चुनावी मौसम में धर्म संकट - काको तजूं काको भजूं!

चुनावी मौसम में धर्म संकट

काको तजूं काको भजूं!

सदियों से ‘धर्म और राजनीति’ या ‘राजनीति और धर्म’ में काफी गहरा संबंध रहा है। शुरुआत में धर्म, शासन के लिए सुव्यवस्था और सुनीति का संस्थापक बना।  परंतु, बाद में अनेक शासकों ने धर्म विशेष को अपना राजधर्म घोषित किया और अपने अनुयायियों की तादात बढ़ाने के लिए धर्म की आड़ में युद्ध किया है।  इस्लाम, ईसाई, यहूदी और हिंदू धर्म से पृथक हुए कुछ वर्गों ने शक्ति की आड़ में अपनी मान्यता व अपने धर्म के विस्तार का कार्य किया।  धर्म और राजनीति में हमेशा मर्यादित संपर्क बना रहना चाहिए, जिससे कि दोनों एक दूसरे की परस्पर सकारात्मक मदद कर सकें।  ऐसा ना होने पर इससे धार्मिक प्रतिक्रियावाद, कट्टरपंथ, सांप्रदायिकता व गुलामी की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। यह स्वतंत्रता और समानता जैसे महत्वपूर्ण मूल्यों को प्रभावित करती हैं। इसलिए आज दुनियाभर में अधिकांश लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को अपनाया गया है।


स्वतंत्रता से पहले ही भारत में धार्मिक आधार पर राजनीतिक दलों का गठन होने लगा था। जैसे- मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा आदि। धर्म के नाम पर भारत का विभाजन होने के बावजूद यह राजनैतिक दल न केवल अस्तित्व में रहे बल्कि धार्मिक सांप्रदायिकता को बढ़ावा भी देते रहे। यह सांप्रदायिक दल धर्म को राजनीति में प्रधानता देते हैं। धर्म के आधार पर प्रत्याशियों का चुनाव करते हैं और संप्रदाय के नाम पर वोट मांगते हैं।

धार्मिक संगठन भारतीय राजनीति में सशक्त दबाव समूह की भूमिका अदा करते हैं। यह समूह न केवल शासन की नीतियों को प्रभावित करते हैं, बल्कि अपने पक्ष में अनुकूल निर्णय भी करवाते हैं।  बहुत बार अप्रत्यक्ष रूप से धर्म के आधार पर पृथक राज्य की मांग भी की जाती है। पंजाब में अकाली दल द्वारा अलग राज्य की मांग ऊपरी स्तर पर तो भाषा ही नजर आती है परंतु यथार्थ रूप से यह धर्म के आधार पर पृथक राज्य की मांग थी। यही नहीं हिंदू राष्ट्र की मांग भी होती रहती है। केंद्र एवं राज्य के मंत्रिमंडल के निर्माण में भी हमेशा इस बात को ध्यान में रखा जाता है, कि प्रमुख धार्मिक संप्रदायों के लोगों को उसमें प्रतिनिधित्व प्राप्त हो जाए।


समस्त राजनीतिक दल चुनाव से पूर्व अपने उम्मीदवारों का चयन करते हैं। ऐसा करते वक्त तकरीबन सभी राजनीतिक दल उम्मीदवारों के धर्म और चुनाव क्षेत्र के लोगों के धर्म के प्रति खास ध्यान देते हैं। इस प्रकार धर्म को समक्ष रखकर उम्मीदवारों का चयन भारतीय राजनीति पर सांप्रदायिक प्रभाव दर्शाता है। सभी राजनीतिक पार्टियां भारी बहुमत हांसिल करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण धार्मिक अल्पसंख्यकों को संतुष्ट करने का हर संभव प्रयास करते हैं, ताकि वे ज्यादा से ज्यादा मत प्राप्त कर सकें। अक्सर इसके वोट सुरक्षा की मानसिकता से प्रभावित होते हैं। अत: वे मतदान के पाले तय कर लेते हैं कि कौन सी पार्टी उनके सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम करती है फिर सभी एक ही चिन्ह पर वोट डालते हैं। इस प्रकार की गतिविधियां राजनीति को सांप्रदायिक रंग देने के लिए उत्तरदायी होती हैं।

हर एक राजनीतिक दल उम्मीदवारों का चयन करते समय इस बात का खास ध्यान रखते हैं, कि अलग अलग धर्मों के लोगों को अपने उम्मीदवारों की सूची में शामिल करें, जिससे कि उन धर्मों के लोग उस दल को वोट दें। भारतीय राजनीति में धर्म की अहम भूमिका है। भारतीय राजनीतिक इतिहास में धर्म हमेशा से राजनीति का केंद्र बिंदु रहा है।  आज के समय में भी राजनीति के अंदर धर्म की भूमिका साफ नजर आती है। लेकिन, राजनीति का धर्म होना चाहिए ना कि धर्म की राजनीति।

