बंदे मातरम!

बंदे मातरम!

प. बंगाल में पहली बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है। सरकार के गठन का एक सप्ताह भी पूरा नहीं हुआ कि उसने यह निर्णय लिया है कि राज्य के स्कूलों में बंदे मारतम् को सुबह प्रार्थना सभा या एसेम्बनी के साथ गाया जायेगा। स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा जारी एक आधिकारिक सूचना के अनुसार पश्चिम बंगाल सरकार ने सभी सरकारी और सहायता प्रापत स्कूलों को निर्देश दिया है कि वे तत्काल प्रभाव से सुबह की असेम्बली के दौरान 'बंदे मारतम्Ó का गायन अनिवार्य रूप से शामिल करें। निर्देश में यह भी कहा गया है कि स्कूलों के दिन की शुरुआत में हर छात्र को राष्ट्रगीत के गायन में भाग लेना अनिर्वाय होगा। संस्थानों के प्रमुखों को इस निर्देश का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है। यह कदम केन्द्र सरकार की ओर से राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान से संबंधित प्रावधानों को मजबूत करने के लिए उठाए गये कदमों के ठीक बाद आया है।


इन अहम् कदमों में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम 1971 प्रस्तावित संशोधन भी शामिल है जिसके तहत बंदे मारतम के गायन में बाधा डालना एक दंडनीय अपराध बना दिया गया है। स्कूल शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि इस गीत का गायन सभा सत्र की शुरुआत में किया जाना है। उन्होंने बताया कि स्कूल अधिकारियों को यह भी कहा गया है कि वे इस प्रक्रिया का रिकॉर्ड भी रखा जाए जिसमें कार्यान्वयन के प्रमाण के तौर पर वीडियो रिकॉर्डिंग भी शामिल हो। इससे पहले राज्य के स्कूलों में पारंपरिक रूप से सिर्फ राष्ट्रगान 'जन गण मनÓ ही गया जाता था जिसकी रचना रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी लेकिन कुछ सालों से पिछले टीएमसी सरकार ने 'बांग्लार माटी बांग्लार जलÓ को राज्य गीत के रूप में अपनाया था और राज्य के स्कूलों में सुबह की असेंबली के दौरान गाना अनिवार्य किया था। इस गीत को भी टैगोर ने ही 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध प्रदर्शनों के दौरान लिखा था।

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की कलजयी रचना 'बंदे मातरमÓ भी अब इस लिस्ट में शामिल हो गया है हालांकि नए आदेश के बाद स्कूल प्रमुख असमंजस में पड़ गए हैं क्योंकि उनमें से कई ने कहा कि नए नोटिस में राज्य गीत के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है लेकिन सुबह की प्रार्थना के दौरान बच्चों को तीन गीत बंदे मातरम, बांग्लार माटी और राष्ट्रगान गाना आसान नहीं होगा। सरकारी आदेश को लेकर एक स्कूल प्रमुख ने कहा, हम राष्ट्रगान को नहीं छोड़ सकते, क्योंकि यह अनिवार्य है। अब हमारा पहला गीत बंदे मातरम होगा और राज्य गीत को शामिल किया तो इसमें और समय लगेगा। इस वजह से क्लास शुरू होने में देरी होगी। 

