राजू

 राजू

बहुचर्चित सामाजिक कार्यकर्ता राजकुमार बोथरा का अवसान हो गया। उम्र थी लगभग 82 वर्ष। हम प्यार से उसे राजू कहते थे। किशोरावस्था से ही हम साथ रहे हैं। सभा, संस्थाओं का सार्वजनिक जीवन में हमने कंधा से कंधा मिलाकर कार्य किया। माली हालत भी हम दोनों की ही एक जैसी थी। दोनों फक्कड़ थे। सक्रिय सामाजिक जीवन के साथ हम दोनों कांग्रेस से अनौपचारिक रूप से जुड़े हुए थे। वैसे उस समय राजनीति और कांग्रेस एक दूसरे के पर्यायवाची माने जाते थे। हरिसन रोड (अब महात्मा गांधी रोड) में बड़ाबाजार जिला कांग्रेस कार्यालय था। नीचे कोयला का डिपो और ऊपर जिला कांग्रेस का दफ्तर। उन दिनों बड़ाबाजार में दो व्यक्ति कांग्रेस पर काबिज थे। एक सत्यनारायण मिश्रा और दूसरे थे राम लगन सिंह, एमएलसी थे। सत्यनारायण मिश्रा, वरिष्ठ थे और जिला कांग्रेस के सुप्रीमो माने जाते थे। मिश्रा जी राजू को बहुत मानते थे। बड़ाबाजार जिला कांग्रेस के दफ्तर में हम कभी-कभी जाते।

स्व. राजकुमार बोथरा

समय बीतता चला गया और राजू ने देवकी नंदन मानसिंहका की उंगली पकडक़र काशी विश्वनाथ सेवा समिति में अपना आसन जमाया। हमारे पास कोई कारोबार नहीं था। राजू भी मध्य वित्त परिवार से था। मैं भी लगभग वैसा ही। मुफलिसी जीवन व्यतीत कर रहे थे। नाम और प्रचार का शौक था। उन दिनों दैनिक विश्वमित्र हिंदी का प्रमुख अखिबार था। सामाजिक क्षेत्र में करना हो तो विश्वामित्र का वरदहस्थ होना जरूरी होता था। राजू विश्वामित्र की गोद में बैठ गया। कुछ समय में ही राजू विश्वामित्र के खूंटे से पूरा बंध गया था। विश्वमित्र ने भी राजू की पीठ थपथपाई और इस तरह सामाजिक क्षेत्र का जाना पहचाना चेहरा बन गया राजू। विश्वामित्र के संपादक संचालक मुन्नू बाबू (कृष्ण चंद्र जी अग्रवाल) के लिए राजू एक उपयोगी और काम का आदमी सिद्ध हुआ। राजू को भी इसका लाभ मिला। मुन्नू बाबू को बड़ाबाजार की सामाजिक गतिविधियों में एक भरोसेमंद प्रतिनिधि मिल गया। आप समझ सकते हैं एक उभरते हुए सामाजिक कार्यकर्ता को उस समय के सबसे बड़े समाचार पत्र का समर्थन मिल जाए तो उसकी तरक्की को कौन रोक सकता है। राजू बड़ा बाजार के सामाजिक क्षेत्र का जाना पहचाना चेहरा बन गया। अपनी विनम्रता और सबका साथ सबका विश्वास के माध्यम से राजू बन गया एक चर्चित नाम। 

राजू को ऊपर उठने की सीढ़ी मिल गई। लेकिन उसने अपनी औकात और हैसियत के मामले में कोई गलतफहमी नहीं पाली। मुझे याद है टांटिया हाई स्कूल नई-नई बनी थी। मुझे याद नहीं है इस स्कूल से हमें क्यों चिढ़ थी। हो सकता है वह हमारी सनक ही रही हो पर हम एक आंदोलन में जुट गए थे और उसके भव्य मकान पर पत्थर फेंक कर शीशे तोडक़र पुलिस पकड़ ना ले दौड़ते थे। उस वक्त बड़ाबाजार जिला कांग्रेस हमारा गंतव्य स्थान या अड्डा होता था। राजू स्थूल शरीर का होते हुए भी भागने में तेज था। हम अंततोगत्वा जिला कांग्रेस में मिलते। राजू हलचल अजीज था। कुछ हल्ला गुल्ला होते रहे यही उसकी नियति थी। काफी समय कोई घटना नहीं होने पर राजू मायूस हो जाता। डरपोक होते हुए भी झगड़ा और हलचल के बीच रहने से उसे नैसर्गिक सुख मिलता। हम दोनों ही उन फकीरों में थे जिनके पास खोने के लिए कुछ नहीं था और पानी के लिए पूरी दुनिया।

