150 साल पुराने राष्ट्रगीत वंदे मातरम को भी बदलने की तैयारी

 150 साल पुराने राष्ट्रगीत वंदे मातरम को भी बदलने की तैयारी

‘वन्दे मातरम्’ भारत का राष्ट्रगीत इस समय पर पक्ष और विपक्ष की राजनीति का केंद्र बना हुआ है। एक तरफ महाराष्ट्र की भाजपा नीत एनडीए की सरकार है, जो स्कूल में पूरा वन्दे मातरम् का कार्यक्रम करवा रही है और इसके साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू के ऊपर इसमें कांट-छांट करवाने का आरोप लगा रही है। भाजपा का कहना है कि 1937 में कांग्रेस ने अपनी तुष्टिकरण की राजनीति की वजह से इस गीत का अपमान किया और इसके कुछ हिस्से को ही राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया। वहीं, दूसरी और कांग्रेस पार्टी है कह रही है कि आजादी की लड़ाई में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने ही इस गीत को अपना हथियार बनाया था। राष्ट्रगीत पर उठे मुद्दे के कई और पहलू भी हैं, जैसे कि समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आजमी, जिन्होंने धार्मिक कारणों का हवाला देते हुए वंदे मातरम गाने से इनकार कर दिया है।

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय

पक्ष और विपक्ष की इस राजनीति के बीच आइए जान लें हैं कि आखिरकार इस विवाद की जड़ में क्या है, आखिर क्यों और कब पंडित नेहरू ने बंकिम चंद्र चटोपाध्याय द्वारा लिखे गए इस गीत के कुछ हिस्से को हटा दिया था।

19वीं सदी में बंगाल के राष्ट्रवादी एवं प्रखर विचारक एवं विचारक बंगाली लेखक बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में इस गीत की रचना की थी। छह पैराग्राफ वाली इस कविता को उन्होंने पहली बार अपने उपन्यास आनंदमठ में समाहित किया था। चट्टोपाध्याय ने अपनी इस कविता में मां के रौद्र और कोमल रूप का भी वर्णन किया था। शुरुआती पैराग्राफ, जो आजकल स्कूलों में गाया जाता है, उसमें किसी हिंदू देवी का जिक्र नहीं है। लेकिन शेष पैरा में उन्होंने देवी दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की जिक्र करते हुए उन्हें दैवीय संरक्षक का स्थान दिया था।

प. जवाहललाल नेहरू

बाद में, यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों के लिए अंग्रेजों के खिलाफ एक हथियार बन गया। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि क्या मुसलमान अपनी धार्मिक वजहों से इसे स्वीकार करेंगे? इसकी वजह से साल 1937 में पंडित नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने फैजपुर में निर्णय लिया कि किसी भी कार्यक्रम में वंदे मातरम के केवल दो पैराग्राफ ही गाए जाएंगे। उन्होंने अपने इस फैसले को लेकर तर्क दिया कि चूंकि आखिरी चार पैराग्राफ में हिंदू देवियों का जिक्र है इसलिए मुस्लिम समुदाय इसे स्वीकार नहीं कर पाएंगे। कांग्रेस के इस फैसले के बाद वंदे मातरम के दो पैराग्राफ को ही गाना शुरू कर दिया गया। आजादी के बाद भी इसे दो पैराग्राफ के रूप में ही स्वीकार किया गया।

इस गीत के रचे जाने के 150 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। पीएम मोदी इस कार्यक्रम में शामिल हुए और उन्होंने पूरा गीत पढक़र सुनाया। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस पार्टी पर आरोप लगाया कि पंडित नेहरू की पार्टी ने इस गीत को खंड-खंड कर दिया है, चीर फाड़ दिया है। इसके बाद भाजपा ने कांग्रेस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लिखे एक पत्र को भी सार्वजनिक किया, जिसमें उन्होंने सुझाव दिया था कि वंदे मातरम की वजह से मुसलमान असहज हो सकते हैं।

इसी मुद्दे को लेकर भाजपा लगातार कांग्रेस पर निशाना साध रही है। भाजपा की तरफ से जारी हमलों का कांग्रेस पार्टी ने भी बखूबी जवाब दिया है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने मोर्चा संभाला। उन्होंने कहा,यह विडंबना ही है कि आज जो राष्ट्रवाद के ठेकेदार बनकर घूम रहे हैं, उन लोगों ने कभी इसका सम्मान नहीं किया था। आरएसएस और बीजेपी ने कभी भी वन्दे मातरम् गाया ही नहीं।

इस सब के बीच इस विवाद को बढ़ाने वाली सबसे बड़ी टिप्पणी महाराष्ट्र में समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आजमी की तरफ से आई। उन्होंने कहा कि एक धार्मिक मुसलमान कभी भी इसे स्वीकार नहीं कर सकता। इतना ही नहीं उन्होंने भाजपा को लेकर कहा कि यह भारत जलाओ पार्टी है।