राष्ट्र प्रेम की भावना बाल्यकाल से ही हो यह एक सकारात्मक सोच है इसलिए राष्ट्रगान से बच्चों की सुबह-सुबह करना एक स्तुत्य कदम है। लेकिन जिस ढंग से फरमान हड़बड़ी में शुरू किया गया है उसमें शिक्षण संस्थानों में अशांति और नई बहस छिड़ जाएगी। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पश्चिम बंगाल में स्वतंत्रता के पश्चात शिक्षा को प्राथमिकता और अहमियत दी गई है। बंगाल देश का एक ऐसा प्रांत है जिसने बड़े बुद्धिजीवी और मनीषियों को जन्म दिया है। नोबेल पुरस्कार विजेताओं में भी बंगाल शीर्ष पर रहा है। यही नहीं, देश के स्वतंत्रता संग्राम में सबसे अग्रिम पंक्ति में बंगाल का नाम आता है। ऐसी स्थिति में शिक्षा के साथ राष्ट्रीय भावना हमारे मिट्टी में है लेकिन शिक्षा व्यवस्था एवं प्रबंधन की ओर नजर घूमायें तो पाएंगे कि कोलकाता और प.बंगाल में शिक्षण संस्थानों की लगाम निजी संगठनों के हाथ में है। कई धार्मिक तो कई जातीय संस्थाओं के शिक्षा प्रतिष्ठान चल रहे हैं और उनके पिछले वर्षों में लगातार विस्तार हो रहा है। जातीय व धार्मिक संस्थाएं अपने संस्थानों के गीत को अपने शिक्षा प्रतिष्ठान में गाने के लिए छात्र-छात्राओं से अपेक्षा रखते हैं। मसलन कुछ मुस्लिम संगठन, तो कुछ जैन समाज के और कुछ ईसाई संस्थाओं के शिक्षा प्रतिष्ठान है जहां उनकी प्रार्थना से कक्षाओं की शुरुआत होती है निजी संस्थाएं सरकारी फरमान को मानने हेतु बाध्य नहीं है लेकिन राष्ट्र प्रेम की भावना से ओत-प्रोत सरकारी आदेश से परहेज रख कर वे राज्य की मुख्यधारा से अलग अपना अस्तित्व बनाकर रखेंगे, यह कहां तक उचित होगा। इसलिए ज्यादा अच्छा होता कि राष्ट्रीय भावना पर अपनी अपनी डफली, अपनी-अपनी राग के मुकाबले शिक्षण संस्थानों में आपसी समन्वय एवं विवाद रहित एक वातावरण बनाने की चेष्टा करते। अगर बंदे मातरम सिर्फ सरकारी स्कूलों के बच्चे ही गए तो यह दुर्भाग्यजनक स्थिति होगी। हम सभी जानते हैं सरकारी स्कूलों में बच्चे मजबूरी में पढ़ते हैं या पढ़ाये जाते हैं। वे सिर्फ इसलिए पढ़ पाते हैं क्योंकि उनसे फीस नहीं ली जाती और उन्हें मिड डे मिल भी परोसा जाता है। किताबें भी सरकार मुहैया करती है। इन सब सुविधाओं के बावजूद इन स्कूलों में 'ड्रॉप आउटÓ सर्वाधिक है। सरकारी धन पोषित स्कूलों में पैसा शिक्षकों के वेतन में वितरित हो जाता है। मजबूर एवं उपेक्षित स्कूलों में अपनी पसंद की राष्ट्रीय गीत के चलन से उमड़ी राष्ट्रीय भावना कहां तक बच्चे हृदयंंगम कर पाएंगे यह विचारणीय सवाल है।

एक बात और पश्चिम बंगाल की नई सरकार ने विगत 9 मई को कविगुरु रविंद्रनाथ टैगोर के जन्मदिन पर शपथ ली। सरकार के इस तरह के महत्वपूर्ण कार्यक्रम में ना तो जन गण मन सुनाई दिया और ना ही वंदे मातरम जब इस तरह के बड़े सरकारी अनुष्ठान में राष्ट्रीय गीत को स्थान नहीं दिया गया, वहां उनका फरमान सरकारी स्कूलों में कहीं 'पर उपदेशÓ वाली उपेक्षा का शिकार ना हो जाए। 

स्मरण होगा कि कुछ वर्ष पहले सिनेमाघरों में फिल्म समाप्त होने के तुरंत बाद राष्ट्रीय गीत 'जन गण मनÓ  को गाये जाने की परम्परा शुरू हुई थी। कुछ वर्ष बाद सरकारी फरमान जारी कर उसे बंद कर दिया गया। ऐसा इसलिए किया गया कि फिल्म समाप्त होते ही सिनेमा हॉल में बैठे दर्शकों का राष्ट्रीय गान गाने का न तो मूड होता है और न ही फिल्मी दर्शकों की मानसिकता। फलस्वरूप दर्शकों से जाने अनजाने राष्ट्रीय गीत का अपमान होने लगा। फिल्म के अन्त में राष्ट्रीय गीत बजाने की परम्परा को रोक दिया गया और लोगों ने राहत की सांस ली। इसी तरह सारी बातों को सोचे या समझे बिना राष्ट्रीय गीत की परम्परा शुरू कर देना आसान है पर उसके उपयुक्त वातावरण तैयार करना इतना आसान नहीं है। 

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