रूस-यूक्रेन युद्ध में नयी संभावना - भारत गुटनिरपेक्ष देशों का फिर नेतृत्व करे

 रूस-यूक्रेन युद्ध में नयी संभावना

भारत गुटनिरपेक्ष देशों का फिर नेतृत्व करे

रूस-यूक्रेेन युद्ध का आज दसवां दिन है। युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा है। दोनों देशों के बीच बेलारूस सीमा पर वार्ता हुई, उसी समय बमबारी भी चल रही थी। जैसी कि आशंका थी वार्ता बेनताजी रही। भारत ने हमलों की निंदा खुलकर नहीं की है, हालांकि उसने रूसी हमले का पक्ष भी नहीं लिया है और यूक्रेन की सम्प्रभुता के पक्ष में डटा हुआ है। लेकिन अगर हम अतीत की ओर झांके तो देखेंगे विश्व में अशांति एवं युद्ध के समय गुटनिरपेक्ष देशों की जो एक शक्तिशाली भूमिका रहती थी वह अब नदारद है। यही वजह है कि छिटपुट शांति की आवाज नक्कारखाने में तूती की तरह लग रही है। लगता है एटम बमों की ऐंठ पर बैठ दुनिया ने बारूद का छिड़काव कर रखा है और गुटनिरपेक्ष देश गांधी जी के तीन बंदर की तरह न देख रहे हैं, न सुन रहे हैं और न कुछ बोल रहे हैं।

जिनकी याददाश्त बोझिल हो चुकी है उन्हें बताते चलें कि द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् विश्व मुख्यत: दो गुटों- साम्यवादी सोवियत संघ और पूंजीवादी अमेरिका कै मध्य बंटा हुआ था। इस समयदोनों गुट एक-दूसरे से मुकाबला करने के लिए सामाजिक प्रणालियां तथा सैनिक गुट तैयार कर रहे थे। इसी समय वैश्विक पृष्ठ भूमि पर बहुत सारे देशों को उपनिवेशवाद से स्वतंत्रता मिली थी, भारत जैसे देश भी इस श्रेणी में शामिल थे। इसी पृष्ठ भूमि में ''गुटनिरपेक्ष आंदोलनÓÓ की स्थापना की गयी जिसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य नवीन देशों के हितों की सुरक्षा करना था। गुटनिरपेक्षता की ओर पहला अहम कदम बांडुंग सम्मेलन वर्ष 1955 के माध्यम से उठाया गया जिसमें भारत के प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू, अब्दुल नासिर, सुकर्णो और मार्शल टीटो जैसे नेताओं ने प्रतिभाग किया। इस सम्मेलन में विश्व शांति और सहयोग संवद्र्धन संबंधी घोषणा पत्र जारी हुआ। वर्तमान में गुटनिरपेक्ष आंदोलन संयुक्त राष्ट्र के बाद विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक समन्वय और परामर्श का मंच है। इस समूह में 120 विकासशील देश शामिल हैं। गुटनिरपेक्ष आंदोलन का मुख्य उद्देश्य नव स्वतंत्र देशों के हितों की रक्षा करना था। इसलिए सोवियत संघ के विघटन के बाद इसकी प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लगने लगा और देशों का इस समूह के प्रति आकर्षण कम होने लगा।

भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सिद्धांतों पर अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करता रहा है। 2016 तक भारत के प्रधानमंत्री ही इस आंदोलन में भारत का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। एक-दो बार ही अपवाद हुआ है। हाल के वर्षों में भारत की इस आंदोलन के प्रति रूचि कम का एक कारण यह भी रहा कि गुटनिरपेक्षता आंदोलन में एकमत उद्देश्य का अभाव दिख रहा है इसमें शामिल देश आपस में गुटबंदी कर रहे हैं।

गुटनिरपेक्ष देशों का एक समय दुनिया की दो ताकतों के बीच ऊंचा कद था और दोनों ही गुट निरपेक्ष देशों की ताकत का लोहा भी मानते थे। भारत ने एक समय इन देशों का नेतृत्व किया इसलिए अतीत के हर अंतरराष्ट्रीय संकट में भारत की भूमिका अहम् रही है। अब इसका अभाव की परिणति वर्तमान में रूस-यूक्रेन संघर्ष को बेलगाम और बेकाबू करने में हुई है। भारत की इस समय एक शक्तिशाली भूमिका हो सकती थी पर शांति हेतु भारत के प्रयास विध्वंस के अन्तर्नाद में खो गये। संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव पर वोट नहीं देना आत्मतुष्टि से अधिक कुछ नहीं है।

बेलारूस जो गुटनिरपेक्ष देशों की सूची में शामिल है, पर रूस-यूक्रेन युद्ध में उसका शामिल होना चौंकाता नहीं है।

