कुत्ते सडक़ से कोर्ट तक
हाल के दिनों में देश की शीर्ष अदालत से लेकर आम विमर्श तक आवारा कुत्तों का मामला सुर्खियों में रहा है। इस संवेदनशील जटिल व विवादास्पद मुद्दे से जुड़े कई तरह के अंतर्विरोध सामने आ रहे हैं। लेकिन इस कड़ी में बिहार के सासाराम नगर निगम के बेतुके एवं हास्यास्पद फरमान की कड़ी आलोचना की जा रही है। फरमान के अनुसार शिक्षकों से सडक़ में आवारा कुत्तों की गिनती करने को कहा गया है। यानी प्रशासनिक अधिकारी यह जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है और शिक्षकों को जिन्हें क्षेत्र में पढ़ाने का दायित्व है उन्हें कुत्तों की गणना करने का भार दिया गया है। यह प्रशासनिक विफलता को भी उजागर करता है। साथ ही कभी जनगणना, कभी चुनावी ड्यूटी तो कभी आपदा सर्वेक्षण और अब कुत्तों की गिनती करने का बेतुका काम शिक्षकों के जिम्मे लगा दिया गया है। बिहार के स्कूलों का परीक्षा परिणाम बेहद निराशाजनक रहता है। ऐसी हालत में शिक्षकों से गैर शैक्षणिक कार्य के लिए कक्षाओं से बाहर निकालना नि:संदेह शिक्षा व्यवस्था के लिए आत्मघाती कदम ही कहा जाएगा। निश्चित रूप से कई शिक्षक कुत्तों से डरते भी होंगे। शिक्षकों को ऐसे कार्य करने के लिए कहना उनकी सुरक्षा के लिए भी चुनौती होगी। यह फरमान शिक्षकों और उन पर शैक्षणिक कार्य के लिए निर्भर शिशुओं दोनों के भविष्य के लिए खतरनाक है।
दूसरी ओर दिल्ली और एनसीआर में सडक़ों से आवारा कुत्तों को हटाकर एनिमल शेल्टर्स में रखने के सुप्रीम कोर्ट के $फैसले की का$फी चर्चाएं हैं। एक पक्ष इस $फैसले को अच्छा बता रहा है। वहीं पशु प्रेमी और पशुओं के लिए काम करने वाले संगठनों का मानना है कि आवारा कुत्तों की समस्या का यह स्थायी समाधान नहीं है। आठ हफ़्तों के अंदर सडक़ों से हटाकर एनिमल शेल्टर्स में आवारा कुत्तों को भेजने के $फैसले के ख़िला$फ सोमवार की शाम इंडिया गेट पर कुछ लोगों ने प्रदर्शन भी किया।
वहीं इस $फैसले को कैसे अमलीजामा पहनाया जाएगा इसको लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का कहना है कि यह $फैसला जनता को राहत देने वाला है और सरकार ईमानदारी से समस्या का समाधान करेगी। दूसरी ओर दिल्ली के मेयर इ$कबाल सिंह ने बताया है कि नगर निगम के पास कोई ‘शेल्टर होम नहीं हैं।’ हालांकि, इ$कबाल सिंह ने बताया कि दिल्ली नगर निगम के पास 10 नसबंदी केंद्र हैं जिन्हें बढ़ाया जा सकता है और कुछ शेल्टर होम बनाए जाएंगे।
आवारा कुत्ते रेबीज़ की बढ़ती घटनाओं की बड़ी वजहों में से एक हैं और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर चिंता जताई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबि$क, भारत में साल 2024 में रेबीज़ से 54 मौतें दर्ज की गईं, जो 2023 में दर्ज 50 मौतों से अधिक थीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि भारत में रेबीज़ के असली आंकड़ों की जानकारी नहीं है लेकिन उपलब्ध जानकारी के मुताबि$क हर साल इससे 18 से 20 हज़ार मौतें होती हैं। रेबीज़ और आवारा कुत्तों की समस्या दुनियाभर में है। इसको लेकर सबसे अहम सवाल यह उठता है कि भारत और दुनियाभर में आवारा कुत्तों पर $काबू पाने के लिए किस तरह की नीति का पालन किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसने सडक़ों से हर कुत्ते को हटाने का निर्देश नहीं दिया है और उसका निर्देश पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) नियमों के तहत इन आवारा कुत्तों से निपटने से संबंधित था। आवारा कुत्तों के मामले में दलीलें सुनते हुए न्यायालय ने कहा कि कुत्ते उन लोगों को सूंघ सकते हैं जो या तो उनसे डरते हैं या जिन्हें कुत्ते ने काटा हो और वे ऐसे लोगों पर हमला कर देते हैं। