स्वतंत्र हुए हैं स्वाधीन नहीं
तुलसी, कबीर, रहीम, रैदास, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानंद सरस्वती ने स्तुत्य प्रयासों के बावजूद हिन्दू धर्म में भगवान के घर भी भेदभाव का दंश कम नहीं हुआ है। हम कहते हैं सब भगवान के बन्दे हैं पर यह सिर्फ कहने तक सीमित है। वास्तविकता इससे कोसों दूर है। सबसे बड़ी त्रास्दी यह है कि 21वीं शताब्दी में जब वैज्ञानिक प्रगति भी बेमिसाल है, हम चांद तक पहुंच चुके हैं, मंगलयान से मंगलग्रह के रहस्य खोजने में जुटे हैं, मानव मात्र में ऊँच, नीच, छोटा-बड़ा की दुष्चिन्ता से अपने का उबार नहीं पाये हैं।
30 जनवरी को भारत ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्य तिथि मनाई। देश की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिये जीवन दानी इस महापुरुष को नमन करते हैं किन्तु उनके आदर्श और मानवीय मूल्यों के प्रति हम आज भी उदासीन है।
गांधी के चश्मे को हमने स्वच्छता अभियान का प्रेरक बनाया लेकिन गांधी की दृष्टि को अपने कर्मों से खारिज कर ऊपरी जुबान से उनके प्रिय भजन रघुपति राघव राजा राम गुनगुनाते हैं किन्तु हमारी वर्तमान सामाजिक दृष्टि इससे मेल खाती नहीं है। देश की न्याय व्यवस्था भी उन संकीर्णताओं को प्रश्रय देती है जिसके चलते भारत गुलामी के अग्रिकुंड में सदियों तक कराहता रहा।
मंदिर में आगे वीआईपी एवं पीछे जनता जर्नादन।
जिस देश में संविधान देश के हर नागरिक को समान समझता है उसी देश में अदालतें खास आदमियों के खिलाफ कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं हैं। इस खास आदमी को वीआईपी कहा जाता है। ये संविधान को धता बताता है। भारत में वरिष्ठ नागरिकों को सम्मान नहीं है लेकिन वीआईपी अगर दूधमुंहा बच्चा भी है तो उसके लिए हर जगह खास इंतजाम है। इन्हें चुनौती देने वाले अदालत की नजर में श्रद्धालु नहीं हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि देश के सुप्रीम कोर्ट ने उज्जैन के महाकाल मंदिर में भेदभाव का आरोप लगाने वाली उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें वीआईपी दर्शन पर रोक लगाने और सभी के लिए बराबर अवसर की मांग की गई थी। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि इस तरह की याचिका दायर करने वाले असली श्रद्धालु नहीं होते हैं, बल्कि उनका उद्देश्य कुछ और होता है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा कि ऐसे विषयों पर गाइडलाइंस या नीति बनाना उसका काम नहीं है। दर्पण अवस्थी की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि इस तरह की याचिका लगाने वाले असली श्रद्धालु नहीं होते। सीजेआई ने कहा, ‘वे श्रद्धालु नहीं हैं। हम आगे इस पर बोलना नहीं चाहते हैं। इन लोगों का उद्देश्य कुछ और होता है।’
क्या करना चाहिए और क्या नहीं, यह फैसला करने का काम कोर्ट का नहीं है। हम न्यायिक प्रक्रिया के लिए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील की दलीलों को सुनने के बाद अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया किंतु याची को सरकार के सामने आवेदन लगाने की अनुमति दी। याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि गर्भगृह में प्रवेश को लेकर समान नीति होनी चाहिए। उन्होंने कहा, अनुच्छेद 14 का उल्लंघन हो रहा है। सभी के लिए समान नियम होने चाहिए।