इस पूरे विवाद का केन्द्र बिन्दु है वन्दे मातम् के वे चार पैरा जिन्हें राष्ट्रगीत के लिये हटाया गया था। वदे मातरम् गीत जिसे बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने रचित किया, रवीन्द्र नाथ टैगोर ने इसे संगीतबद्ध भी किया और गाया था, आखिर उसे क्यों जस का तस राष्ट्रगीत के रूप में नहीं अपनाया गया। 1937 में कांग्रेस अधिवेशन में इसके प्रारंभ के दो छंदों को ही क्यों राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया गया। आज इसे के बारे में प्रचार किया जा रहा है कि पं. जवाहर नेहरू के नेतृत्व में देवी दुर्गा की प्रस्तुति वाले छंद हटा दिये गये थे। यह आरोप लगाया जा रहा है कि कुछ सांप्रदायिक समूहों को खुश करने के लिये यह निर्णय लिया गया जिससे गीत के मूलस्वरूप और उद्देश्य को लेकर बहस छिड़ गई।

आज की सरकार इस मुद्दे को लेकर संसद में बहस करेगी, तब समझ में आयेगा कि इसका विरोध किन कारणों से किया जा रहा है। मेरा कहना है कि न तो कवि गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर ने और न ही ऋषि बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने गीत की रचना राष्ट्रीय गीत के रूप में की थी। दोनों साहित्य मनीषियों ने ये गीत लिखे थे किसी अन्य उद्देश्य के लिये। संयोगवश इन दोनों गीत को राष्ट्र भावना से ओतप्रोम लोगों ने गाया और कालान्तर में इसे क्रमश: राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत के रूप में संवरण कर लिया गया। जन गन मन गीत में कई छंद है किन्तु राष्ट्रगान के रूप में इसके प्रारंभिक छन्द को ही लिया गया। वन्दे मातरम् गीत को इसलिये सिर्फ दो पैरा तक सीमित किया गया क्योंकि इसके  बाद के पैरा में धार्मिक एतराज था कि वे खुदा (भगवान) के अलावा किसी और की वन्दना नहीं करते हैं, न ही झुकते हैं। देश की स्वतंत्रता का आंदोलन अपने पूरे परवान पर चढ़ा हुआ था, एवं देश के सभी वर्ग और धर्म क लोग इसमें भाग ले रहे थे। हिन्दू, मुस्लिम, जैन, सिख, इसाई सभी का योगदान था। इसलिये सभी के बीच समन्वय बन सके एतदर्थ जरूरी था कि इसके उस हिस्से को निकाल दिया जाये जिसके प्रति किसी वर्ग या समुदाय विशेष में आपत्ति हो। 17 मार्च 1938 को मोहम्मद अली जिन्ना ने पंडित नेहरू जो उस वक्त कांग्रेस के अध्यक्ष थे से मांग की कि वंदे मातरम् को पूरी तरह बदल दिया जाए क्योंकि इससे मुस्लिम भावनाएं आहत होती हैं। जिन्ना की पूरे गीत को पूरा बदलतने की मांग को तो स्वीकार नहीं किया गया किन्तु इसके आखिर के चार छन्द हटाकर शुरू के दो छन्द ही राष्ट्रगीत रूप में स्वीकार कर लिये गये। कांग्रेस समन्वयवादी विचारधारा की प्रबल समर्थक थी इसलिये नहीं चाहती कि स्वतंत्रता आंदोलन में किसी भी तरह का एवं किसी भी कारण से विभेद की सृष्टि हो। पं. हवाहरलाल नेहरू ने सुभाषचन्द्र बोस को खत लिखा जिसमें यह सुझाव दिया था कि वंदे मातरम् की वजह से मुसलमान असहज महसूस हो सकते हैं। यही नहीं सुप्रसिद्ध चित्रकार नन्दलाल बोस के कई रेखाचित्र को राष्ट्रीय आंदोलन का प्रेरक माना जाता था के बनाये हुए कुछ प्रतीक धार्मिक भावना से संबंधित थे जिसे हटाना सभी धर्मावलम्बी स्वतंत्रता सेनानियों के हितकर में था।

कुल मिलाकर वन्दे मातरम् का आज विरोध हमारे विभाजन की याद दिलायेगा और मिलजुलकर देश को प्रगति के रास्ते पर ले जाने की मानसिकता में दरार पैदा कर सकता है। भारत धर्म प्रधान और कृषि प्रधान देश है और दोनों के लिये समन्वय बहुत जरूरी है। अत: आज इसके विरोध के स्वर हमारी अखंडता और धर्म निरपेक्षता पर प्रहार होगा। ऐसे समय में जब देश में विपक्ष कमजोर है इस तरह का विवाद हमारे लोकतांत्रिक ढांचे को और भी कमजोर कर देगा। 




Comments

  1. निश्चित रूप से वंदेमातरम गीत के साथ छेडछाड हुई थी जो पूर्णतया अस्वीकार्य है।

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