पूत कपूत तो क्या धन संचय?
रेमंड ग्रुप के पूर्व अध्यक्ष विजयपत सिंघानिया का गत 28 मार्च को 87 वर्ष की आयु में निधन हो गया। इससे पूर्व किसी बड़े धन कुबेर के गुजरने पर सोशल मीडिया इतना सक्रिय नहीं हुआ जितना विजयपति के चले जाने पर। विजयपत ने रेमंड ग्रुप की कमान संभाली तो काफी लंबे समय तक उन्होंने किसी और को रेमंड के आसपास टिकने नहीं दिया। याद करिए वह समय था जब रेमंड की सूट के बिना शादी में दूल्हा ' कंप्लीट मैनÓ नहीं समझा जाता था। एक दौर ऐसा था जब शादी ब्याह में खास डिमांड होती थी कि रेमंड का सूट जरूर लाना। यह दूल्हे का उसके परिवार का स्टेटस सिंबल बन गया था। अपने बिजनेस घराने को नई ऊंचाइयों पर पहुंचने वाले विजयपत सिंघानिया का आखिरी वक्त निजी जीवन को लेकर काफी विवादों में रहा। उन्हें अपने ही बेटे के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
आइए आपको बता दूं जिस कारोबारी विरासत को उन्होंने खड़ा किया वह आगे कैसे बढ़ा और फिर उसका क्या हश्र हुआ। इसे समझने के लिए आपको कानपुर जाना होगा और भारत का मैनचेस्टर जाने जाने वाले शहर के मोहल्ले पटकापुर से होते हुए शिवाला की संकरी गलियों का रुख करना होगा। भीड़ भाड़ वाले जनरल गंज इलाके में पुरानी शान से बड़ी इमारत नजर आती है जिस पर लिखा है- कमला टावर। सन 1934 में बनी यह इमारत किसी ब्रिटिश कालीन महल का एहसास कराती है। इस टावर के ऊपर लगी घड़ी लंदन के किसी क्लॉक टावर की तरह दिखती है। कभी इसी महल में जे के समूह का मुख्यालय हुआ करता था। इसे जेके हाउस भी कहा जाता था। वहीं से उस कारोबारी सोच ने आकर लिया जिसे कालांतर में देश के बड़े औद्योगिक घरानों में अपनी जगह बनाई। आमतौर पर भारत में ज्यादातर बिजनेस घरानों के नाम उनकी जाति के आधार पर प्रचारित होता है जैसे टाटा, बिड़ला, अडानी, अंबानी लेकिन सिंघानिया परिवार का मामला कुछ अलग है। जेके नाम का स्रोत कमलापत और उनके पिता सेठ जुग्गीलाल के नाम के शुरुआती अक्षरों से लिया गया है। लाला जुग्गी लाला और लाला कमलापत सिंघानिया ने इस समूह की नींव रखी थी। जेके ग्रुप की स्थापना 1918 में हुई। कानपुर से शुरू हुए इस घराने के तीन पावर सेंटर हैं - कानपुर, मुंबई और दिल्ली। इस पूरे समूह को जे के ऑर्गेनाइजेशन कहते हैं। 1975 में राजस्थान के झुंझुनू जिले के छोटे से कस्बे सिंघाना से कानपुर के पास फर्रुखाबाद के में आकर बस गए। कमलापत के बाद उनके तीन पुत्रों सर पदमपत, लाला कैलाशपत, लाला लक्ष्मीपत ने कारोबार संभाला। पदमपत के छोटे भाई ने काम के विस्तार के लिए कोलकाता और मुंबई चले गए। आज जेके का बिजनेस दुनिया के 100 से भी ज्यादा देशों में फैला हुआ है। इस समूह का कुल नेटवर्क 50 से 60 हजार करोड़ रुपए का बताया जाता है।