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन वी अंजारिया की विशेष पीठ, कुत्ता प्रेमियों द्वारा दायर उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिनमें न्यायालय के पूर्व आदेशों में संशोधन और निर्देशों के कड़ाई से अनुपालन की मांग की गई थी। न्यायमूर्ति मेहता ने कहा, ‘‘हमने सडक़ों से सभी कुत्तों को हटाने का निर्देश नहीं दिया है। निर्देश यह है कि उनसे नियमों के तहत निपटा जाए।’’ पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं सी यू सिंह, कृष्णन वेणुगोपाल, ध्रुव मेहता, गोपाल शंकरनारायणन, श्याम दीवान, सिद्धार्थ लूथरा और करुणा नंदी सहित कई वकीलों की दलीलें सुनीं। सुनवाई के प्रारंभ में, इस मामले में न्यायालय की सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने पीठ को सूचित किया कि चार राज्यों ने इस मामले में अपने अनुपालन हलफनामे दाखिल किए हैं।अपनी दलीलों के दौरान, सिंह ने कहा कि दिल्ली जैसे स्थानों में चूहों का प्रकोप है और राष्ट्रीय राजधानी में बंदरों से भी एक अनूठी समस्या है। उन्होंने कहा कि कुत्तों को अचानक हटाने से चूहों की आबादी बढ़ जाएगी, जिसके गंभीर परिणाम होंगे। न्यायमूर्ति मेहता ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा, ‘‘कुत्ते और बिल्लियां दुश्मन हैं। बिल्लियां चूहों को मारती हैं। इसलिए, हमें बिल्लियों की संख्या बढ़ानी चाहिए।’’
सिंह ने कहा कि वह उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेशों पर सवाल नहीं उठा रहे हैं और केवल पीठ से अनुरोध कर रहे हैं कि वह उन पर पुनर्विचार करे तथा उनमें कुछ संशोधन करे। उन्होंने कहा, ‘‘इन कुत्तों को भी उसी तरह नियंत्रित किया जाए जो एकमात्र कारगर तरीका साबित हुआ है, यानी बंध्याकरण, टीकाकरण और इलाके में पुन: छोडऩा।’’
पीठ ने कहा, ‘‘हमें बताइए कि प्रत्येक अस्पताल के गलियारों, वार्डों और मरीजों के बिस्तरों के पास कितने कुत्ते घूमते दिखने चाहिए?’’ सिंह ने कहा कि इस मामले में न्यायालय का इरादा निर्विवाद था और उसने इस बात पर ध्यान दिया था कि एबीसी नियमों और अदालतों द्वारा पारित आदेशों का पालन नहीं किया गया था। वेणुगोपाल ने कहा कि अस्पतालों में कुत्ते नहीं होने चाहिए और अब तक वैधानिक नियमों को लागू करने की कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखाई गई है। उन्होंने कहा कि नियमों के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए कोई बजटीय आवंटन नहीं है।
एक अन्य वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि आवारा कुत्तों की गणना और आंकड़े आवश्यक हैं। जब एक वकील ने बुनियादी ढांचे की कमी, जिसमें कुत्तों के आश्रय स्थल भी शामिल हैं, का जिक्र किया, तो पीठ ने कहा, ‘‘हम सभी इस बात से अवगत हैं।’’
पीठ ने कहा, ‘‘कृपया हमें बताएं, क्या पालतू कुत्तों के लिए अनिवार्य माइक्रोचिप लगाने का काम वास्तव में हो रहा है?’’ एक वकील ने कहा, ‘‘हमारे देश में तो यह नहीं हो रहा है, लेकिन क्या यह हो सकता है, क्या यह होना चाहिए? मेरा मानना है कि इसका उत्तर हां है।’’
एक वकील ने रिहायशी परिसरों में आवारा कुत्तों से बढ़ते खतरे का जिक्र करते हुए कहा कि सार्वजनिक रास्तों को सुरक्षित रखना जरूरी है। जब वकील ने कहा कि न्यायालय पर दबाव है, तो न्यायमूर्ति नाथ ने कहा, ‘‘हम पर कोई दबाव नहीं है। आप गलतफहमी में हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘कुत्ता हमेशा उस इंसान को सूंघ सकता है जो कुत्तों से डरता है और जिसे कुत्ते ने काटा हो, और वह हमेशा हमला करेगा।’’ कई वकीलों ने भी इस मुद्दे से निपटने के लिए सुझाव दिए।
सडक़ से उच्च अदालत में न्याय की गुहार चल रही है कुत्ते भौंकना ही नहीं लडऩा भी जानते हैं। वैसे कहते हैं जो कुत्ते भौंकते हैं वह काटते नहीं पर कुत्ता भौंकना बंद कर कब काटना शुरु कर देगा कौन जानता है।

आपने इस समस्या को अनेक कोणों से देखा है. आवारा कुत्तों से निजात मिलनी ही चाहिए, जैसे भी हो.
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