वीआईपी स्टेटस के आधार पर नागरिकों से भेदभाव नहीं किया जा सकता। यदि कोई कलेक्टर की सिफारिश में गर्भगृह में प्रवेश कर रहा है, तो महाकाल जाने वाले दूसरे श्रद्धालुओं को भी वहां जाकर देवता को जल चढ़ाने की अनुमति मिलनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि अवस्थी ने इससे पहले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। वीआईपी श्रद्धालुओं को गर्भगृह में जाकर जल चढ़ाने और आम लोगों को ऐसा करने की अनुमति नहीं होने को भेदभाव बताते हुए रोक की मांग की थी। हाई कोर्ट से निराश मिलने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। मजे की बात यह है कि हमारी अदालतें एक ओर धर्म से जुड़े मामले सुनना नहीं चाहतीं, दूसरी ओर वे असली-नकली शंकराचार्य का मामला सहर्ष स्वीकार कर लेती हैं। वे मंदिर-मस्जिद के लिए खुदाई का आदेश देती हैं। महाकाल मंदिर ही नहीं हर मंदिर में वीआईपी को आम आदमी से ज्यादा महत्व दिया जाता है। अदालत में फैसला करने वाले जिला जज से लेकर सीजेआई तक वीआईपी का लेबल चस्पा करने में आनंदित होते हैं।
वीआईपी की न कोई जाति होती है न धर्म न लिंग न आयु। वीआईपी ईश्वर की बनाई विशेष कृति होती है। क्योंकि वीआईपी संस्कृति का उद्भव सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़ा है। वीआईपी संस्कृति की जड़ें सत्ता, पद और विशेषाधिकार में हैं। जैसे ही समाज ने कहा ‘सब बराबर हैं’, लेकिन कुछ थोड़े ज्यादा बराबर हैं, बस वहीं से वीआईपी पैदा हो गया।
राजशाही में राजा-महाराजा, अंगरक्षक, हाथी-घोड़े, दरबार यहीं से विशेष व्यक्ति की अवधारणा बना दी। अंग्रेज साहब आए, क्लब, वीआईपी का मतलब हुआ किसे अंदर जाने की इजाजत है। स्वतंत्र भारत में संविधान ने कहा सब नागरिक समान हैं लेकिन व्यवहार ने कहा, पर कुछ को ज़ेड-प्लस सुरक्षा, नेता, अफसर, जज, बाबू, लाल बत्ती, सायरन, प्रोटोकॉल, उनके लिए सडक़ खाली, जनता ट्रैफिक में। धीरे-धीरे वीआईपी व्यक्ति नहीं रहा, वीआईपी ‘आदत’ बन गई। आधुनिक वीआईपी संस्कृति में वीआईपी फिकेशन स्टेटस सिंबल है। अब वीआईपी होने के लिए सत्ता भी जरूरी नहीं। सोशल मीडिया फॉलोअर का नया प्रोटोकॉल स्टार, बाबा, कारोबारी। ‘इनसे मिलवाइए’, ‘इनका ध्यान रखिए’ और जनता? वीआईपी मूवमेंट है, पांच मिनट रुकिए—पांच मिनट पचास साल हो गए। नतीजा? लोकतंत्र में समानता कमजोर, सत्ता अहंकार में बदलती, और नागरिक दर्शक बनता जाता है। केंद्र सरकार की तरफ से 19,467 लोग वीआईपी माने गए, जिनके लिए 66,000 पुलिसकर्मी तैनात करने पड़े। मेरे ख्याल से असल में लोकतंत्र की असफलता का उत्सव है—जहां जनता राजा होती है, वहां राजा जनता से डरे, लेकिन यहां राजा को बचाने के लिए पूरी जनता को रोक दिया जाता है।
देश के सुप्रसिद्ध उद्योगपति, महात्मा गांधी के अभिन्न सहयोगी एवं चिन्तक घनश्याम दास बिड़ला ने भी एक आलेख ‘हिन्दुओं को नैतिक चुनौती’ जिसे मैंने छपते छपते के उत्सव विशेषांक-25 में प्रकाशित किया, की गत सप्ताह चर्चा रही। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और सामाजिक चिन्तशील व्यक्तियों ने इसे आज के संदर्भ में प्रकाशित करने पर बधाई दी। जाहिर है इन सबसे उत्साहवद्र्धन तो होता ही है, आत्मविश्वास यानि कॉन्फिडेंशियल लेबल भी बहता है पर ऊपर उल्लेखित घटना से मन मलीन होता है और लगता है कि हम भी हाथी के दांत की तरह दिखाने के और और खाने की और की तरह हैं। खैर, हमारा कर्तव्य है लिखते रहना और मन में विश्वास रखना है कि स्थितियां परिस्थितियां बदलेगी। हमें स्वाधीनता मिली है और स्वतंत्रता संग्रामियों के बलिदान को हम सलाम करते हैं पर कभी कभी सोचते हैं कि क्या हम आप भी सचमुच स्वाधीन (ढ्ढठ्ठस्रद्गश्चद्गठ्ठद्गठ्ठह्ल) हो पाये हैं। मानसिक गुलामी से स्वाधीनता आज भी बहुत दूर है।
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