विजयपत लाला कैलाशपत सिंघानिया के बेटे थे। उन्होंने 1980 में रेमंड का नेतृत्व संभाला और साल 2000 तक रेमंड ग्रुप के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक (एमडी) दोनों रहे। वे बड़े कारोबारी के अलावा बहुत ही गजब के पायलट भी थे। उनका दिल आसमान में बसता था। साल 1988 में लंदन से अहमदाबाद तक एक माइक्रो लाइट विमान को अकेले उड़ा कर उन्होंने दुनिया को चौंका दिया। 9 हजार किलोमीटर से अधिक की इस यात्रा ने उन्हें एक पायलट के रूप में स्थापित कर दिया। वे यहीं नहीं रुके। साल 2005 में 67 साल की आयु में उन्होंने 'हॉट बैलूनÓ यानी गर्म हवा के गुब्बारे में सबसे ऊंची उड़ान का विश्व रिकॉर्ड बनाया। अगले वर्ष ही उन्हें भारत के राष्ट्रपति ने पद्म भूषण से सम्मानित किया।
ऊंची उड़ान में 70 हजार फीट ऊंचाई तक गर्म गुब्बारे 'हॉट बैलूनÓ को उड़ाकर पूरी दुनिया को चौंकाने वाले विजयपत को पता नहीं था कि आसमान को नाप लो पर यह दुनिया हवा का बैलून नहीं। कुछ समय बाद में उन्हें जमीनी हकीकत से रूबरू होना पड़ा।
उनके जीवन का सबसे दर्दनाक मोड़ तब आया जब उन्हें अपने बेटे गौतम सिंघानिया के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। सन् 2015 में उन्होंने रेमंड ग्रुप में अपनी पूरी 37' हिस्सेदारी (करीब 1000 करोड़ रुपए) अपने छोटे बेटे गौतम सिंघानिया को दे दी थी। बाद में इकोनामिक टाइम्स को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने अपने इस फैसले को जीवन की सबसे बड़ी गलती बताया। पर बहुत देर हो चुकी थी। हालात ऐसे बने कि कभी इस ग्रुप के अध्यक्ष रहे विजयपत सिंघानिया को अपने ही घर में रहने के लिए कानूनी लड़ाई लडऩी पड़ी। पिता विजयपत ने परिवार के घर जेके हाउस में बेटे पर जगह न देने का आरोप लगाया था। इसके बाद बेटे ने पिता के इस निर्णय का यह सिला दिया कि पिता को किराए के मकान में रहना पड़ा। सबसे अमीर उद्योगपतियों में एक विजयपत 70 हजार फुट ऊंची उड़ान भरने के बाद धराशाई हो गए। महल छोड़कर उन्हें एक किराए के मामूली फ्लैट में शरण लेना पड़ा। यह खबर उस वक्त कई अखबारों ने सुर्खियों में छापी तो काफी समय तक घर-घर में चर्चा का विषय बना। 2015 में हालात बदलने लगे और इस साल ने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। सबसे पहले उनकी पत्नी माधुरी से उनका तलाक हुआ इसके निपटारे के तत्वों ने लगभग 3704 करोड़ रुपए देने पड़े। रिपोर्ट्स के अनुसार 12 हजार करोड रुपए की संपत्ति वाले रेमंड के अध्यक्ष विजयपत को अपना आलीशान मकान छोड़कर किराए के मकान में जीवन के शेष समय गुजरना पड़ा। 'कंप्लीट मैनÓ के उद्घोषकÓ जो कभी बड़े अधिकारियों एवं हर क्षेत्र के बड़े-बड़े लोगों से घिरे रहते थे से कोई मिलने भी नहीं आता था। कुछ लोग इस डर से भी नहीं आते थे कि विजयपत के पुत्र गौतम के प्रकोप का कहीं शिकार न होना पड़े। रिश्तेदारों ने भी उस रास्ते जाना छोड़ दिया जहां विजयपत रहते थे। उन्होंने मुंबई से परिवार के जाने-माने जेके हाउस में एक डुप्लेक्स अपार्टमेंट देने के वादे को लेकर चिंता जताई। विजयपत ने दावा किया कि वह घर में दाखिल नहीं हो सकते थे क्योंकि उनके लिए घर में जाना माना है।
इस तरह फर्श से अर्श तक पहुंचे पूरे आसमान को अपने हॉट बैलून वाले करतब से नापने वाले विजयपत सिंघानिया की मृत्यु का समाचार एक अभूतपूर्व दुर्योग का पटाक्षेप है जिसमें कहा गया है कि- पूत कपूत तो क्या धन संचय, पूत सपूत तो क्या धन संचय?

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