उमा-अजहर की विरासत गुंजन का शुभ विवाह/ निकाह
आज के समय में सहिष्णुता क्षीण होती जा रही है। उसके बदले आत्म केंद्रित व्यवस्था के पाये मजबूत हो रहे हैं। धार्मिक सहिष्णुता तो इतिहास बनकर रह गई। एक दूसरे के प्रति विष वमन की होड़ सी लगी है । कभी साथ रहते थे, एक दूसरे के जलसे में शामिल भी होते थे। हमारा खान-पान बिल्कुल भिन्न था पर हमारे उत्सव में शरिक होने की परंपरा थी। लेकिन समय के अंतराल ने लगता है सब कुछ डस लिया हो। हिंदू- मुसलमान की अगर बात करें तो देश के विभाजन को राजनीतिक दुराग्रह मानकर हमने स्वीकार कर लिया। बचपन में राजस्थान में हम बच्चे नारा लगाते थे - ‘ईंट से ईंट भिड़ाई रे जिन्ना क्या बिगाड़ा बेईमान तेरा’। इस आक्रामक नारे में एक दूसरे के प्रति घृणा की बजाय विभाजन की असह्य पीड़ा झलकती थी। खैर समय ने उस दर्द को भी बर्दाश्त कर लिया।
50 से 70 के दौर ने घाव भर दिए। फिर ‘आग तले चिंगारी’ की आंच बढ़ती गई। हम समय-समय पर एक दूसरे से नजर मिलाने का मौका नहीं चूकते। ईद के दौरान इफ्तार पार्टी में शरीक होने की कवायद को धीरे-धीरे अंजाम देने लगे। कमोबेश पुरानी परंपराएं फिर परवान चढ़ी। त्योहार और मुशायरा में राम - रहीम के बंदों की रमझोल शुरू हुई। लेकिन राजनीति के दबाव में हमें फर्क बताया जाने लगा। पुराने घाव को हरे एवं बीते समय की याद दिलाते हुए हम पर उन्माद के अंकुर बोए जाने लगे। हमको फिर धकेलने का प्रयास शुरू हुआ जिन्हें हम भूल चुके थे। हमारे अपनों ने हमारे घाव को सहलाना शुरू कर दिया। आज स्थिति यह है कि हम फिर बेगाने हो गए और हमारी दूरियां बढऩे लगी है। हमको पुराना जमाना याद दिलाया गया कि किस तरह हमें गुलाम बनाया गया। बताया गया कि हम क्या थे और क्या हो गए। इसकी खौफनाक स्थितियों का भाव चित्रों से हमें चेतावनी दी गई। बताया गया की क्षितिज में आकाश और जमीन मिलते नहीं है। यह हमारा भ्रम है। हमें जगाया गया और फिर हमारे संताप को उभारने का सिलसिला शुरू हो गया।
अपने भाई चारे के संस्कारों को हम सारे झंझावातों के बावजूद मजबूती से पकड़ रखे हैं पर राजनीति को यह गंवारा नहीं। पतवार को बचा रखा है और इसे भी वह दौर समझते हैं जो पहले की तरह गुजर जाएगा।
जरूरत है कि अब मैं धुंध को समेट लूं और अपने पाठकों व शुभचिंतकों को स्पष्ट कर दूं कि अंधेरे में रोशनी की किरण अभी मध्यम नहीं हुई है।
नाट्यशिल्पी उमा झुनझुनवाला में से मेरा बहुत पुराना परिचय है। नाटकों की दुनिया में उसका कब आना जाना शुरू हुआ पता नहीं पर मंच पर उसकी सक्रियता बढ़ चुकी थी। फिर एक घटना हुई जिसको हमारे हस्तक्षेप की समय-सापेक्ष जरूरत पड़ी। उमा ने अपने नाट्य निर्देशक साथी से नजदीकियों को विवाह सूत्र में बांधने की जिद ठान ली। ठहरे पानी में हलचल शुरू हुई। उमा के मध्यवित्त परिवार में अशांति का दौर एक तूफान में परिवर्तित हो गया। निदेशक साथी मुसलमान और उमा ठीक उसके उलट यानी हिंदू। भला एक औसत मारवाड़ी परिवार कैसे यह गंवारा कर सकता है कि उसकी बेटी किसी मुसलमान से शादी करें। काफी कहा सुनी हुई। मैं और मेरे कुछ प्रगतिशील