 बाद में राजकुमार बोथरा श्री काशी विश्वनाथ सेवा समिति का सचिव बन गया। इसके साथ ही सरोज शर्मा भी था किंतु राजस्थान में किसी दुर्घटना में सरोज की मृत्यु के बाद काशी विश्वनाथ में अध्यक्ष देवकीनंदन पोद्दार और सचिव राजकुमार बोथरा के जुगलबंदी लंबी चली। राजू तबतक एक ऐसा नामचीन बन चुका था कि सामाजिक या व्यावसायिक क्षेत्र में शायद ही कोई ऐसा हो जो उसे नहीं जानता। काशी विश्वनाथ के लिए चंदा एकत्र करने में उसे सिद्धि हासिल हो चुकी थी। काशी विश्वनाथ में वह वन मैन शो तो नहीं था पर यत्र तत्र सर्वत्र राजू को ही लोग अधिक से अधिक जानते थे। एक कर्मठ कार्यकर्ता की छवि बन चुकी थी इसलिए कोई चंदादाता मुंह नहीं फेरता था। आमरागाछी में श्रावण मेला की रौनक और चहल-पहल में बोथरा का श्रम और काशी विश्वनाथ की ख्याति दोनों को श्रेय है। समिति से और भी बहुत लोग जुड़े हुए थे किंतु काशी विश्वनाथ और राजकुमार बोथरा पर्यायवाची बन चुके थे। राजू की खासियत यह थी कि काशी विश्वनाथ के लिए 24 घंटे समर्पित था। उसकी रग-रग में समिति थी और काशी विश्वनाथ ने भी बोथरा को वह हैसियत दी कि उसे पहचान मिली। बोथरा खुद अव्यवस्थित था और औपचारिकता बरतना उसके बस की बात नहीं थी। उसने समिति को बहुत कुछ दिया और समिति ने भी उसके साथ पूरा न्याय किया। इस जुगलबंदी में राजू ने कभी सोचा नहीं था कि समिति को लेकर कभी उस पर सवाल किए जाएंगे। लोगों की नजर में यह उसकी कमजोर कड़ी थी। लेकिन उसके लिए काशी विश्वनाथ एक मिशन भी था अपने श्रम एवं जीवन दान कर उसने कभी कोई कमी नहीं बरती। कभी हिसाब रखने की जरूरत नहीं समझी। वैसे भी निष्ठा और समर्पण का कोई हिसाब नहीं हुआ करता। काशी विश्वनाथ उसकी कमजोरी बन गया था। 

इसके बाद समय कल बदला। उसकी बेखुदी को लोगों ने कमजोरी समझा। फिर इसकी परिणति यह हुई की समिति के प्रति उसके पास बेइंतहा और बेलगाम आशिकी का कोई जवाब नहीं था। जो लोग राजू को करीब से जानते हैं वह उसकी स्थिति को बखूबी समझते थे। उसकी कार्य पद्धति और समर्पण के छिद्रों का लाभ उन लोगों ने उठाया जो समिति के आशियाने को हथियाना चाहते थे। 40 वर्ष के जीवन दान से बने अंजुमन पर एक झटके में अपना साइन बोर्ड लगाकर श्री काशी विश्वनाथ सेवा समिति की कुर्सी पर ताबिज हो गये और दुनिया देखती रह गई। बोथरा जी को ‘मार्गदर्शक’ का खोखला इनाम देकर राजू से काशी विश्वनाथ ‘हाईजैक’ कर लिया गया। बोथराजी भी इतने नादान थे कि बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बन बैठे। मासूम खामियों पर ढेर सारी खूबियों वाला राजू जीवन भर की कमाई कुछ मिनट में गंवा बैठा। काशी विश्वनाथ में उसके लिए कोई जगह नहीं रखी गई। पथ प्रदर्शक की खूबसूरत पर खोखली गुगली थामकर राजू को जीवन भर की कमाई से बेदखल कर दिया गया। भरे दिल से राजकुमार बोथरा लोगों को अपनी दुखद गाथा सुनाया करता था। आज स्थिति है कि बंगाल में हिंदी भाषियों की एक पुरानी मानव सेवी संस्था पर ऐसा व्यक्ति काबिज हो गया जो इस संस्था का सदस्य भी नहीं था। 

और अंत में - राजू के अवसान के 48 घंटे के अंदर ही उसकी स्मृति का ‘विसर्जन’ करने का एक प्रहसन भी सामाजिक इतिहास का दु:खद किंतु अनूठा अध्याय है। जाने-माने सर्वप्रिय कार्यकर्ता की शोक सभा में ऐसे स्थान पर की गई जहां शायद इससे पहले कोई शोक सभा नहीं हुई। श्री काशी विश्वनाथ द्वारा आयोजित इस स्मृति सभा में समिति के अधिकांश पदाधिकारी ही नदारद रहे। यही नहीं जिन संस्थाओं के नाम आयोजकों ने दिए उनके कोई प्रतिनिधि शोक सभा में दिखाई नहीं दिया। कुछ संस्थाओं ने तो लिखित रूप से काशी विश्वनाथ को विरोध जताया है कि उसका नाम बिना बताए ही दे दिया गया। सुबह अखबार में विज्ञापन देखकर अधिकांश को इस कथित शोक सभा की जानकारी मिली। एक कार्यकर्ता की स्मृति के ऐसे ऐसा खिलवाड़ इससे पहले कभी नहीं हुआ। राजू अक्सर कहा करता था कि कार्यकर्ता को आखिर सम्मान ही तो चाहिए पर उसको पता नहीं था कि उसको ऐसा सम्मान दिया जाएगा जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। 



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