रूस पिछले कई वर्षों से यह कहता आ रहा है कि नाटो अपने हथियार लेकर मास्को के करीब न आये। मंगर ऐसा नहीं हुआ। नाटो का न सिर्फ विस्तार होता गया, बल्कि पूर्व के सोवियत संघ के देशों में सत्ता-विरोधी आंदोलन सफलतापूर्वक संपन्न भी हुए। उनको अगली क्रांति रूस में होने का अंदेशा रहा होगा। जाहिर है, तनाव काफी पहले से था, यह जंग तो उसकी महज परिणति है। पश्चिमी और पूर्वी यूरोप के देश खुले तौर पर यूक्रेन के समर्थन में आ गये हैं। नाटो ने भी ऐलान किया है कि वह भले अपने सैनिकों को यूक्रेन नहीं भेज रहा, लेकिन उसे सभी सैन्य साजो-सामान जरूर मुहैया करा रहा है। यूक्रेन की सरकार ने भी तकरीबन अपने सभी नागरिकों को हथियार दे दिये हैं। अब यह जंग दो देशों रूस और यूक्रेन में नहीं, बल्कि दो महाशक्तियों रूस और अमेरिका के बीच लड़ी जा रही है। उसे इसकी जरूरत इसलिए थी, क्योंकि सोवियत संघ के विघटन के बाद से रूस को अमेरिका महाशक्ति नहीं मान रहा था, और पश्चिम में यह सोच पनपने लगी थी कि वह मास्को के जितना करीब पहुंचेगा, रूस खुद में सिमटता चला जायेगा। अमेरिका की इसी मान्य को रूस तोडऩा चाहता है।

नि:सन्देह रूस ने यूक्रेन के साथ जो किया है, वह संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों के विपरीत है, लेकिन अमेरिका व उसके सहयोगी देश जो कर रहे थे, वह इन नीतियों के कितनी करीब है, उस पर भी बहस होनी चाहिये।

भारत फिलहाल इस तनातनी से खुद को अलग रखने में सफल रहा है, लेकिन ऐसा कब तक बना रहेगा, कहना मुश्किल है। भारत के हजारों छात्र यूक्रेन में फंसे हैं और अनवरत तकलीफें झेल रहे हैं। भले ही, यह साफ नहीं हो सका है कि रुस अथवा यूक्रेन के समय-पूर्व हमें हमले के कोई संकेत दिये थे या नहीं, लेकिन यह स्पष्ट है कि आगे की तस्वीर काफी भयावह है।

एक पहल यह भी हो सकती है कि इस जंग में सीधे तौर पर शामिल देशों को यह बताया जाये कि रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों से परोक्ष रूप से भारत भी प्रभावित हो रहा है। रूस पर इस तरह के प्रतिबंध लगाये गये हैं जिनसे यूरोप में फार्मा, कृषि, उत्पाद, गैस आदि उत्पादों के आयात प्रभावित नहीं होते। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि इनका विकल्प यूरोपीय देशों के पास नहीं है। रूस से इन चीजों की आपूर्ति होती रहेगी। यदि हम हर मसले पर अमेरिका का मुंह ताकने लगेंगे, तो सुरक्षा परिषद में हमारे लिये मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

ऐसे में कूटनीति का ताकाजा यही है कि इस युद्ध में निरपेक्ष रहने वाले तमाम देशों को भारत एकजुट करे। भारत जैसे कई देश हैं, जो इस मसले पर न तो रूस के साथ हैं और न यूक्रेन के। लिहाजा गुटनिरपेक्ष आंदोलन जिसका भारत कभी अगुवा रहा है को फिर खड़ा करने की कोशिश हमें करनी चाहिये। अफ्रीका व एशिया के देशों को आपस में मिलाना चाहिये। आतंकवाद जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे पर भी भारत गुटनिरपेक्ष देशों के साथ समन्वय स्थापित करे। भारत को अपनी भूमिका के बारे में पुन: सोचना चाहिये और अशांत दुनिया व रूस-यूक्रेन युद्ध में तबाही को रोकने एवं परमाणु युद्ध की आशंका को खत्म करने हेतु गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सशक्तिकरण की आवश्यकता है।

Comments

  1. देर सबेर ही सही, पहुँचना तो इसी बिन्दु पर होगा विश्व शाति के लिए. विश्व समुदाय जितनी जल्दी समझे उसी में भला है. इस दिशा में भारत की भूमिका को लेकर आपका आंकलन सही. नैसर्गिक रूप में नेतृत्व का दायित्व निभाने के लिए भारत ही उपयुक्त है. समय आ गया है कदम उठाने का. समायानुकूल चिंतन हेतु बधाई.

    ReplyDelete
  2. भारत का शान्ति हेतु हस्तक्षेप अत्यंत आवश्यक है, विश्व पटल पर भारत कीअपनी पकड़ है,हमें पूरा भरोसा है ।

    ReplyDelete

Post a Comment