मित्र भी धर्म संकट में पड़ गए। खैर उमा का इरादा और नीयत दोनों की मजबूती देखते हुए हमने भी अपने को संभाला। उमा के साथ खड़े हो गए लेकिन समय का तकाजा और अपनी मानसिकता को खंगालने के बाद उमा को सशर्त समर्थन देने की बात कही। उमा अपने धर्म और उसकी छाया साथी दोनों अपने-अपने धर्म पर कायम रहे। किसी को धर्म छोडऩे या परिवर्तन की जरूरत नहीं है। यह बड़ा कठिन रास्ता है पर उमा और अजहर दोनों ने सहर्ष स्वीकृति दी। समझाने बुझाने पर दोनों के परिवार भी मान गए और उमा अजहर विवाह सूत्र में बांध गए। दोनों ने मिलकर हिंदी नाटकों में महारत हासिल की। उमा ने नाटक को अपना पैशन और मिशन दोनों माना और अजर उसका संबल भी था, साथी भी। उन्होंने 30 नाटकों का निर्देशन किया। 12 एकांकी नाटकों का मंचन और 50 से अधिक नाटकों में मुख्य पात्र का अभिनय। दिनकर, साहिर लुधियानवी, केसरी नाथ त्रिपाठी (तत्कालीन राज्यपाल) आदि आदि की कविताओं की आवृत्ति का अद्भुत कार्य किया। उमा के जीवन के थपेड़ों ने फिर अपनी कहानी दोहराई। कोविड की विभिषिका ने अजहर को हमसे छीन लिया और उमा के जीवन में फिर वेदना और अनिश्चितता के बदले उमड़-घुमड़ कर इस अदाकारा के जीवन को दुश्वार बना दिया। हमारे जैसे कई लोगों ने ढांढस बंधाया और वह सारी दम तोड़ आपदाओं को झेलती हुई फिर खड़ी हो गई। अंदर से टूटी हुई किंतु ऊपर से धीर गंभीर उमा ने जीवन की दूसरी पारी भी शुरू हुई। बेटी गुंजन के हाथ पीले किए। 25 नवंबर को गुंजन की शादी का कार्ड यथा समय मिला। उमा ने अपने वादे के मुताबिक बेटी का सुबह निकाह किया। काजी ने आकर निकाह की रश्म अदा की- कबूल है के तीन बार कवायद के बाद अजहर की बेटी और उमा की लाडली अपने प्रियतम आसिफ की हो गई। उमा ने उसी शाम हिंदू रीति के अनुसार अपने दामाद आसिफ और गुंजन के फेरे करवाएं और पंडितों से रस्म पूरी करवाई। शादी के कार्ड में भी श्री गणेशाय नम: के साथ गणेश जी विराजमान थे। शाम को मेरे जैसे कई लोग इस पवित्र बंधन के गवाह बने। 25 नवंबर को इस विवाह से सभी सभागत लोग बहुत उत्साही थे। यह उत्साह इस बात का भी साक्षी है कि बहुत झंझावातों, आंधी तूफान के बाद भी दीया जल रहा है। भले ही सूरज की तरहप्रखर ना हो किंतु तूफान को झेलते हुए रात भर जलता रहा है। मुझे बाल कवि बैरागी के वह पंक्तियां स्मरण हो आई कि ‘रात भर जलता रहा उस दीप को दो जै दुआ, सूर्य से वह श्रेष्ठ है, देखने में तुच्छ है तो क्या हुआ।’
उमा अजहर की विरासत को संभाल कर रखना कम से कम साहित्य जातियों और नाटक शिल्पियों का पाथेय है। हम कितना निर्वाह कर पाते हैं भविष्य ही बताएगा। गुंजन और आसिफ अंसारी को दांपत्य जीवन की ढेर सारी बधाई।
उमा दीदी को गुंजन के विवाह की बधाई व नवदम्पत्ति को आशीर्वाद व शुभकामनाएं। भावी भविष्य की तस्वीर गुंजन अपने माता-पिता का नाम रोशन करेंगी तथा अपने नये परिवार के साथ तथा आसिफ अंसारी के साथ उज्जवल भविष्य के लिए कदम से कदम मिलाकर दोनों परिवारों को गौरवान्वित महसूस करायेगी।यही मैं दिल से दुआ करती हूं।
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