इस ऐतिहासिक भूमिका के परिपेक्ष में आज का चुनाव प्रत्याशी बड़े संकट में है । जब कभी ईश्वर के दर पर जाता है और माथा टेकता है तब उसे एहसास होता है की वोटिंग एवं मशीन पर चुनाव चिन्ह का बटन तो जनता दबाती है। फिर वह घर-घर जाकर हाथ जोडक़र अपने मतदाताओं से प्रार्थना करता है। पूजा और वोट के लिए याचना के बीच द्वंद्व में वह इधर-उधर भटकता है।

पिछले संसदीय चुनाव की बात है। कोलकाता उत्तर से सीपीएम प्रार्थी मो. सलीम साहब जब पोस्ता की हनुमान गली के पास से गुजर रहे थे कि कुछ समर्थकों ने उनसे पास के मंदिरों से चरणामृत लेने का सुझाव दिया। धर्मनिरपेक्ष सलीम साहब ने मंदिरों की ओर रुख किया। मुस्लिम होते हुए भी वे मानव धर्म में अटूट विश्वास रखते हैं। लेकिन मामला वोट का था तो उन्होंने हनुमान मंदिर में पेड़े के प्रसाद के साथ चरणामृत का आचमन किया। फोटोग्राफर साथ ही घूम रहा था। फोटो खींच गई। अगले दिन उर्दू के लीडिंग अखबार के पहले पेज पर सलीम साहब चरणामृत का आचमन करते हुए नजर आए। हिंदू वोटरों पर तो कोई असर नहीं वहां पर क्षेत्र के मुस्लिम वोटर भडक़ गए चुनाव नतीजे में सलीम साहब पिछड़ गए।

अभी दो-तीन दिन पहले फिल्म अभिनेत्री कंगना राणावत कोलकाता के कालीघाट में बड़ी तन्मयता से पूजा अर्चना की। सिने तारिका की यह अदा भी अच्छी लगी। इसका उनके फिल्मी चहेतों तो पर क्या असर पड़ा पता नहीं पर उनका मानना है कि उन्हें राजनीतिक लाभ अवश्य मिलेगा। असम के मुख्यमंत्री अभी संकट में हैं। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने उनके बारे में कहा है कि वह देश में सबसे भ्रष्ट मुख्यमंत्री हैं। उन्हें अपनी छवि को साफ सुथरा करने के लिए मां काली याद आई। शायद इन सब कामों के लिए मां काली कलकत्ते वाली तेरा वचन न जाए खाली का स्मरण हुआ। उन्होंने भी काली मां से मन्नतें मांगी। शर्मा जी के गुवाहाटी में मां कामाख्या का मंदिर है। वहां भी भक्तगण जाते हैं लेकिन असम के मुख्यमंत्री होने के नाते वहां जाना सोशल मीडिया का सबब बन सकता था इसलिए उन्होंने भी मां काली की शरण ली। कांग्रेस से भाग कर भाजपा में आकर वाशिंग मशीन से धुलने के बाद भी जब मैल नहीं उतरा तो मां काली के दर पर गए। और ऐसे असंख्य उदाहरण है जब सुबह दरवाजे पर मतदाताओं को हाथ जोडक़र प्रार्थना करते हैं पर मन नहीं मानता तो भगवान के दरवाजे पर साष्टांग करते हैं। चुनावी मौसम में बेचारा प्रार्थी कहां-कहां भटकता है यह गौर करने की बात है। परमात्मा सब की सुनता है पर चुनाव में तो जीत किसी एक की ही होती है लेकिन किस्मत आजमाने में कोई पीछे नहीं रहता। 

जनता जनार्दन लोकतंत्र की आधारशिला होता है। उनसे याचना करने पर भी ऊपर वाले की भी सुध लेता है। ईश्वर कितना खुशकिस्मत होता है कि मतदाताओं की मर्जी और उसकी नजर उतारने के बावजूद लोग उनकी चौखट पर अपना शीश नवाते हैं।

अब से 15-20 साल पहले लोग साईं बाबा, इसके बाद महाकाल को पूजते थे। आज ट्रेंड चल रहा है खाटू श्याम जी का। लोग वक्त के हिसाब से भगवान बदल लेते हैं। धर्म और राजनीति के बीच मर्यादित और रचनात्मक संबंध संख्यात्मक हो सकता है लेकिन इसका दुरुपयोग राष्ट्र की एकता और धर्मनिरपेक्षता ढांचे के लिए चुनौती बन जाता है। भारत जैसे बहू विश्वासी राष्ट्र में इसको समझने की जरूरत है।

और अंत में -

अंदाज़ कुछ अलग है मेरे सोचने का

सबको मंजिल का शौक है

और मुझे सही रास्तों का।  

Comments