धार्मिक उन्माद में फंसता
हमारा सार्वजनिक जीवन
हमारे सार्वजनिक जीवन में जिस तरह धार्मिक उन्माद जगह बना रहा है, उससे एक विस्फोटक स्थिति बन सकती है। गत 30 जनवरी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के शहीद दिवस पर जामिया (दिल्ली) में गोपाल रामभक्त द्वारा चलायी गयी गोली किसी गांधी को नहीं लगी लेकिन गांधी की विचारधारा पर उसका निशाना था। दरअसल गोपाल ने तो इतिहास रचने के उद्देश्य से फायर किया और वह उनको अपने हिसाब से माकूल जवाब देना चाहता था जो आजादी की मांग कर रहे थे। गोपाल अपने जीवन के वयस्क पड़ाव पर भी अभी नहीं पहुंचा था लेकिन उसके रोम-रोम में जुनून था कि वह ''गद्दारोंÓÓ का सीना छलनी कर अमरत्व प्राप्त करे। ठीक यही स्थिति उस वक्त बनी थी जिसने अंतोतगत्वा गांधी का सीना छलनी कर दिया था। याद होगा महात्मा गांधी ने उस वक्त बने पाकिस्तान को भारत की ओर से अनुदान दिलाने की जोरदार पैरवी की थी। एक तो विभाजन का दंश, ऊपर से भारत से अलग कर मुसलमानों के लिए जिन्ना द्वारा पाकिस्तान की रचना से देश के परम्परावादी हिन्दू समाज में भारी गुस्सा था, ऊपर से पाकिस्तान को अनुदान देने का तर्क हिन्दू धर्मावलम्बियों के एक बड़े वर्ग को ऐसा लगा कि कोई उनके घाव पर नमक छिड़क रहा हो। इसी को लेकर गांधी के विरुद्ध एक अभियान चलाया गया जिसने राष्ट्रपिता के प्रति कुछ लोगों में घृणा की भावना भर दी और एक घोर राष्ट्रवादी हिन्दू चरमपंथी नाथूराम गोड्से ने गांधी पर गोलियां चलाकर ढेर कर दिया। ऐसा करते वक्त सब भूल गये कि गांधी ही एकमात्र मसीहा था जिसने कहा था, पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा। इसी गांधी ने कोलकाता में हिन्दू-मुस्लिम दंगों को रोकने आमरण-अनशन किया था। गांधी ही था जो रोज सुबह अपने प्रिय भजनों से हिन्दू धर्म की विराटता का अनुभव कराता था, इसीलिये उनकी इस सुबह की सभा में मुसलमान, ईसाई भी भाग लेते थे। इसी फकीर ने ही यह साबित किया था कि हिन्दू धर्म ही दुनिया को गांधी दे सकता है। दरअसल उदारवादी चिन्तन कुछ हिन्दू उपासकों के गले की हड्डी बन गया था। गांधी ने प्राण त्यागते क्षण हे राम! का स्मरण किया। आज राम भक्तों ने उसी गांधी को खलनायक दर्जा दे दिया और गोड्से की उपासना हेतु उसका मन्दिर बनाने की बात कर रहे हैं। गांधी का नाम लेना आज उनकी एक मजबूरी है। गांधी इस देश की मिट्टी में इस तरह समा गये हैं कि उनको कुछ लोग चाह कर भी अलग नहीं कर पा रहे। गांधी उनलोगों के लिये गले की हड्डी है जिसे न वे उगल पा रहे हैं, न निगल पा रहे हैं।
धार्मिक उन्माद हमारे राष्ट्रीय और सामाजिक जीवन में किस तरह अपना घर बना रहा है, उसके कुछ उदाहरण काफी है। एक बार मैं मुस्लिम बाहुल्य इलाके में एक सभा में मंच पर था। सभा क्लाईमेक्स पर थी कि उसको बन्द करने का फरमान आया। अजान का वक्त हो गया था कि आयोजकों द्वारा माइक बन्द करवा दिया गया। इसके पहले देश भक्ति के कई धुआंधार भाषण हुए थे। तूफान के पहले की शान्ति की कहावत तो सुनी थी पर मैंने अनुभव किया कि तूफान के बाद की शान्ति चरितार्थ हो रही थी। वैसे ही मैं एक मन्दिर के ऊपर बने सभागार में किसी सारस्वत कार्यक्रम में था। तीन चौथाई कार्रवाही हो चुकी थी, पर उसे अचानक बन्द करना पड़ा क्योंकि आरती का वक्त हो गया था। एक सामाजिक संस्था में किसी ने प्रस्ताव रखा कि बैठक की शुरुआत ईश प्रार्थना से करें और अब उस संस्था में परिपाटी बन गयी कि पहले ईश्वर की विनती फिर सभा की कार्रवाही। इसके विरोध का सवाल ही नहीं पैदा होता क्योंकि कार्य के पहले हम भगवान का स्मरण करें तो इसमें बुराई क्या है? जाहिर है, हमारे पास कोई तर्क नहीं है।
