पुरानी लकीर पर जा रहे हैं, जिस पर से करोड़ों हिन्दू त्रस्त होकर हिन्दू समाज को तिलांजलि देते हुए गुजर गये हैं। जब कोई लडक़ी मुसलमान द्वारा भगायी जाती है तब हमें मुसलमानों पर रोष आता है, पर क्यों नहीं हम अपनी नालायकी पर रोष करते, जो उस लडक़ी के भगाये जाने की जिम्मेदार थी?
कुछ वर्षो की बात है। एक मारवाड़ी लडक़ी को एक मुसलमान भगाकर ले गया। समाज को काफी रोष हुआ। खिलाफत का जमाना था, इसलिए यह मसला मुसलमान नेताओं तक पहुंचाया गया। उन्होंने शरमा-शरमी में आकर कुछ मदद भी की, पर लडक़ी के जब वापस आने की आशा बंधी तब सबके चेहरों पर स्याही दौड़ गयी।
सवाल यह हुआ कि उस लडक़ी को उसके घरवाले रख सकते हैं या नहीं? पंचों ने व्यवस्था दी कि वह घर में नहीं आ सकती। नौजवानों ने रोष दिखलाया, पर उनकी एक न चली। आखिर वह लडक़ी नहीं आई, वहीं अपघात करके मर गयी।
हिन्दू समाज ने यह साबित कर दिया कि लडक़ी ने हमको नहीं, किन्तु हमने लडक़ी को छोड़ा। यह पन्द्रह वर्ष की बात हुई। आज भी किसी विधवाश्रम में जाकर वहां रहने वाली किसी विधवा का इजहार लीजिए। कुछ ऐसी ही कथा सुनने को मिलेगी।
पर अब कुछ तुरत-ताजा बानगी भी देखिए। वर्धा के पास एक छोटा-सा सिंदी ग्राम है। वहाँ मीरा बहन (मिस स्लेड) ने ग्रामोत्थान का कार्य प्रारंभ किया। वहाँ एक छोटी-सी झोंपड़ी बनाकर रहने लगीं। जब पहले-पहल वहाँ पहुँची तब कौतूहलवश लोग इक_े हो गए और उनसे तरह-तरह के प्रश्र पूछने लगे। पानी की जरूरत पड़ी, तब एक नौजवान पानी ले आया और घड़े में पानी डालकर चला गया। पर यह कौतूहल कब तक ठहरता? आखिर दूसरे दिन मीराबहन को पानी की जरूरत पड़ी तब घड़ा लेकर कुएं पर पहुंची। जिन चेहरों पर पहले मैत्री का प्रकाश था, वहीं आँखें दिखाने लगे और बोले, ‘आप यहाँ पानी नहीं निकाल सकतीं। पानी चाहिए तो अपना अलग कुआं बनवा लो।’ एक बनिये के कुएं पर गयीं, महारो (हरिजन की एक जाति) के कुएं पर गयीं, मांगों (हरिजनों की एक दूसरी उपजाति) के कुएं पर गयीं, पर मीराबहन के घड़े को कुएं में डलवाकर कुआं कौन अपवित्र कराए।
गाँव वाले मीराबहन की प्रार्थना में आते हैं, अपना दुख-दर्द सुना जाते हैं, पर अपने कुएं में मीराबहन का घड़ा नहीं जाने देते। मीराबहन दवा देती है, तब सब लोग ले जाते हैं, ब्राह्मण लोग भी ले जाते हैं, पर दवा बिना स्पर्श किए ऊपर से डालनी पड़ती है, नहीं तो ब्राह्मण अपवित्र हो जाए। मीराबहन कितना भी उपकार क्यों न करें, पर पानी नहीं मिलने का। अम्बेडकर के जाने से हमारा समाज नहीं डूबेगा, पर यह सुलूक है, जो हमारे समाज को डूबो देगा।
पुस्तक : बिखरे विचारों की भरोटी - लेख घनश्याम दास बिड़ला से उद्घृत
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