बेटल फॉर बंगाल
पश्चिम बंगाल ने इतिहास रचा है। मौसम की नाराजगी और बारिश के बावजूद मतदान केन्द्रों पर मतदाताओं की भीड़ खड़ी रही और घंटों इंतजार के बाद अपने वोट डाले। दोनों चरणों को मिलाकर प. बंगाल में 92.47 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। प. बंगाल में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि विपक्ष ने सत्ता पक्ष को कड़ी चुनौती दी लेकिन यह तय है कि उसे बंगाल की नाराजगी झेलनी पड़ेगी। कड़े मुकाबले के कारण सरकार किसकी बनेगी इस पर सस्पेन्स बना हुआ है। यह सोमवार को ही स्पष्ट होगा कि यहां दीदी अगले पांच वर्षों तक चौथी बार सत्ता पर काबिज होगी या परिवर्तन होगा। भ्रम की स्थिति बनी हुई है। एग्जिट पोल में दो में बंगाल में कमल खिलने की संभावना दिखाई है तो दो ने दीदी की पुनरावृत्ति को अंकों में दिखाया है। दो एग्जिट पोल ने भाजपा और तृणमूल के बीच लगभग बराबर की टक्कर दिखाई है। एक एग्जिट पोल ने अपने ‘शो’ को यह कहकर वापस ले लिया कि उन्हें सही स्थिति नहं बताई गई और एक एग्जिट पोल ने सभी एग्जिट पोल के खुलासे के बाद अपने पत्ते दिखाये। ऐसा क्यों किया कारण नहीं बताया गया।
प. बंगाल में जिस तरह चुनाव की प्रक्रिया चली उसे भी इतिहास याद रखेगा। लगभग ढाई लाख केन्द्रीय बल की तैनाती की गई ताकि निष्पक्षता से चुनाव कराया जा सके। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हालात को देखते हुए केन्द्रीय बल पर पक्षपात का आरोप लगा दिया। केन्द्रीय बल पर भाजपा के इशारे पर लाठीचार्ज करने और उनके लिए काम करने का दोषारोपण किया गया। इसके बावजूद शांतिपूर्ण या बिना किसी हिंसा के चुनाव होना एक बड़ी चुनौती थी। साल 2021 के विधानसभा चुनाव में बंगाल में 300 के करीब हिंसक घटनाएं हुई थीं और 58 लोग मारे गये थे। पिछली बार चुनाव में मतदान से पहले और आठ चरणों में हुए मतदान के समय और वोट पर्व के बाद भी हिंसा हुई थी जिससे प. बंगाल के दामन पर दाग लगे थे। ज्ञात रहे बंगाल देश में सर्वाधिक राजनीतिक हिंसा वाला राज्य है।
पूरे देश में चुनाव के दौरान सबसे ज्यादा हिंसा पश्चिम बंगाल में होती है। स्थानीय निकायों से लेकर विधानसभा और लोकसभा चुनावों तक, राज्य ने बार-बार खून-खराबा, लूटपाट और हत्या की घटनाओं का सामना किया है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में राजनीतिक हत्याओं की दर सबसे अधिक पश्चिम बंगाल में रही है।
भारत विभाजन के दौरान भी बंगाल हिंसा के सर्वाधिक शिकार राज्यों में से था। 1946 में मुस्लिम लीग द्वारा किए गये ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की हिंसा और भारत विभाजन के बाद नोआखली में हुए दंगों ने बंगाल को न मिटने वाले जख्म दिये थे मगर स्वतंत्रता मिलने के महज दो दशक बाद बंगाल एक अलग तरह के हिंसक राजनीतिक उग्रवाद की चपेट में आ गया।
इसकी शुरुआत बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में 1967 में हुई। यहां स्थानीय जमींदारों द्वारा शोषण के खिलाफ बटाईदार किसानों ने आवाज उठाई और जमीन पर अपने हक का दावा किया। हालांकि, चारू मजूमदार और कानू सान्याल जैसे वामपंथी नेताओं के नेतृत्व में यह आंदोलन तब हिंसक हो गया, जब 25 मई 1967 को पुलिस की गोलीबारी में 11 ग्रामीण जिनमें महिलाएं और बच्चे शामिल थे की मौत हो गई।
इस त्रासदी ने पूरे देश में एक बड़े सशस्त्र संघर्ष की चिंगारी सुलगा दी, जिसने माओवादी विचारधारा को भारत में स्थापित किया और भारतीय राजनीति व सुरक्षा व्यवस्था को हमेशा के लिए प्रभावित किया। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि वामपंथी उग्रवाद के उदय के साथ बंगाल में राजनीतिक हिंसा ‘सामान्य’ बनती गयी।
मार्च 1970 में हुई सांईबाड़ी हत्याकांड बंगाल की यादों में एक गहरा जख्म है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं का परिवार नवजात शिशु के नामकरण समारोह के लिए एकत्रित हुआ था, तभी कथित रूप से वामपंथी नेताओं के नेतृत्व में एक भीड़ ने घर में घुसकर पुरुष सदस्यों की उनकी मां के सामने बेरहमी से हत्या कर दी और बाद में उन्हें उनके बेटे के खून से सने चावल जबरन खिलाए।
ऐसी घटनाएं धीरे-धीरे बंगाल में आम होती चली गईं और जल्द ही एक ‘गन कल्चर’ उभरकर सामने आया, जिसमें नेता और उनके हथियारबंद समर्थक एक ही सिक्के के दो पहलू बन गए।