मुझे याद आया कोलकाता दूरदर्शन पर जब उर्दू समाचार वाचन शुरू हुआ था, उस वक्त खबरों के उपसंहार में ''खुदा हाफिजÓÓ कहा जाता था। मैंने सुना तो लगा कि इसे रोका जाना चाहिये क्योंकि फिर हिन्दी या बंगला समाचारों का शेष ''जय श्री रामÓÓ के नारे से करने की मांग स्वाभाविक होगी। अत: मैंने पहले उर्दू अखबारों के दो-तीन मित्र-सम्पादकों से बात की। वे मेरे विचार से सहमत थे। फिर हम तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री श्री अजीत पांजा से मिलने गये। श्री पांजा ने हमारी बात सुनकर कहा कि उन्हें भी नहीं मालूम की उर्दू बुलेटिन का मजहबीकरण कर दिया गया है। श्री पांजा ने अविलम्ब कार्रवाई की और ''खुदा हाफिजÓÓ को उर्दू समाचार बुलेटिन से रुकसत कर दिया गया।
हमारा देश कृषि प्रधान देश है और हमारी खेती भगवान भरोसे है। अच्छी मानसून हुई तो बल्ले-बल्ले वर्ना हमारा किसान या तो आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाता है या फिर जीवन भर कर्ज के बोझ में डूबा रहता है। हमारी वैज्ञानिक सोच एवं सरकारी प्रकल्पनायें उन तक नहीं पहुंची है। उनका जमीन्दार शोषण करता रहा है और अब गांव में महाजन जोंक की तरह चिपक कर उनका लहू चूसता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में परिवर्तन की गति बहुत ही धीमी है। हम भाग्यवादी बन गये हैं क्योंंकि भाग्य का कोई विकल्प नहीं है। सामाजिक सुरक्षा के नाम पर आप जीवन बीमा की पॉलिसी बेचिये या मेडी क्लेम। इसमें भी कई खामियां हैं। धर्म जोडऩे की बजाय हमाको छोटे-छोटे फिरकों में बांट रहा है। गांधी जी को भजन प्रिय थे। हमारे कई मनीषि कवियों एवं सन्तों ने भजन रचे। तुलसी, सूर, मीरा, रैदास, रहीम, कबीर, सिर्फ साधक ही नहीं उन्होंने अपने युगों में क्रान्तिकारी परिवर्तन को अंजाम दिया। मीरा पहली सन्त महिला थी जिसने कृष्ण प्रेम में राजशाही एवं राजमहल के विरुद्ध बगावत की। सच्चाई तो यह है कि हमारा देश एक आध्यात्मिक देश है। आध्यात्म को मैं धर्मों का निचोड़ मानता हूँ। भारतीय ऋषि-मुनियों ने लोक कल्याण की बात की। मानवता एवं लोक कल्याण हेतु वर्षों तक साधना की। बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया, महावीर ने भी साधना की एवं उन्हें ज्ञान की उपलब्धि हुई। भगवान कृष्ण ने युद्ध के मैदान में अर्जुन को उपदेश देकर उसका मार्ग प्रशस्त किया। हिन्दू उदार नहीं होता तो भारत में दुनिया के हर धर्मावलम्बी को सम्मानजनक स्थान नहीं मिलता।
अब हम धार्मिक संकीर्णता को सम्बल बनाकर भारत के आध्यात्मिक मूल्यों का ह्रास कर रहे हैं। यह सन्त सूफियों का देश है। गुरुवाणी में रैदास के कई पदों का समावेश है और मीरा ने भी रैदास को अपना गुरु माना। रैदास एक चमार थे जिन्हें हम बोलचाल में छोटी जाति कहते हैं। खेल हो या फिल्म का क्षेत्र भारत की राष्ट्रीय एकता की बेजोड़ मिसाल है। मुस्लिम फिल्म निर्माता भी अपनी फिल्म का मुहूर्त नारियल फोड़ कर करता है। अजमेर में हिन्दू भी चिस्ती की मजार पर श्रद्धावनत होकर चादर चढ़ाता है। ऐसे अनगिनत उदाहरण है जिसने भारत को दुनिया का सिरमौर बनाया है। इसी संस्कार को समेटे हुये दुनिया के सत्तर देशों में भारतीय या हिन्दू बड़ी संख्या में रहते हैं। दूसरी तरफ दुनिया का ऐसा कोई धर्म या जाति नहीं जिसके लोग भारत में पीढिय़ों से न रहते हों।
मोर अपने पांव की ओर देखता है तो उसे रोना आ जाता है। हमारे घर में ही हम अपनी जमीन खोते जा रहे हैं। देश जिस आर्थिक विपन्नता की स्थिति से गुजर रहा है, वह तो देर-सबेर ठीक हो जायेगी पर हमारा सैकड़ों वर्ष पुराना सामाजिक ताना-बाना तार-तार होता जा रहा है, उसे ठीक करने में पीढिय़ां गुजर जायेगी। हर व्यक्ति जिसे अपने को भारतीय होने का गर्व है, वह इस स्थिति पर सोचे।


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