भारत विभाजन के बाद से ही राज्य की सत्ता पर काबिज कांग्रेस भी हिंसा की नई संस्कृति को अपनाने में पीछे नहीं रही। राजनीतिक जानकारों के अनुसार 1972 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत को भी बड़े पैमाने पर बल प्रयोग और दबाव का नतीजा माना गया।
1977 के विधानसभा चुनाव में पहली बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेतृत्व में वाम मोर्चा सत्ता में आया। ग्रामीण सुधारों के साथ-साथ पंचायतों पर धन और बल के जरिए नियंत्रण उसका मुख्य फोकस रहा। राजनीति वैज्ञानिक द्वैपायन भट्टाचार्य ने राज्य की मौजूदा स्थिति के उल्लेख के लिए ‘पार्टी सोसाइटी’ शब्द गढ़ा। इसका अर्थ था एक ऐसा दौर जहां राजनीति का समाज पर पूरा वर्चस्व हो गया और विपक्ष को व्यवस्थित तरीके से दबाया गया।
1993 में कोलकाता में प्रदर्शन कर रहे यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर पुलिस फायरिंग ने फायरिंग की। 21 जुलाई को हुई इस घटना में 13 लोग मारे गए। इस घटना का उल्लेख ‘शहीद दिवस’ के तौर पर किया जाता है। इसके बाद मरिचझांपी और 1982 के अन्य हत्याकांडों ने राज्य में भय और हिंसा का माहौल बना दिया।
आखिरकार 2007-08 के सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों में हुई हिंसा जिसमें 50 लोगों की मौत हुई थी, इसने राज्य की वाम मोर्चा की सरकार के पतन का रास्ता खोल दिया। सीपीएम सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करके चर्चा में आयी ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने 2011 में राज्य चुनाव में जीत हासिल करके सत्ता परिवर्तन किया।
ममता बनर्जी के नेतृत्व में राज्य में सत्ता परिवर्तन तो हो गया मगर राजनीतिक हिंसा की संस्कृति में ज्यादा बदलाव नहीं आया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2011 में चुनाव बाद करीब 50 वामपंथी कार्यकर्ताओं की हत्या हुई। इसके बाद 2018 के पंचायत चुनाव, 2019 लोकसभा चुनाव और 2021 विधानसभा चुनाव भी हिंसा से प्रभावित रहे, जहां कई लोगों की जान गई और बड़े पैमाने पर टकराव देखने को मिला। 2021 के विधानसभा चुनावों के दौरान हिंसा अपने चरम पर पहुंच गई। इसी साल गृह मंत्री अमित शाह ने दावा किया था कि राज्य में टीएमसी द्वारा 130 बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या की गई।
विधानसभा चुनाव के बाद हत्या, दुष्कर्म और विपक्षी समर्थकों के विस्थापन जैसी घटनाएं सामने आईं। हालांकि, एनसीआरबी की रिपोर्ट में सिर्फ सात ‘राजनीतिक हत्याओं’ का जिक्र है, जिसे सच्चाई से दूर माना जाता है। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स में मौतों के आंकड़े 11 से लेकर 25 और यहां तक कि 37 तक बताए गए हैं। साल 2023 का पंचायत चुनाव पश्चिम बंगाल में हाल के वर्षों के सबसे हिंसक स्थानीय चुनावों में से एक रहा। नामांकन शुरू होते ही हिंसा का दौर शुरू हो गया, जो मतगणना तक जारी रहा। कुल मिलाकर करीब 45 से 55 लोगों की मौत की खबरें सामने आईं, जिनमें से 12 से 18 लोगों की जान मतदान के दिन गई। जबकि लोकसभा चुनाव 2024 में मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 6 से 10 लोगों को जान जाने का जिक्र है।
पश्चिम बंगाल के रण में कानून व्यवस्था विपक्ष का सबसे बड़ा हथियार साबित हो रही है। इस हथियार के सहारे एक बार फिर तृमूल कांग्रेस (टीएमसी) राजनीतिक दलों के निशाने पर है। तृणमूल कांग्रेस खुद इसी मुद्दे को हथियार बनाकर सत्ता में आई थी। इस असर को न सिर्फ राजनीतिक दल बल्कि निर्वाचन आयोग भी समझ रहा है, यही वजह है कि चुनाव के बाद भी राज्य में एक हजार केंद्रीय बलों की कंपनी तैनात रहेगी।
चुनावी या राजनीतिक हिंसा के लिए अक्सर बिहार का नाम लिया जाता है। बिहार ने अपने दामन पर लगे दाग को छुड़ा लिया है और आंकड़े बताते हैं कि पं. बंगाल ने भी न्यूनतम हिंसक घटनाओं के साथ चुनाव 2026 में इसकी शुरुआत कर दी है। अब यहां जो भी और जिसकी भी सरकार बने उसे सुनिश्चत करना चाहिये कि राजनीतिक भद्रता की ओर कदम बढ़ाए। मतदान के बाद भी सुरक्षा बलों को निष्पक्ष और सतर्क रहना चाहिये। आगामी दिनों में चुनाव आयोग को भी सजग और पारदर्शी रहना होगा जिससे चुनाव परिणाम पर पक्षपात की उंगली न उठे।
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